Friday, October 4, 2013

क्रायोजेनिक तकनीक, अपनी झोली में कब तक



हाल में ही भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने स्वदेश निर्मित क्रायोजेनिक इंजन वाले जीएसएलवी डी-5 की प्रस्तावित लांचिंग ऐन मौके पर रोक दी। इसरो प्रमुख के राधाकृष्णनन के अनुसार जीएसएलवी डी-5 में ईधन रिसाव होने के कारण प्रक्षेपण फिलहाल टाल दिया गया है। 49 मीटर लंबे और 414 टन वजनी जीएसएलवी प्रक्षेपण यान के तीसरे चरण यानी देश में ही विकसित क्रायोजेनिक अपर स्टेज में प्रणोदक भरने का काम चल रहा था तभी वैज्ञानिकों को रॉकेट के दूसरे चरण में ईधन रिसाव के संकेत मिले। इसके बाद इसरो अधिकारियों ने उलटी गिनती रोकने का निर्णय किया। रिसाव की समस्या जब सामने आई तब प्रक्षेपण में सिर्फ 74 मिनट का वक्त ही बचा था।



जीएसएलवी डी-5 प्रक्षेपण यान के निर्माण पर लगभग 160 करोड़ रुपये तथा उपग्रह के निर्माण पर लगभग 45 करोड़ रुपए की लागत आई है। अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में हम लगातार प्रगति कर रहे हैं, लेकिन अब भी हम पूरी तरह से आत्मनिर्भर नहीं हो पाए हैं। क्रायोजेनिक तकनीक के परिप्रेक्ष्य में पूर्ण सफलता नहीं मिलने के कारण भारत इस मामले में आत्मनिर्भर नहीं हो पाया है, जबकि प्रयोगशाला स्तर पर क्रायोजेनिक इंजन का सफलतापूर्वक परीक्षण किया जा चुका है। लेकिन स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन की सहायता से लांच किए गए प्रक्षेपण यान सक्त्र्जीएसएलवीसक्ज्ञ् की असफलता के बाद इस पर सवालिया निशान लगा हुआ है। इससे पहले 2010 में भी भारत के दो महत्वाकांक्षी अभियान तकनीकी और संचालन संबंधी दिक्कतों के कारण असफल हो गए थे। इसरो अध्यक्ष के अनुसार वैज्ञानिक जीएसएलवी डी-5 में रिसाव के कारणों का विश्लेषण करेंगे और इसके बाद ही नई तिथि की घोषणा की जाएगी।



वास्तव में अप्रैल 2010 की तरह विफलता का जोखिम लेने से बेहतर था कि प्रक्षेपण को टाल दिया जाए और खामी दूर करने के बाद नए समय पर इसे प्रक्षेपित किया जाए। इसरो ने तीन चरणों वाले जीएसएलवी को नए सिरे से बनाया है और इसमें लगे क्रायोजेनिक इंजन का विकास पूर्णत स्वदेशी तकनीक से किया गया है। भारत के लिए यह पहला मौका नहीं है कि क्रायोजेनिक इंजन से लैस जीएसएलवी के जरिए उपग्रह का प्रक्षेपण हो रहा है। इससे पहले 2010 में जीएसएलवी-एफ 06 से जीसैट-5 उपग्रह को लांच किया गया था मगर वह हवा में फट गया और महज 62 सेकंड में 175 करोड़ का अभियान स्वाहा हो गया। बाद में यह बंगाल की खाड़ी की ओर गिर गया। इस अभियान में भी तकनीकी खराबी आई थी जिसकी वजह से प्रक्षेपण की तारीख बदली गई थी, लेकिन बाद में भी यह अभियान पूर्ण रूप से विफल रहा। उस समय भी देश की उम्मीदों को गहरा झटका लगा था। इसके पीछे असली समस्या क्रायोजेनिक इंजन तकनीक के मामले में भारत का पूरी तरह आत्मनिर्भर न होना है। असल में जीएसएलवी में प्रयुक्त होने वाला द्रव्य ईधन इंजन में बहुत कम तापमान पर भरा जाता है, इसलिए ऐसे इंजन क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन कहलाते हैं।



इस तरह के रॉकेट इंजन में अत्यधिक ठंडी और द्रवित गैसों को ईंधन और ऑक्सीकारक के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस इंजन में हाइड्रोजन और ईधन क्रमश: ईंधन और ऑक्सीकारक का कार्य करते हैं। ठोस ईधन की अपेक्षा यह कई गुना शक्तिशाली सिद्ध होते हैं और रॉकेट को बूस्ट देते हैं। विशेषकर लंबी दूरी और भारी रॉकेटों के लिए यह तकनीक आवश्यक होती है। क्रायोजेनिक इंजन के थ्रस्ट में तापमान बहुत ऊंचा (2000 डिग्री सेल्सियस से अधिक) होता है। अत: ऐसे में सर्वाधिक प्राथमिक कार्य अत्यंत विपरीत तापमानों पर इंजन व्यवस्था बनाए रखने की क्षमता अर्जित करना होता है। क्रायोजेनिक इंजनों में -253 डिग्री सेल्सियस से लेकर 2000 डिग्री सेल्सियस तक का उतार-चढ़ाव होता है, इसलिए थ्रस्ट चैंबरों, टरबाइनों और ईधन के सिलेंडरों के लिए कुछ विशेष प्रकार की मिश्र-धातु की आवश्यकता होती है। फिलहाल भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने बहुत कम तापमान को आसानी से झेल सकने वाली मिश्र-धातु विकसित कर ली है। अन्य द्रव्य प्रणोदकों की तुलना में क्रायोजेनिक द्रव्य प्रणोदकों का प्रयोग कठिन होता है। इसकी मुख्य कठिनाई यह है कि ये बहुत जल्दी वाष्प बन जाते हैं। इन्हें अन्य द्रव्य प्रणोदकों की तरह रॉकेट खंडों में नहीं भरा जा सकता। क्रायोजेनिक इंजन के टरबाइन और पंप, जो ईधन और ऑक्सीकारक दोनों को दहन कक्ष में पहुंचाते हैं, को भी खास किस्म के मिश्रधातु से बनाया जाता है। द्रव्य हाइड्रोजन और द्रव्य ऑक्सीजन को दहन कक्ष तक पहुंचाने में जरा-सी भी गलती होने पर कई करोड़ रुपए की लागत से बना जीएसएलवी रॉकेट रास्ते में जल सकता है। इसके अलावा दहन के पूर्व गैसों (हाइड्रोजन और ऑक्सीजन) को सही अनुपात में मिश्रित करना, सही समय पर दहन प्रारंभ करना, उनके दबावों को नियंत्रित करना और पूरे तंत्र को गर्म होने से रोकना जरूरी है । जीएसएलवी ऐसा मल्टीस्टेज रॉकेट होता है जो दो टन से अधिक वजनी उपग्रह को पृथ्वी से 36000 किमी की ऊंचाई पर भू-स्थिर कक्षा में स्थापित कर देता है जो विषुवत वृत्त या भूमध्य रेखा के ऊपर होता है। ये अपना कार्य तीन चरण में पूरा करते हैं। इनके आखिरी यानी तीसरे चरण में सबसे अधिक बल की जरूरत पड़ती है। रॉकेट की यह जरूरत केवल क्रायोजेनिक इंजन ही पूरा कर सकते हैं। इसलिए बगैर क्रायोजेनिक इंजन के जीएसएलवी रॉकेट बनाया जा सकना मुश्किल होता है। दो टन से अधिक वजनी उपग्रह ही हमारे लिए ज्यादा काम के होते हैं इसलिए दुनिया भर में छोड़े जाने वाले 50 प्रतिशत उपग्रह इसी वर्ग में आते हैं। जीएसएलवी रॉकेट इस भार वर्ग के दो-तीन उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में ले जाकर 36000 किमी. की ऊंचाई पर भू-स्थिर कक्षा में स्थापित कर देता है। यही जीएसएलवी रॉकेट की प्रमुख विशेषता है। जीएसएलवी का प्रक्षेपण इसरो के लिए बेहद अहम है क्योंकि दूरसंचार उपग्रहों, मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियानों या दूसरा चंद्र मिशन जीएसएलवी के विकास के बिना संभव नहीं है। इस प्रक्षेपण में सफलता इसरो के लिए संभावनाओं के नए द्वार खोलने वाली है लेकिन अब इसके लिए देश को थोड़ा और इंतजार करना पड़ेगा।


सुदूर अंतरिक्ष का सैलानी



पृथ्वी का एक सैलानी इस समय गहन अंतरिक्ष में भ्रमण कर रहा है। यह सैलानी और कोई नहीं, नासा का वॉएजर-1 है। सौरमंडल को पार करके अंतर-नक्षत्रीय में पहुंचने वाला यह पहला मानव निर्मित यान है। एक छोटी कार के आकार के इस यान का पिछले 36 साल से अंतरिक्ष में बने रहना अपने आप में एक बड़ा अजूबा है। इससे यह भी साबित होता है कि 70 के दशक की टेक्नोलॉजी आज भी अंतरिक्ष की विषम परिस्थितियों को ङोलने में सक्षम है। आपको यह जान कर आश्चर्य होगा कि वॉएजर-1 के कंप्यूटरों की मेमरी आज के एक आईफोन की तुलना में 2,40,000 गुणा कम है। फिर भी यह बखूबी काम कर रहा है। वॉएजर की सबसे खास बात यह है कि यह अंतरिक्ष की बुद्धिमान सभ्यताओं के लिए सोने की प्लेटिंग वाली तांबे की एक डिस्क ले गया है। यदि पारलौकिक प्राणी वॉएजर के संपर्क में आते हैं तो उन्हें इस डिस्क के जरिए पृथ्वी और मानवता की विविधताओं का परिचय मिल जाएगा। इस डिस्क में 116 तस्वीरों के अलावा प्राकृतिक ध्वनियों की रिकार्डिंग है जिनमें पक्षियों की चहचाहट, व्हेल मछली के संगीत, हवा और तूफान की आवाज आदि शामिल है। इसमें तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर और तत्कालीन संयुक्त राष्ट्र महासचिव कुर्ट वाल्दाइम के पारलौकिक सभ्यताओं के नाम दोस्ती के पैगाम भी हैं। डिस्क में शामिल संगीत में बीथोवन और मोजार्ट की कृतियों के अलावा केसरबाई केरकर की कृति जात कहां हो के रूप में भारतीय शास्त्रीय संगीत का नमूना भी है।
वॉएजर-1 इस समय सूरज से करीब 18.30 अरब किलोमीटर दूर है। वॉएजर-1 के पीछे-पीछे वॉएजर-2 चल रहा है। वैज्ञानिकों अनुसार तीन साल के भीतर दूसरा वॉएजर भी सौरमंडल को पार जाएगा। दोनों यान परमाणु ईंधन से चल रहे हैं, लेकिन इनकी आणविक बैटरियां धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं। फिर भी नासा के वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि ये दोनों यान कम से कम 2025 तक पृथ्वी के संपर्क में बने रहेंगे। पृथ्वी से संपर्क टूटने के बाद भी ये यांत्रिक सैलानी गहन अंतरिक्ष में 40,000 वर्ष तक भ्रमण रहेंगे। पिछले साल वैज्ञानिकों ने पता लगाया था कि वॉएजर-1 के उपकरणों ने सूरज से निकलने वाले ऊर्जावान कणों को ग्रहण करना बंद कर दिया है। दूसरी तरफ सौरमंडल के बाहर से आने वाली ब्रह्मांडीय किरणों में भी वृद्धि देखी गई थी। इस आधार पर वैज्ञानिकों ने यान के सौरमंडल को पार करने का अंदाजा लगाया था। अब नासा के वैज्ञानिकों का मानना है कि वॉएजर-1 ने पिछले साल 25 अगस्त को अंतर-नक्षत्रीय अंतरिक्ष में प्रवेश कर लिया था। नए डेटा से पता चलता है कि वॉएजर-1 पिछले एक साल से ऊर्जावान गैस से गुजर रहा है जो तारों के बीच अंतरिक्ष में फैली हुई है। वॉएजर-1 के सौरमंडल को पार करने की घटना की तुलना चांद पर मनुष्य के उतरने की ऐतिहासिक घटना से की जा रही है। गौरतलब है कि वॉएजर-1 और उसके जुड़वां भाई, वॉएजर-2 को सौरमंडल के बड़े ग्रहों के अध्ययन के लिए 1977 में 16 दिन के अंतराल में रवाना किया गया था। दोनों यान बृहस्पति और शनि के बगल से गुजरे थे। वॉएजर-2 ने बृहस्पति के विशाल लाल धब्बों और शनि के चमकीले छल्लों की तस्वीरें भेजने के बाद यूरेनस और नेपच्यून को भी नजदीक से देखा था।



नासा के वॉएजर-मिशन के संचालक आज भी इन दोनों यानों से संकेत प्राप्त कर रहे हैं, हालांकि ये संकेत बेहद कमजोर हैं। इन संकेतों की पावर महज 22 वाट है। कुछ वैज्ञानिक वॉएजर -1 के अंतर-नक्षत्रीय अंतरिक्ष में पहुंचने के बारे में नासा के दावे से सहमत नहीं हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन में अंतरिक्ष विज्ञान के प्रोफेसर लेनार्ड फिस्क का कहना है कि हमें अभी कुछ समय और इंतजार करना चाहिए।

Wednesday, October 2, 2013

सूरज की हदों से पार निकले हम


अगर हम अपने सौरमंडल को ब्रह्मांड में तैरता एक विशाल बुलबुला मानें, तो मानवनिर्मिंत दो उपग्रहों, वॉयजर-1 और वॉयजर-2 के बारे में कह सकते हैं कि वे इस बुलबुले की कैद से छूट रहे हैं। खास तौर से वॉयजर-1 इस मामले में उल्लेखनीय है क्योंकि इसके बारे में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी-नासा ने हाल में घोषणा की है कि यह हमारे सौरमंडल की हदों के पार चला गया है। इंसान के हाथों बनी किसी चीज का इतनी दूर पहुंचना साइंस की दुनिया में एक ऐतिहासिक घटना है, ठीक वैसे ही जैसे, चंद्रमा पर इंसान का पहुंचना। करीब 36 साल पहले 1977 में नासा ने ये दो यान इस मकसद से रवाना किए थे कि इनसे सोलर सिस्टम के साथ- साथ अंतरतारकीय स्पेस के बारे में हमारी जानकारियों में विस्तार हो सके। इन्होंने अभी तक यह काम बखूबी किया भी है। वॉयजर-1 ने इस दौरान बृहस्पति और शनि जैसे बड़े ग्रहों और उनके चंद्रमाओं की बारीक पड़ताल की है, तो उधर वॉयजर-2 ने 2003 में पहले तो विशालकाय सौर ज्वालाओं का अता-पता दिया और फिर 2004 में इन ज्वालाओं के कारण पैदा होने वाली शॉक वेव्स के सोलर सिस्टम में भ्रमण की जानकारी दी। फिलहाल वॉयजर-1 यान हमसे करीब 19 अरब किलोमीटर दूर है। पिछले लंबे अरसे तक यह सूरज के बेइंतहा असर वाले ऐसे क्षेत्र में रहा है जिसे हेलियोस्फीयर कहा जाता है। इस इलाके में सूरज से छिटके हुए तेज रफ्तार से आते विद्युत आवेशित कणों की भरमार होती है और वे दूसरे सितारों से आए पदार्थ के खिलाफ घर्षण करते हैं। टर्मिंनेशन शॉक कहलाने वाले इस इलाके में सौर हवाएं औसतन 300-700 किमी प्रति सेकंड की भीषण गति से चलती हैं और बेहद घनी और गर्म होती हैं। इस इलाके में वॉयजर यान पिछले करीब 10 साल तक रहे हैं। इस क्षेत्र को पार करने के बाद वॉयजर-1 सौरमंडल के अंतिम सिरे यानी हेलियोपॉज में मौजूद रहा है। यह वह सरहद है, जहां सौर हवाएं और बाहरी स्पेस से आने वाली अंतरतारकीय हवाएं (तारों के बीच मौजूद गैस और धूल का समूह) एक-दूसरे से टकराती और दबाव बनाती हैं। इस टकराहट और परस्पर दबाव से ही वहां संतुलन कायम होता है। अब वॉयजर-1 की आगे की यात्रा बेहद महत्व की है। सौरमंडल से बाहर निकलने पर यह ऐसे स्पेस में पहुंच रहा है, जहां उसका सामना तूफानी सौर हवाओं और वैसी आवेशित गैसों से हो सकता है जो सूर्य को भी सुपरसॉनिक गति से भगा ले जाती हैं। वैसे तो विज्ञानियों के मुताबिक वॉयजर यानों का यह मिशन 2020 के बाद शायद ही कायम रह सके, क्योंकि तब तक ये यान वह जरूरी ऊर्जा खो चुके होंगे, जिसके बूते वे अभी पृथ्वी तक संकेत भेजने में सफल हो रहे हैं। वॉयजर अभियान की शुरु आत काफी दिलचस्प रही है। इसके पीछे 70 के दशक के अंत में घटित एक खगोलीय घटना है। असल में उस वक्त बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेप्च्यून ऐसी विशेष स्थिति में आ रहे थे कि तब कोई अंतरिक्ष यान एक के बाद एक इन चारों ग्रहों के करीब से होकर गुजर सकता था। इस तरह किसी ग्रह के करीब से गुजरने को साइंस की भाषा में फ्लाई-बाई कहते हैं। सौरमंडल के ग्रहों की यह स्थिति हर 177 साल बाद बनती है। नासा की जेट प्रोपल्शन लैब के एयरोस्पेस इंजीनियर गैरी फ्लैंड्रो ने ग्रहों की बन रही इस खास स्थिति का अध्ययन कर एक अनोखी बात खोज निकाली थी। गैरी ने गणित की मदद से समझाया था कि अगर कोई अंतरिक्ष यान एक खास कोण से बृहस्पति के करीब से गुजरता है तो इस ग्रह का गुरुत्वाकर्षण बल उसे एक ऐसी जबरदस्त अतिरिक्त उछाल दे देगा, जिससे वह अंतरिक्ष यान बिना ईधन खर्च किए सीधे शनि तक जा पहुंचेगा। बृहस्पति की तरह शनि के गुरु त्वाकर्षण से मिली अतिरिक्त उछाल से उसे आगे के ग्रह यूरेनस, नेपच्यून और उससे भी आगे निकल जाने में मदद मिलेगी। यह बिल्कुल नया विचार था क्योंकि इससे नाममात्र के ईधन के खर्च से और केवल गुरु त्वाकर्षण की उछाल का इस्तेमाल करके अंतरिक्ष में दूरदराज का सफर मुमकिन हो रहा था। इस तरह नासा ने वॉयजर मिशन पर काम शुरू किया, जिसके तहत वॉयजर-1 और वॉयजर-2 को बृहस्पति और शनि के लिए भेजना तय हुआ। उल्लेखनीय है कि वॉयजर-1 और इसका जुड़वां अंतरिक्ष यान वॉयजर- 2 अंतरिक्ष में अब दो अलग-अलग दिशाओं में हैं और एक-दूसरे से दूर जा रहे हैं। यह भी गौरतलब है कि वॉयजर- 1 की रफ्तार वॉयजर-2 के मुकाबले 10 फीसद ज्यादा है। बहरहाल, अब 722 किलो वजनी अंतरिक्ष यान वॉयजर-1 हेलियोस्फीयर (सूर्य किरणों की पहुंच की सीमा वाले अंतरिक्ष) और सूर्य के नजदीकी इलाके- हेलियोशीथ को पीछे छोड़कर इंटरस्टेलर स्पेस कहलाने वाले गहन ब्रह्मांड में प्रवेश कर चुका है। आगे इससे हमें क्या जानकारी मिलेगी, इस पर अभी वैज्ञानिक कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं। पर आगे अगर किसी अन्य सभ्यता से वॉयजरों की कोई मुलाकात होती है, तो इस संभावना से अंतहीन जिज्ञासाओं का कोई ठोस जवाब पाने का इंतजाम भी इन यानों में किया गया है। परग्रही एलियंस को हैलो कहने वाला एक ग्रीटिंग (संदेश) इसमें साथ है। करीब 12 इंच की गोल्ड प्लेटेड कॉपर डिस्क के रूप में एक ऐसा फोनोग्राफ इसमें मौजूद है, जो मौका आने पर कुछ ध्वनियां सुना सकता है और पृथ्वी के जीवन व संस्कृति की छवियां बिखेर सकता है। खास बात यह है कि इस कॉपर डिस्क में भारतीय गायिका केसरबाई केरकर का एक गीत- जात कहां हो भी दर्ज है जिसका चयन प्रख्यात खगोल विज्ञानी कार्ल सगॉन की अध्यक्षता वाली कमेटी ने किया था। वॉयजर की यह यात्रा अचंभित करने वाली है। आश्र्चय है कि कैसे इसकी संचार पण्रालियां और यंत्र पृथ्वी से इतनी दूर होने पर काम कर पा रहे हैं और कैसे यह हम तक संकेत भेज पा रहा है। नासा के मुताबिक वॉयजर-1 में तीन रेडियोआइसोटॉप र्थमोइलेक्ट्रिक जेनरेटर लगे हैं, जो इसकी तमाम पण्रालियों/उपकरणों को जीवित रखे हुए हैं।

Monday, September 30, 2013

नदियों से इतनी बेरहमी


कभी मिट्टी के मोल बिकने वाली रेत और बजरी आज अनमोल हो गई है! राजनीतिज्ञ, माफिया और ठेकेदार सब इसके गोरखधंधे में लगे हुए हैं। यहां तक कि देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवा के कई अधिकारियों तक को यह रेत-बजरी लील चुकी है। पूरे देश में रेत-बजरी का हजारों करोड़ रुपये का वैध-अवैध धंधा हो रहा है, शायद ही कोई ऐसा राज्य हो, जहां इस कारोबार को फलने-फूलने का मौका न मिल रहा हो। यह धंधा है बहुत चोखा, क्योंकि रेत-बजरी तो नदियां भर-भर कर लाती हैं, सिर्फ परिवहन का खर्च है। एक रुपये की लागत, पांच रुपये का मुनाफा! यही नहीं, एक ही परमिट की आड़ में फर्जीवाड़ा भी कम नहीं होता।
सरकार ने वर्ष 1957 में खदान व लवण नियम बनाए थे, जिस पर फिर कभी बहस नहीं हुई। इसके अनुसार हर राज्य खनन के लिए खुद ही नियम बनाएगा। मगर कई राज्य सरकारों ने कोई भी नियम नहीं बनाए। मध्य प्रदेश को ही देख लीजिए। अभी तक वहां इस संबंध में कोई भी नियम नहीं बनाया गया है, लेकिन वहां रेत-बजरी का व्यापार खूब जोर-शोर से पनपा है।
वैसे केंद्र ने अब जाकर खनन के लिए पर्यावरण पर होने वाले प्रभाव के आकलन करने की व्यवस्था की है। इसके तहत पांच से लेकर 50 हेक्टेयर तक के खनन के लिए संबंधित राज्य सरकार की अनुमति आवश्यक होगी। इससे ऊपर के क्षेत्र में खनन के लिए केंद्र से मंजूरी लेनी जरूरी होगी, पर पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों ने इन नियमों को ताक पर रख दिया है। इस वर्ष फरवरी में सर्वोच्च न्यायालय ने इन सब परिस्थितियों को देखते हुए प्रत्येक खनन के लिए ग्रीन सिग्नल की आवश्यकता पर जोर दिया है। इस निर्णय की पृष्ठभूमि में अकेले वर्ष 2010 में अवैध खनन के 82,000 मामले सामने आए थे। इसी तरह पिछले वर्ष 47,000 से अधिक अवैध रेत-बजरी खनन के मामले सामने आए। ऐसे मामलों में कुल बिक्री के आठ प्रतिशत के बराबर जुर्माना भरना पड़ता है या फिर 25,000 रुपये जुर्माना और दो वर्ष तक की जेल। फिर कोई परमिट से चार गुना रेत निकाल ले या सौ गुना, जुर्माना ऊपर वाला ही होगा।
अनुमान के मुताबिक, देश में रेत-बजरी का सालाना 18,734 करोड़ रुपये का कारोबार होता है और हम इस मामले में दुनिया में दसवें नंबर पर हैं। इसमें अवैध खनन का भी हिस्सा है। पर्यावरण से जुड़े एक दल ने स्वीकार किया है कि राजधानी और उसके आसपास यमुना और हिंडन नदियों में अवैध खनन जारी है, जिस पर नियंत्रण आवश्यक है।
हकीकत यह है कि देश की लगभग सभी नदियां खनन की मार झेल रही हैं। उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश में नर्मदा, चंबल, बेतवा, बेनगंगा आदि नदियों के हालात खनन के कारण गंभीर हैं, तो केरल में भारतपूजा, कुटटुमाड़ी, अचनकोकिला, पम्पा व मेटियार नदियां संकट में हैं। इसी तरह तमिलनाडु में कावेरी, बेगी, पलार, चेटयार नदियों को बेहतर नहीं कहा जा सकता। कर्नाटक में हरंगी, कावेरी और पपलानी जैसी नदियों पर भी खनन का बुलडोजर लगातार चल रहा है। गोदावरी, तुंगभद्रा व नागवली आंध्र प्रदेश की मुख्य नदियां हैं, जो लगातार खनन के कारण मरी जा रही हैं। गुजरात की तापी और बिहार की गंडक, हरियाणा की सतलुज और छत्तीसगढ़ की महानदी की स्थिति भी अत्यधिक खनन से खराब हो रही है। नदियों के इस बेरहम दोहन के पीछे होने वाली कमाई की सिर्फ कल्पना की जा सकती है। यही नहीं, विभिन्न राज्यों में रेत और बजरी की कीमतों में भी भारी अंतर है। बंगलूरू में एक ट्रक रेत की कीमत 30,000 रुपये है, तो हरियाणा में 15,000 रुपये और पश्चिम बंगाल में 16,000 से 20,000 रुपये तक। अकेले राजस्थान में यह तीन से चार सौ करोड़ का व्यापार है, तो बिहार में करीब आठ हजार करोड़ रुपये का।
इस मारामारी में अगर कुछ बिगड़ा है, तो सिर्फ नदियों का। नदियों की संस्कृति को समझने की आवश्यकता है। हमने इस दिशा में कभी कोई कोशिश नहीं की। हमने नदियों को मात्र अपनी खेती-पानी या रेत-बजरी, पत्थर की आवश्यकता से ज्यादा कुछ नहीं माना। इसके विज्ञान को, जो प्रकृति की देन भी है, हमने सिरे से नकार दिया। नदी प्रकृति के आपसी मंथन का परिणाम होती है। ये हजारों-लाखों वर्षों की पारिस्थितिकीय हलचलों का उत्पाद होती हैं। हमारी नदियों को अपनी जरूरत के अनुसार उपयोग में लाने की कोशिश आने वाले भविष्य के लिए घातक सिद्ध होगी। नदियों का अत्यधिक खनन उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। देश-दुनिया की सभ्यता नदियों की ही देन है। नदियों का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि पानी ही जीवन का मूल तत्व है। नदियों के शोषण की हमने सारी सीमाएं लांघ दी हैं।



नदियों में रेत-पत्थरों के कई मायने होते हैं। इनकी गति के नियंत्रण और भूमिगत जल की आपूर्ति में इनका बड़ा योगदान होता है। देश में भूमिगत पानी की आपूर्ति का बड़ा स्रोत नदियां ही हैं। आज इसकी कमी के कारणों में नदियों का गिरता जलस्तर भी है। नदियों के वेग को थामने और जल संग्रहण में रेत-बजरी की बड़ी अहम भूमिका होती है, ताकि पानी भूमिगत हो सके। यह भी सत्य है कि नदियों में भरी रेत-बजरी को एक सीमा तक हटाया जाना जरूरी है, क्योंकि अत्यधिक मात्रा में इनके जमा होने पर नदियों के रास्ते बदले जाने का भी भय होता है, पर इसकी तय सीमा को कभी भी माना नहीं जाता। ठेके के बाद खनन के सारे नियमों को ताक पर रख दिया जाता है। पिछले दशकों में यही हुआ है और नदियों को चौतरफा मार मिली है। यदि हम अब भी नहीं चेते, तो स्थिति और खतरनाक हो सकती है।


Sunday, September 22, 2013

कई निशाने साधेगी यह मिसाइल



यकीनन यह बड़ी कामयाबी है। बैलिस्टिक के बाद भारत ने अब अंतर-महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल तैयार कर इस क्षेत्र में महारत हासिल कर ली है, वह भी स्वदेशी तकनीक से। हालांकि, इसके कुछ कल-पुर्जे दूसरे देशों से खरीदे गए हैं और उनकी मदद से बनाए भी गए हैं। लेकिन अग्नि-पांच का सफल प्रक्षेपण यह बताता है कि साल 1983 में एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम की जो पहल हुई थी, वह आज सही दशा और दिशा में है। इसी के बूते भारत में 'पृथ्वीÓ से लेकर 'अग्निÓ तक कई मिसाइलों की श्रृंखला बनी और मिसाइल शोध तथा विकास के क्षेत्र में भारत को कई बेमिसाल उपलब्धियां हासिल हुईं।
आज भारत अंतर-महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल संपन्न देशों की सूची में छठे सदस्य के तौर पर शामिल हो चुका है। अंतर-महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल की जमीन से जमीन मारक क्षमता 5,000 किलोमीटर से 13,000 किलोमीटर तक होती है। इस हिसाब से देखें, तो अमेरिका अपने यहां से ग्लोब के किसी भी हिस्से में मिसाइल दाग सकता है। यह भी सच है कि चीन अपनी मिसाइलों की क्षमता के कारण अमेरिका को अक्सर घुड़की देता रहता है। ब्रिटेन, फ्रांस और रूस के पास भी लगभग इतनी ही मारक क्षमता की मिसाइलें हैं। गौर करने वाली बात यह भी है कि ये पांचों देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं, जबकि छठे देश भारत को अभी सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता नहीं मिली है। इसके बावजूद, वह 5,000-8,000 किलोमीटर दूर तक अब मिसाइलें दाग सकता है। इसे ऐसे समझों कि अग्नि-पांच पूरे चीन को अपनी गिरफ्त में ले सकता है, पूरा एशिया इसकी जद में आ गया है, बल्कि यूरोप के कुछ हिस्से भी। इसलिए इसे दुनिया भर में भारत की बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है और नए तरीके से इस क्षेत्र में भू-सामरिक तथा भू-कूटनीतिक समीकरण पर प्रकाश डालने की शुरुआत हो चुकी है।
यह मिसाइल डेढ़ टन के परमाणु हथियार को ले जाने में सक्षम है। एक ही मिसाइल में कई परमाणु हथियारों के तकनीकी प्रयोग की बात भी कही जा रही है। ऐसा अनुमान है कि साल 2016 में इसे भारतीय सेना में शामिल कर लिया जाएगा और जरूरत पडऩे पर राजनीतिक नेतृत्व के निर्देश पर इसे छोड़ा जाएगा। लेकिन इसका अगला संस्करण क्या होगा, जिस पर रक्षा शोध तथा विकास संगठन, यानी डीआरडीओ इस समय जुटा हुआ है? वह है- केनेस्टर मिसाइल टेक्नोलॉजी। यह एक ऐसी तकनीक है, जिससे मिलिटरी ट्रांसपोर्ट के ऊपर इस मिसाइल को कहीं भी भेजा जा सकता है और वहीं से लॉन्च करना भी मुमकिन हो सकेगा। इस स्थिति में, शत्रु पक्ष ऐसी मिसाइल को आसानी से न्यूट्रलाइज नहीं कर पाएगा। केनेस्टर का मतलब है-एक बड़ा डिब्बा, जिसके अंदर कई परमाणु वारहेड या बम हो सकते हैं। अग्नि-पांच का प्रक्षेपण इतना आसान है कि इसे कहीं से भी छोड़ा जा सकता है। ऐसे में, नए वजर्न से अगर इस मिसाइल को पूवरेत्तर सीमा पर तैनात कर दिया जाए, तो चीन के लिए मुश्किल हो जाएगी। इस मिसाइल का माइक्रो नेवीगेशन सिस्टम यह सुनिश्चित करता है कि यह अपने निशाने से तनिक भी नहीं भटकेगी।
निस्संदेह, डीआरडीओ ने मिसाइल के क्षेत्र में बड़ी बाजी मार ली है। बीते वर्षो में इस संगठन की आलोचना इस आधार पर होती रही है कि यह छोटे और उपयोगी हथियार, मसलन कार्बाइन नहीं बना सकता, पर मिसाइल और क्रिटिकल टेन्टेटिव टेक्नोलॉजी में काफी आगे जा चुका है। यह ठीक भी है, क्योंकि हमारे सैन्य शस्त्रगार लगभग खाली होते जा रहे हैं और बड़े-बड़े हथियार, जिनके इस्तेमाल नहीं हो पा रहे हैं, लगातार बनते जा रहे हैं। लेकिन दूसरे दृष्टिकोण से देखें, तो अति उन्नत हथियार और दूर तक मार करने वाली क्षमता की मिसाइल की तकनीक हमें कोई दूसरा देश मुहैया नहीं करा सकता या फिर लंबे वक्त तक नहीं दे सकता है। इसलिए इसके निर्माण की स्वदेशी क्षमता का होना जरूरी था और डीआरडीओ इस लक्ष्य में काफी हद तक कामयाब रहा है।
युद्ध में आधुनिक मिसाइलों का इस्तेमाल आखिरी विकल्प होता है। इस मामले में भारत की शुरू से ही 'सेकेंड स्ट्राइकÓ पॉलिसी रही है। 'फर्स्ट स्ट्राइकÓ का मतलब होता है, सबसे पहले मिसाइल दागना। और हमारी रणनीति है कि कोई भी देश अगर हम पर मिसाइल दागता है, तो उसे न्यूट्रलाइज करने के लिए हम उसका जवाब अवश्य देंगे।



हालांकि, अभी जो तनाव है, उसे देखते हुए लगता है कि चीन की नीति हम पर मिसाइल दागने की कभी नहीं रही है, बल्कि वह धीरे-धीरे हमारी जमीन हड़पने की नीति रखता है। हाल की घटनाएं इस तथ्य को और भी पुष्ट करती हैं। ऐसे में, यह तर्क जायज है कि हमें अपनी सेना के तीनों अंगों को अत्याधुनिक और क्षमतावान बनाना होगा। मिलिटरी रिसोर्स व इन्फ्रास्ट्रक्चर पर अधिक काम करने की आवश्यकता है और इसके लिए हथियारों की खरीद बढ़ानी होगी। साथ ही, स्वदेशी हथियार निर्माण में निजी क्षेत्र को भी आने की इजाजत देनी होगी। अगर हम 'री-इन्वेंटिंग द ह्वीलÓ, यानी हर बार फिर से बैलगाड़ी बनाने की सोच से बाहर निकलें, तो यह सब बड़ी आसानी से मुमकिन है और इसे हमारी उन्नत मिसाइल टेक्नोलॉजी साबित कर चुकी है।
इसमें कोई शक नहीं कि मिसाइल डिफेंस पड़ोसी देशों पर एक किस्म का दबाव बनाता है कि अगर उनमें से किसी ने भी सीमाओं का अतिक्रमण किया, तो उसे इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। यह 'सीमित युद्धÓ का भी विकल्प देता है। लेकिन भारत जैसे देश के सामने, जो दोनों तरफ से दुश्मनों से घिरा हुआ है, सुरक्षा व रक्षा के क्षेत्र में कई चुनौतियां हैं और उनसे निपटने का हमारे पास सबसे बड़ा अचूक हथियार युवा शक्ति के रूप में है। पश्चिम के देश चाहते हैं कि भारत अपनी इस क्षमता का अधिक से अधिक इस्तेमाल रक्षा क्षेत्र में करे। अगर भारत उनके सहयोग से इस शक्ति का इस्तेमाल स्वदेशी हथियार निर्माण और विकास प्रणाली में करता है तथा निजी क्षेत्रों के सहयोग से अपने यहां हथियार बनाने के कल-कारखाने खोलता है, तो अगले दस साल में वह न केवल सुरक्षा तैयारियों के तमाम क्षेत्रों में शिखर पर होगा, बल्कि अपने हथियारों को मित्र देशों में बेचकर काफी धन भी कमा पाएगा। ऐसी स्थिति में, भारत की अर्थव्यवस्था में रक्षा क्षेत्र का भी महत्वपूर्ण योगदान होगा, जो अब तक नहीं है, लेकिन इसके लिए मिसाइल टेक्नोलॉजी जैसी नीतियां अपनानी होंगी।