Tuesday, March 26, 2013

गर्मी की छुट्टियों में बन जाइए घूम घुमंतू



मई, जून अभी दूर हैं लेकिन अगर गर्मी की छुट्टियों में घूमने जाने का मन बना रहे हैं तो इसके लिए प्लैनिंग का सही वक्त यही है।
1. मोटर बाइकिंग
लद्दाख
लद्दाख शायद हर बाइकर का सपना होता है। दर्रों के देश यानी लद्दाख पहुंचने के लिए वाकई कई दुर्गम दर्रे पार करने पड़ते हैं, लेकिन जो नजारे इस सफर पर मिलते हैं, शायद ही दुनिया में कहीं और हों।
कब और कैसे जाएं: इस सफर पर मई से अक्टूबर के बीच निकला जा सकता है। अगस्त-सितंबर में बारिश की वजह से जाने से बचें। दिल्ली से मनाली होते हुए लेह की दूरी 1,050 किमी. और श्रीनगर होते हुए 1,250 किमी. है।
क्या है खास: दुनिया का सबसे ऊंचा ठंडा रेगिस्तान और उनके बीच नीले पानी की अनंत विस्तार लिए झीलें, साल भर बर्फ से ढकी रहने वाली दुनिया के सबसे ऊंची सड़कें, रंग-बिरंगे प्रेयर फ्लैग्स से घिरे बौद्ध गोंपा और छोरतेन, मुश्किल हालात में भी सादगी और विनम्रता का संदेश देती संस्कृति।
साच पास
कुछ ऐसे भी लोग हैं, जिन्हें लद्दाख के बर्फ से ढके दर्रे उतना रोमांचित नहीं कर पाते। ऐसे लोगों के लिए है साच पास। हिमाचल प्रदेश के चंबा और पांगी इलाकों को जोड़ने वाला यह दर्रा 4,420 मीटर की ऊंचाई पर है। यहां पहुंचने के चक्कर में लोगों का दम फूलने लगता है और भारी-भरकम बाइक भी जवाब दे जाती हैं।
कब और कैसे जाएं: जुलाई से सिर्फ 3 महीनों के लिए ही यह दर्रा आने-जाने लायक हो जाता है। इस बीच भी बारिश के दिनों में पांगी की तरफ लैंड स्लाइड्स से रास्ता खतरनाक बना रहता है। दिल्ली से पठानकोट और चंबा होते हुए साच पास की दूरी 730 किमी है। वैसे, मनाली-उदयपुर और जम्मू-किश्तवाड़ होते हुए भी साच पास जा सकते हैं।
क्या देखें: रास्ते में पड़ने वाली चुराह और भांदल की खूबसूरत घाटियां, बर्फ की कई मंजिला ऊंची दीवारों से गुजरता साच पास का दुर्गम रास्ता और अगर साच पास पार कर गए, तो दुनिया से कटे जनजातीय इलाके पांगी को देखने का मौका।
2. रूरल टूरिजम
सैलानियों की भीड़-भाड़ और ट्रैफिक की चिल्लपौं से भरे टूरिस्ट स्पॉट्स से मन उकता चुका हो, तो चलिए ऐसे ग्रामीण भारत की सैर पर, जहां जीवन अब भी प्रकृति के करीब है।
गुरेज और तुलैल घाटी
कश्मीर के उत्तर में बसे हैं गुरेज (2600 मीटर ऊंचाई) और तुलैल (2900 मीटर ऊंचाई)। श्रीनगर से गुरेज की दूरी 130 किमी है। कश्मीर में होते हुए भी यहां की संस्कृति कश्मीर से नहीं, बल्कि पाक अधिकृत कश्मीर के इलाके गिलगित और बाल्टिस्तान से मिलती है। तुलैल के लगभग सभी गांवों में मकान लकड़ी के हैं और यहां रहने वाले दर्द कबीले के लोग खेती और पशुओं के सहारे जीवन चलाते हैं।
कब और कैसे जाएं: जून से अक्टूबर तक जा सकते हैं। बारिश के दिनों में राजदान पास के आसपास लैंड स्लाइड्स की वजह से परेशानी हो सकती है। दिल्ली से श्रीनगर और बांडीपोरा होते हुए गुरेज पहुंच सकते हैं।
क्या है खास: गर्मियों में भी बर्फ से ढके पहाड़ों को देखा जा सकता है। चटख नीले आसमान के नीचे हरी दूब के मैदान, उनके बीच से गुजरती किशनगंगा नदी के किनारे पल-पल रंग बदलती हब्बा खातून पहाड़ी अलौकिक नजारा पेश करती है।
खिर्सू
दो-तीन दिन का ही समय हो और दिल्ली से ज्यादा दूर न जाते हुए हिमालय के ग्रामीण जीवन की सादगी को अनुभव करना हो, तो खिर्सू (1800 मीटर ऊंचाई) सही विकल्प है। उत्तराखंड के जिला पौड़ी में बसा यह छोटा सा गांव गढ़वाली संस्कृति की झलक दिखाता है। गांव होने के बावजूद इसकी अपनी वेबसाइट है, जहां तमाम जानकारी उपलब्ध है।
कब जाएं: साल भर कभी भी खिर्सू जा सकते हैं। बारिश के दिनों में भी यहां जाना मुमकिन है। दिल्ली से बिजनौर, कोटद्वार और लैंसडाउन होते हुए इसकी दूरी लगभग 370 किमी है।
क्या है खास: जंगलों से घिरा एक ऊंघता सा गांव है खिर्सू। हिमालय की बर्फ से ढकी श्रंृखला को यहां से दिन भर निहारते रहें या जंगलों में आसपास किसी भी गांव तक छोटा-मोटा ट्रेक कर लें। प्रकृति के ज्यादा से ज्यादा करीब रहना हो, तो यहां खुले आसमान के नीचे टेंटों या बैंबू हट्स में रहने का विकल्प खुला है।
3. ट्रेकिंग
पहाड़ों को खुद ही खंगालने का शौक हो और सामान पीठ पर लादकर चलने का दमखम हो, तो यकीन मानिए स्वर्ग से सुंदर नजारे देखने से आपको कोई नहीं रोक सकता। असली प्राकृतिक सुंदरता तो सड़क से बहुत दूर कहीं वीराने में छिपी होती है, जिसे ट्रेकर्स बखूबी समझते हैं।
हर की दून
हफ्ते भर का समय निकाल सकें, तो गढ़वाल के एक छोर पर स्थित हर की दून (3,560 मीटर) ट्रेकिंग अभियान पर निकल जाएं। स्वर्गारोहिणी चोटी की तलहटी में स्थित हर की दून अब एक जाना-माना ट्रेक बन चुका है। सांकरी नाम के गांव तक तो बस जाती है, लेकिन इसके बाद छह दिन का अभियान आपको पैदल पूरा करना होता है।
कब और कैसे जाएं: दिल्ली से देहरादून और वहां से पुरोला के लिए सीधी बस मिल जाती है। पुरोला से सांकरी के लिए थोड़ी-थोड़ी देर में टैक्सी चलती हैं। यहां ट्रेकिंग का स्तर मॉडरेट है। एक-दो छोटे ट्रेक करने के बाद ही इस ट्रेकिंग अभियान पर जाना मुनासिब होगा।
क्या है खास: बीच में ठहरने के लिए सरकार ने तीन जगह रेस्ट हाउस बनाए हैं, लेकिन अगर आप अभियान का असली लुत्फ उठाना चाहें, तो ग्रामीणों के साथ उनके घर में रहें। अगर अनुभवी ट्रेकर हैं, तो हर की दून से आगे बोड़ासू पास होते हुए हिमाचल के किन्नौर जिले (छितकुल गांव) में निकल सकते हैं।
चोपता-तुंगनाथ
उत्तराखंड में स्थित पंदकेदार मंदिरों में से एक होने की वजह से तुंगनाथ का धार्मिक महत्व है। इस वजह से यहां कुछ खास मौकों पर हर उम्र के श्रद्धालुओं को ट्रेकिंग करते देखा जा सकता है। बेस कैंप चोपता है, जहां से करीब 3-4 घंटे की चढ़ाई के बाद तुंगनाथ पहुंचते हैं।
कब और कैसे जाएं: अप्रैल से अक्टूबर के बीच यह ट्रेक किया जा सकता है। दिल्ली से रुदप्रयाग या ऊखीमठ होते हुए चोपता जा सकते हैं। आसान ट्रेक है और दूरी कम होने की वजह से एक दिन में पूरा किया जा सकता है।
क्या है खास: रास्ते में पड़ने वाले हरे-भरे बुग्याल और उन पर अठखेलियां करते बादल थकान हर लेते हैं। चाहें तो तुंगनाथ में एक रात कैंपिंग कर या चाय की दुकानों में बिताकर अगले दिन चंदशिला (4,000 मीटर) तक ट्रेक कर सकते हैं। इस चोटी पर खड़े होकर अपने चारों ओर बर्फ से ढकी चोटियां को निहारें।
4. ऐतिहासक भारत
भारत की हजारों साल प्राचीन सांस्कृतिक विरासत इतनी समृद्ध है कि लोग इसके मोहपाश से बच नहीं पाते। इतिहास के पन्नों में दर्ज ऐसी ही कुछ जगहों से आप खुद इन छुट्टियों में रूबरू हो सकते है।
ओरछा
इतिहास में कभी राजा-महाराजाओं की गद्दी रह चुका ओरछा आज बेतवा नदी के किनारे पहाडि़यों से घिरा छोटा सा गांव है। बेतवा के दोनों छोर पर बने ऐतिहासिक मंदिरों, महलों और छतरियों के बीच खुले आसमान के तले कैंपिंग का मजा ही कुछ और है।
कब और कैसे जाएं: ओरछा का मौसम दिल्ली जैसा है। मार्च-अप्रैल और अक्टूबर-नवंबर सबसे बढि़या समय है। दिल्ली से झांसी होते हुए ओरछा की दूरी लगभग 450 किमी है। दिल्ली से झांसी के लिए कई ट्रेन हैं। यमुना एक्सप्रेसवे, ग्वॉलियर और दतिया होते हुए लॉन्ग-ड्राइव भी की जा सकती है।
क्या है खास: अद्भुत वास्तुकला से सजे यहां के प्राचीन मंदिर, ऐतिहासिक महल और छतरियां चंदेल और बुंदेल साम्राज्य की निशानी हैं। कहते हैं यहां बेतवा नदी के किनारे बना रामराजा मंदिर पूरी दुनिया में अकेला ऐसा मंदिर है, जहां श्री राम को राजा के रूप में पूजा जाता है।


तवांग
अरुणाचल प्रदेश का खूबसूरत जिला है तवांग। ऐतिहासिक दृष्टि से यह बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए महत्वपूर्ण है। यहां छठे दलाई लामा का जन्म हुआ था। यह इलाका भारत से सिर्फ एक तरफ से जुड़ा है, बाकी दिशाओं में भूटान और तिब्बत इसके पड़ोसी हैं।
कब और कैसे जाएं: अप्रैल से अक्टूबर के बीच तवांग खुला रहता है। सर्दियों के मौसम में सेला पास पर भारी बर्फ बारी की वजह से तवांग बाकी दुनिया से कट जाता है। दिल्ली से गुवाहाटी (1900 किमी) तक ट्रेन या फ्लाइट से और उसके बाद सड़क से बोमडिला होते हुए तवांग पहुंचा जा सकता है। गुवाहाटी से तवांग के बीच एक दिन का समय लग जाता है। यहां आने के लिए इनर लाइन परमिट जरूरी है, जो दिल्ली और गुवाहाटी में मिलता है।
क्या है खास: तिब्बत की राजधानी ल्हासा के बाद तवांग मोनेस्ट्री दुनिया की सबसे पुरानी मोनेस्ट्री है। इस तिमंजिला गोंपा में 500 से ज्यादा लामा पढ़ाई करते हैं। खूबसूरत झील, बर्फीले पहाड़ और भारतीय सैनिकों की वीरगाथा बयां करते वॉर मेमोरियल भी देखने लायक हैं।
5. स्प्रिचुअल
क्यों न इस बार छुट्टियों में सिर्फ घूमने के बजाय कुछ ऐसा किया जाए, जिससे आप घर लौटकर शारीरिक, मानसिक और रूहानी तौर पर तरोताजा महसूस करें।
तीर्थ यात्राएं
आप पारंपरिक तीर्थों की यात्रा कर सकते हैं। इनमें प्रमुख हैं - चार धाम यात्रा (बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री) (उत्तराखंड), अमरनाथ (कश्मीर), रामेश्वरम, तिरुपति और मदुरै (दक्षिण भारत), शिर्डी (महाराष्ट्र)। इन सभी यात्राओं के लिए आजकल कई तरह के पैकेज मिल जाते हैं।
कैलास मानसरोवर यात्रा
कैलास पर्वत हिन्दू मान्यताओं के मुताबिक भगवान शिव का घर है, जबकि मानसरोवर की मान्यता हिन्दू और बौद्ध धर्म में भी है। वैसे तो कैलाश-मानसरोवर तिब्बत में स्थित हैं, लेकिन तिब्बत पर चीन का कब्जा होने की वजह से चीन सरकार से वीजा लेना पड़ता है। भारत सरकार की आधिकारिक यात्रा के अलावा आप प्राइवेट टूर ऑपरेटरों के जरिए इस यात्रा पर जा सकते हैं। भारत सरकार वाली यात्रा कुमायूं होकर और प्राइवेट एजेंसियों की यात्रा नेपाल से जाती है। इन यात्राओं में एक आदमी का खर्च 1 लाख रुपये से ज्यादा आता है।
कब और कैसे जाएं: भारत सरकार इस साल यात्रा का आयोजन जून से सितंबर के बीच कर रही है, लेकिन इसके रजिस्ट्रेशन की अंतिम तारीख निकल चुकी है। आप चाहें तो नेपाल के रास्ते इस यात्रा पर जा सकते हैं, जिसके लिए प्राइवेट टूर ऑपरेटरों से संपर्क करें।
6. हेल्थ टूरिज्म
आनंद स्पा रेजॉर्ट
आप चाहें, तो ऋषिकेश के पास आनंद स्पा रेजॉर्ट जा सकते हैं। यहां कुछ समय प्रकृति के बीच बिताकर अपने शरीर के साथ-साथ मन और आत्मा में भी नए जीवन का संचार किया जा सकता है। यहां प्राचीन स्पा पद्धति की उपचारात्मक शक्तियों से शरीर में एक खास तरह की ताजगी का अहसास होता है।
कब और कैसे जाएं: साल भर कभी भी जा सकते हैं। गर्मियों में भी यहां अधिकतम तापमान 30 डिग्री के आसपास रहता है। दिल्ली से ऋषिकेश होते हुए टिहरी रोड पर नरेंद्र नगर तक जाएं। आनंद स्पा नरेंद्र नगर के पास स्थित है।
7. वॉटर स्पोर्ट्स
हममें से कई ऐसे हैं, जिन्हें पानी में खेलना पसंद है। अब अपने देश में भी ऐसे लोगों को छुट्टी बिताने के लिए कई विकल्प मिल रहे हैं।
ऋषिकेश और मनाली
पहाड़ी नदियों का शोर रोमांचक होता है। ऐसी नदियों के तेज बहाव में किसी पत्ते की तरह बहते, उलटते-पुलटते राफ्ट पर सवार होकर मंजिल तक पहुंचना रोंगटे खड़े कर देने वाला अहसास है। पिछले कुछ समय से दिल्ली के आसपास रिवर राफ्टिंग कई जगहों पर होने लगी है, लेकिन ऋषिकेश और मनाली प्रमुख हैं।
अलप्पी (केरल)
खुले आसमान के नीचे पानी पर तैरते घरों में छुट्टी बिताने का अहसास रूमानी कर देता है। वैसे, हाउसबोट्स का नाम सुनते ही जहन में श्रीनगर की मशहूर डल झील की तस्वीर उभरती है, लेकिन केरल में अलप्पी के बैक वॉटर्स में हाउस बोट्स पर तैरने का अनुभव थोड़ा अलग है। नारियल के पेड़ों की छांव में तैरते हाउसबोट्स में साउथ इंडियन खाने का आनंद कहीं और मिलना मुश्किल है।



लक्षद्वीप
पर्यटकों की भीड़ में साफ -सुथरे समुदी बीच की तलाश करते थक गए हैं, तो अरब सागर में बिखरे खूबरसूरत द्वीपों के समूह लक्षद्वीप जाएं। यहां जाने के लिए प्रशासन से स्पेशल परमिशन लेनी पड़ती है। इस नियंत्रण की वजह से यहां पर्यटन को अनुशासित तरीके से चलाया जा रहा है, जिसका सीधा असर द्वीपों की साफ सफाई और व्यवस्था में दिखाई पड़ता है। स्कूबा डाइविंग, कयाकिंग, कैनोइंग जैसे कई वॉटर स्पोर्ट्स का लुत्फ यहां उठाया जा सकता है। यहां जाने का सबसे अच्छा समय दिसंबर से मई तक है। कोच्चि (केरल) लक्षद्वीप का प्रवेश द्वार है। यहीं से आप लक्षद्वीप जाने की परमिशन ले सकते हैं और यहीं से फ्लाइट या शिप से लक्षद्वीप आ-जा सकते हैं।

Monday, March 25, 2013

बुरा न मानो, मिलावट जारी है





शहर के सड़क के किनारे लगाने वाले ठेले हो या अन्य बाजारों में लगने वाली दुकाने यहां कुछ भी शुद्ध नहीं है। शुद्धता का दावा करने वाले कई नामचीन रेस्टोरेंट भी मोटी कमाई के चक्कर में लोगों के स्वास्थ्य के साथ जमकर खिलवाड़ कर रहें हैं। होली के त्योहार पर भी नकली खोए से बनी मिठाइयों से ही त्योहारों की रौनक बनाने की तैयारी है। हालांकि विभागीय अधिकारियों की तंद्रा समय-समय पर भंग होती रही है लेकिन वह सिर्फ कागजी खानापूर्ति के लिए होती रही है।
पनीर भी नकली
पनीर दूध के बजाय पाम आयल से बनाया जा रहा है। 125 रुपये में तैयार पांच किलो सिंथेटिक पनीर असली दामों पर बेंचा जा रहा है। स्किंड मिल्क की बची सामाग्री को सोडियम बाई कार्बोनेट खाने का सोडा से तैयार घोल में गर्म करके पाम आयल, वेजिटेबल आयल डालकर पनीर बनाया जा रहा है।
मावे में अरारोट
मावा दूध की क्रीम निकालकर रिफाइंड और वनस्पति घी मिलाकर बनते हैं। खुशबू के लिए हाइड्रो और पपड़ी केमिकल डाला जाता है। सूखा पाउडर खोए में सूखा मिल्क पाउडर, पानी, वनस्पति घी, हाइड्रो और पपड़ी केमिकल मिलाया जाता है।
दूध भी नहीं शुद्ध 
दूध में कार्बोनेट, फार्मलीन, यूरिया, खराब मिल्क पाउडर, हैंडपंप या तालाब का पानी मिलाया जा रहा है। जानकारों की माने तो एक लीटर दूध में छह फीसद फैट और नौ फीसद प्रोटीन, विटामिन, मिनरल और कार्बोहाइड्रेट होता है। मिलावट से फैट कम हो जाता है।
ऐसे करें पहचान
लाल मिर्च- सीसे के गिलास में पानी भरे उसमें लाल मिर्च डाल दे यदि गिलास की तली में नीचे कुछ जमा होता है तो समझ ले कि मिलावट की गई है।
चाय पत्ती- दो चम्मच चाय की पत्ती लेकर उस पर चुंबक घुमाएं यदि उस पर लोहे के बुरादे का मिश्रण होगा तो बुरादे चिपक जाएंगे। दूसरा तरीका यह है कि कागज की गेंद बनाकर उसी में जलाएं यदि चमड़े का मिश्रण होगा तो महक आएगी।
धनिया व मसाले
शीशे के गिलास में पानी में धनिया डालने पर बुरादे का मिश्रण होने पर बुरादा ऊपर तैरने लगता है।
हल्दी
गीले कागज पर हल्दी छिड़क कर कागज छिड़क दें। हल्दी रंग छोड़ देगी।
देसी घी
हथेली के पिछले हिस्से में देशी घी रगड़ने पर मिलावट है तो दाने बन जाते हैं।
बीमारियों को दावत
वरिष्ठ फिजीशियन डा. राजीव सौरभ बताते हैं कि कृत्रिम रंग और रसायन पेट, त्वचा और हृदय को प्रभावित करते हैं। सिंथेटिक पनीर, मेवा, दूध और तेल लीवर और किडनी को डैमेज करता है। रक्त धमनियों में थक्का जमने से हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है।
पैकिंग पर न जाएं
सुंदर दिखने वाले तेल, बेसन और मसाले के पैकेट शुद्ध हैं, यह बिल्कुल न सोचे। प्रतिबंधित रंग और केमिकल मिलाए जा रहा है। बेसन में मटरी, पीली मिट्टी, मसालों में रंग, काली मिर्च में पपीते के बीज,धनिया में लीद मिलाई जा रही है।

Saturday, March 23, 2013

ऊर्जा का जबर्दस्त सोत बनेगी जलती बर्फ



तेल और गैस के भारी आयात ने भारत का व्यापार घाटा बहुत बढ़ा दिया है। यह चीज देश की तेज आर्थिक वृद्धि की राह में रोड़ा बन रही है। लेकिन पिछले हफ्ते जापान ऑयल गैस एंड मेटल्स नैशनल कॉरपोरेशन (जेओजीएमईसी) की एक तकनीकी उपलब्धि हमारे लिए अंधेरे में आशा की किरण बनकर आई है। वे लोग समुद तल पर जमा मीथेन हाइड्रेट के भंडार से प्राकृतिक गैस निकालने में कामयाब रहे। इस चीज को आम बोलचाल में फायर आइस या जलती बर्फ भी कहते हैं, क्योंकि यह चीज सफेद ठोस क्रिस्टलाइन रूप में पाई जाती है और ज्वलनशील होती है। भारत के पास संसार के सबसे बड़े मीथेन हाइड्रेट भंडार हैं। तकनीकी प्रगति के जरिये अगर इसके दोहन का कोई सस्ता और सुरक्षित तरीका निकाला जा सका तो देश के लिए यह बहुत बड़ा वरदान साबित होगा।
गैस का भंडार
जेओजीएमईसी का कहना है कि 2016 तक वह इस स्त्रोत से वाणिज्यिक पैमाने पर गैस का उत्पादन शुरू कर सकता है। इस बीच चीन और अमेरिका ने भी फायर आइस की खोज और इसके प्रायोगिक उत्कर्षण को लेकर बड़े कार्यक्रम बनाए हैं। अफसोस की बात है कि भारत इस तस्वीर में कहीं नहीं है। दुनिया में इस चीज की कुल मात्रा के बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं है। यह मात्रा 28 हजार खरब से लेकर 80 अरब खरब घन मीटर गैस के समतुल्य आंकी जाती है। संसार में मौजूद कुल 4400 खरब घन मीटर पारंपरिक गैस की तुलना में यह मात्रा कई गुना ज्यादा है। यह बात और है कि हाइड्रेट भंडारों के एक छोटे हिस्से का ही इस्तेमाल गैस उत्पादन में किया जा सकेगा।
जलती बर्फ का राज
मीथेन हाइड्रेट प्राकृतिक गैस और पानी का मिश्रण है। गहरे समुद्र तल पर पाई जाने वाली निम्न ताप और उच्च दाब की विशेष स्थितियों में यह ठोस रूप धारण कर लेता है। कनाडा और रूस के स्थायी रूप से जमे रहने वाले उत्तरी समुद्रतटीय इलाकों में यह जमीन पर भी पाया जाता है। इन जगहों से निकाले जाने के बाद इसे गरम करके या कम दबाव की स्थिति में लाकर (जेओजीएमईसी ने यही तकनीक अपनाई थी) इससे प्राकृतिक गैस निकाली जा सकती है। एक लीटर ठोस हाइड्रेट से 165 लीटर गैस प्राप्त होती है। यह जानकारी काफी पहले से है कि भारत के पास मीथेन हाइड्रेट के बहुत बड़े भंडार हैं। अपने यहां इसकी मात्रा का अनुमान 18,900 खरब घन मीटर का लगाया गया है। भारत और अमेरिका के एक संयुक्त वैज्ञानिक अभियान के तहत 2006 में चार इलाकों की खोजबीन की गई। ये थे- केरल-कोंकण बेसिन, कृष्णा गोदावरी बेसिन, महानदी बेसिन और अंडमान द्वीप समूह के आसपास के समुद्री इलाके। इनमें कृष्णा गोदावरी बेसिन हाइड्रेट के मामले में संसार का सबसे समृद्ध और सबसे बड़ा इलाका साबित हुआ। अंडमान क्षेत्र में समुद तल से 600 मीटर नीचे ज्वालामुखी की राख में हाइड्रेट के सबसे सघन भंडार पाए गए। महानदी बेसिन में भी हाइड्रेट्स का पता लगा।
बहरहाल, आगे का रास्ता आर्थिक और पर्यावरणीय चुनौतियों से होकर गुजरता है। हाइड्रेट से गैस निकालने का किफायती तरीका अभी तक कोई नहीं खोज पाया है। उद्योग जगत का मोटा अनुमान है कि इस पर प्रारंभिक लागत 30 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू (मिलियन मीट्रिक ब्रिटिश थर्मल यूनिट) आएगी, जो एशिया में इसके हाजिर भाव का दोगुना और अमेरिका में इसकी घरेलू कीमत का नौगुना है। जेओजीएमईसी को उम्मीद है कि नई तकनीक और बड़े पैमाने के उत्पादन के क्रम में इस पर आने वाली लागत घटाई जा सकेगी। लेकिन पर्यावरण की चुनौतियां फिर भी अपनी जगह कायम रहेंगी। गैस निकालने के लिए चाहे हाइड्रेट को गरम करने का तरीका अपनाया जाए, या इसे कम दाब की स्थिति में ले जाने का, या फिर ये दोनों तरीके एक साथ अपनाए जाएं, लेकिन हर हाल में गैस की काफी बड़ी मात्रा रिसकर वायुमंडल में जाएगी और इसका असर पर्यावरण पर पड़ेगा। कार्बन डाई ऑक्साइड की तुलना में प्राकृतिक गैस 15-20 गुना गर्मी रोकती है। पर्यावरण से जुड़ी इन आशंकाओं के चलते कई देशों ने अपने यहां शेल गैस का उत्पादन ठप कर दिया है और हाइड्रेट से गैस निकालने के तो पर्यावरणवादी बिल्कुल ही खिलाफ हैं। लेकिन शेल गैस के रिसाव को रोकना ज्यादा कठिन नहीं है। कौन जाने आगे हाइड्रेट गैस के मामले में भी ऐसा हो सके।
काफी पहले, सन 2006 में मुकेश अंबानी ने गैस हाइड्रेट्स के बारे में एक राष्ट्रीय नीति बनाने को कहा था, लेकिन आज तक दिशा में कुछ किया नहीं जा सका है। अमेरिका, जापान और चीन में हाइड्रेट्स पर काफी शोध चल रहे हैं लेकिन भारत में इस पर न के बराबर ही काम हो पाया है। राष्ट्रीय गैस हाइड्रेट कार्यक्रम के तहत पहला इसके भंडार खोजने के लिए पहला समुदी अभियान भी 2006 में चला था। दूसरे अभियान की तब से अब तक बात ही चल रही है। कुछ लोग इस उम्मीद में हैं कि अमेरिका और जापान जब गैस निकालने की तकनीक विकसित कर लेंगे तो हम इसे सीधे उनसे ही खरीद लेंगे। लेकिन यह उम्मीद बेमानी है। भारत के बड़े सबसे बड़े हाइड्रेट भंडार, जिनमें कृष्णा गोदावरी बेसिन भी शामिल है, समुदी चट्टानों की दरारों में हैं, जबकि जापान और अमेरिका में ये बलुआ पत्थरों में पाए जाते हैं। जाहिर है, अमेरिका और जापान की उत्कर्षण तकनीकें बिना सुधार के हमारे यहां काम नहीं आने वाली। अपनी तकनीकी क्षमता हमें खुद ही विकसित करनी होगी।
गलत प्राथमिकताएं
भारत के हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय ने काफी पहले एक राष्ट्रीय गैस हाइड्रेट शोध व विकास केंद्र स्थापित करने की गुजारिश की थी। इसे सरकारी निकाय न बनाया जाए। निजी क्षेत्र की तेल व गैस कंपनियों को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए। इसके साथ ही भारतीय समुद्री क्षेत्र में हाइड्रेट भंडारों की और ज्यादा खोज और पुष्टि के लिए जापान और अमेरिका के साथ कुछ और साझा अभियान भी चलाए जाने चाहिए। अभी तो ड्रिलिंग के जरिये निकाले गए हाइड्रेट्स के नमूनों को जांच के लिए विदेशी प्रयोगशालाओं में भेजा जा रहा है। यह दयनीय स्थिति हमारी गलत प्राथमिकताओं की ओर इशारा करती है, और हर हाल में इसे बदलना ही होगा।

जल है तो हम हैं



तुमने कई बार सुना होगा कि पानी के बिना हम जी नहीं सकते। पानी के बिना सब सूना है। पर क्या इस बात को महसूस भी किया है? यदि नहीं तो 22 मार्च को आ रहे विश्व जल दिवस पर तुम केवल एक दिन सुबह उठने से लेकर रात को सोते समय तक कब-कब तुमने पानी का इस्तेमाल होते हुए देखा, यह नोट करो। तुम्हें खुद ही समझ आ जाएगा कि पानी कितना जरूरी है। 
पानी अनमोल है। यह कितना जरूरी है, इसका अंदाजा इसी बात से ही लगा सकते हो कि अगर धरती पर पानी नहीं होगा तो न पेड़-पौधे होंगे, न जल की रानी मछली होगी, न शेर होगा, न तोते और गौरैया और न ही मनुष्य। छोटे-छोटे कीड़ों से लेकर बड़े पेड़ों को जीवित रहने के लिए पानी की जरूरत होती है। तुम ऐसा मान सकते हो कि जैसे सांस लेने के लिए हवा जरूरी है, वैसे ही जीने के लिए पानी।
हमारे शरीर में 70 प्रतिशत पानी होता है। पानी हमारे शरीर की कोशिकाओं और खून में होता है। यह शरीर के तापमान को नियंत्रित रखता है। यहां तक कि खाना पचाने के लिए भी पानी की जरूरत होती है। साथ ही ऑक्सीजन लेने के लिहाज से भी पानी जरूरी होता है।
पानी की तीन अवस्थाएं होती हैं। ठोस, द्रव और गैस। ठोस पानी को बर्फ कहा जाता है, द्रव अवस्था में पानी हम हर रोज इस्तेमाल करते ही हैं। और जब पानी उबलकर भांप बनता है या सूर्य की किरणों से वाष्पीकृत होकर ऊपर चला जाता है तो यह उसकी गैस अवस्था होती है। गैस अवस्था ही बारिश होने का कारक बनती है। पृथ्वी में पानी सतह के ऊपर नदियों, झरनों के रूप में मिलता है। सतह के नीचे भी पानी होता है। तुम्हें यह जानकर हैरत होगी कि दुनिया की करीब 90त्नआबादी को सीधे तौर पर साफ पानी नहीं मिलता है।
18% पानी पीने लायक नहीं
दिल्ली एमसीडी के आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली जल बोर्ड द्वारा सप्लाई किया गया 18% पानी पीने लायक नहीं होता है और शहर का हर पांचवां आदमी प्रदूषित पानी पीता है। दिल्ली में करीब 60% घरों में दिल्ली जल बोर्ड का पानी प्रयोग होता है। प्रदूषित पानी पीने से कॉलरा, टायफायड, पीलिया जैसी बीमारियां हो जाती हैं। दिल्ली में औसत रूप से हर व्यक्ति को पेरिस और एम्सटर्डम की तुलना में अधिक पानी मिलता है। यहां औसतन प्रति व्यक्ति को 191 लीटर पानी मिलता है, पर उन लोगों को जहां हर समय पानी उपलब्ध होता है, वहीं दिल्ली के कुछ इलाकों में एक दिन में मुश्किल से तीस मिनट पानी मिल पाता है। समाजसेवी और पर्यावरणविद् डॉ. संजय कुमार कहते हैं, 'इतना पानी पीने के बावजूद अगर पानी की परेशानी है तो उसका कारण पानी का सही वितरण न होना और ज्यादा व्यर्थ होना है।Ó
पानी से ही गुलजार है कुदरत की खूबसूरती
कहते हैं कि कुदरत ने अपनी खूबसूरती चप्पे-चप्पे पर बिखेरी है। लहराते पेड़-पौधे हों या कल-कल कर बहते झरने, सभी इस कायनात में चमत्कार की तरह लगते हैं। एक से एक सुंदर दृश्य मन में ताजगी भर देते हैं। दुनिया भर में फैली यह खूबसूरती पानी की वजह से ही है।
जोन्हा फॉल: यह झरना झारखंड में है। गौतम बुद्ध के नाम पर इस झरने का नाम गौतम धारा पड़ गया। पास ही में यहां दो बौद्ध मंदिर हैं, जो राजा बलदेव राय द्वारा बनवाए गए थे।
आंद्रपल्ली (अतिरापल्ली) फॉल: यह झरना केरल के त्रिशूर जिले में स्थित है। इस झरने की लंबाई 80 फीट है। यह झरना कालकुंडी नदी पर है। 
धुंआधार फॉल: मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले में यह झरना नर्मदा नदी पर स्थित है। यह जगह मार्बल रॉक के नाम से मशहूर है। 
केम्पटी फॉल: मंसूरी का यह फॉल उत्तरांचल का मुख्य आकर्षण है।
वसुधारा फॉल: यह झरना उत्तरांचल के बद्रीनाथ में स्थित है। इसकी खूबसूरती देखते ही बनती है।
दूधसागर फॉल: यह झरना गोवा में स्थित है। इसकी मुख्य विशेषता यह है कि इसका पानी दूध के समान है। यह मांडवी नदी पर है। यह भारत का पांचवां सबसे लंबा झरना है।
हम बनेंगे जल के रक्षक
ब्रश करते समय पानी का नल बंद रखेंगे। 
पांच मिनट से ज्यादा शावर नहीं चलाएंगे। फव्वारे या टब में बैठकर नहाने से पानी अधिक खर्च होता है, इसलिए ऐसा करने से बचेंगे।
पेंट, थर्मामीटर, कीटनाशक और पारे को नदी, नाले और सीवर में नहीं डालेंगे। इससे न सिर्फ पानी को दोबारा साफ करने में कठिनाई होती है, बल्कि पानी में सेहत को नुकसान पहुंचाने वाले जहरीले तत्व मिल जाते हैं। 
बारिश के पानी को इक_ा करके उसका इस्तेमाल गाड़ी धोने या पौधों को देने में करेंगे।
टॉयलेट में पानी की टंकी को आधा दबाएंगे
किसी भी पाइप या नल में से पानी टपक रहा है तो उसको ठीक करवाएंगे।
रीसाइकलिंग से बच सकता है पानी
क्या तुम जानते हो कि अगर गंदे पानी का दोबारा इस्तेमाल किया जाए तो पानी की किल्लत को काफी हद तक दूर किया जा सकता है। पानी की समस्या को हल करने में रीसाइकलिंग एक बेहतर विकल्प हो सकता है। दिल्ली जल बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली में रीसाइकिल किए गए करीब 255 मिलियन गैलन पानी का प्रतिदिन प्रयोग पीने के अलावा अन्य कामों में भी होता है। कुछ पानी का प्रयोग दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन के द्वारा बसों को धोने और साफ करने में प्रयोग होता है, तो कुछ पानी एनडीएमसी और सीपीडब्ल्यूडी द्वारा हॉर्टकिल्चर के लिए होता है।
बेशकीमती है पानी
पानी अपने कई गुणों के कारण बेहतर होता है। कल्पना कीजिए कि अगर पानी में ये गुण न हों तो क्या हो? अगर पानी के कोहेसिव और एडहेसिव गुण (जिसके कारण अणु आपस में जुड़ते हैं और दूर होते हैं) खत्म हो जाएं तो आईड्रॉप से बूंद नहीं गिरेगी।
डिटर्जेट के इस्तेमाल से उठने वाला झाग भी नहीं उठ सकेगा।
अगर पानी में घुलना बंद हो जाए तो
तुम चाय या कॉफी नहीं पी सकोगे।
साबुन से बर्तन-कपड़े नहीं धुल सकेंगे।
अगर पानी में हटने का गुण न हो तो 
नहाने के बाद शरीर नहीं सूखेगा।
न तो कार के वाइपर काम करेंगे और न ही घर की सफाई के लिए पानी का इस्तेमाल हो पाएगा।
जल का सच 
सोलर सिस्टम में धरती एकमात्र ऐसा ग्रह है, जहां पर नदियां और समुद्र हैं और बारिश होती है। 
एक व्यक्ति खाने के बिना एक महीने से अधिक जीवित रह सकता है, वहीं पानी के बिना एक हफ्ते से अधिक जीवित रहना मुश्किल होता है। 
धरती पर 75 प्रतिशत पानी है। 
पृथ्वी का 97 प्रतिशत पानी समुद्रों में है। सिर्फ तीन प्रतिशत पानी का प्रयोग ही पीने के लिए किया जाता है। 
एक गैलन पानी 3.7865 लीटर पानी के बराबर होता है। 
दुनिया के करीब आधे स्कूलों में साफ पानी उपलब्ध नहीं है। 
विश्व की सबसे लंबी नदी नील है।
पानी से बिजली का निर्माण भी किया जाता है। दुनिया में कई हाइड्रॉलिक पावर स्टेशन लगे हैं। 
बीते सौ सालों में दुनिया के आधे से अधिक जलाशय गुम हो गए हैं।
तेल की एक बूंद से 25 लीटर पानी पीने लायक नहीं रहता।

Friday, March 22, 2013

यूं सामना करें जब आए आपात स्थिति



कई बार अचानक कार्डिएक अटैक की समस्या सामना करता पड़ता है तो कई बार अस्थमा परेशान कर देती है। कुछ खाने-पीने के बाद अचानक सांस फंसने-फूलने लगती है और कई बार हाथ जल या कट जाता है।
जानलेवा आपात स्थितियां कभी भी, कहीं भी हो सकती हैं। इनकी वजह कोई स्वास्थ्य समस्या, दुर्घटना, जहरीले पदार्थ का सेवन, प्राकृतिक आपदा या हिंसा हो सकती है। हम आपको बता रहे हैं कार्डिएक अरेस्ट, चोकिंग (सांस की नली या गले में किसी बाहरी वस्तु का फंस जाना) और अस्थमा अटैक के अचानक हुए हमले में क्या करें कि पीडिम्त की जान बचाई जा सके।
कार्डिएक अरेस्ट
कार्डिएक अरेस्ट में दिल के बंद होने से रक्त का संचरण पूरी तरह बंद हो जाता है। लक्षण नजर आने के कुछ ही मिनटों में मरीज की मौत हो जाती है। हार्ट फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. के. के. अग्रवाल कहते हैं, अगर कार्डिएक अरेस्ट होने के कुछ मिनटों में पीडिम्त को आकस्मिक और डॉक्टरी सहायता उपलब्ध करा दी जाए तो उसके जीवित रहने की संभावना 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।
क्या करें
हार्ट एसोसिएशन के दिशा-निर्देशों के अनुसार कार्डिएक अरेस्ट आने के दस मिनट के भीतर छाती को दबाकर और तेजी से थपथपाकर तथा कृत्रिम श्वास द्वारा दिल को रिवाइव करने की कोशिश करें। ऐसा न करने पर स्थिति बिगड़ सकती है।
सबसे पहले मरीज की धड़कन चेक करें। अगर धड़कन नहीं चल रही हो तो सीपीआर (कार्डियो पल्मोनरी रिससिटेशन) शुरू कर दें।
सीपीआर में छाती को तेजी से दबाकर और तेजी से थपथपाकर तथा कृत्रिम श्वास द्वारा दिल को रिवाइव करने की कोशिश की जाती है।
सीपीआर से ऑक्सीजन युक्त रक्त का संचरण मस्तिष्क और हृदय में करने में मदद मिलती है।
सीपीआर
छाती को जोर-जोर से और तेजी से दबाएं।
ध्यान रहे आपका हाथ छाती के बीच में होना चाहिए। एक हाथ को हथेली की तरफ से छाती पर रखें, दूसरे हाथ को भी हथेली की ओर से ही पहले हाथ पर 90 डिग्री का कोण बनाते हुए रखें। छाती को 30 बार दबाएं, गिनती को जोर से गिनें। दबाने की रफ्तार प्रति मिनट 100 होनी चाहिए।
ढेर से दो इंच (4-5 से.मी.) दबाने के बाद छाती को सजह छोड़ दें। कोई हस्तक्षेप न करें।
सांस चेक करें। सांस नहीं चल रही हो तो रेस्क्यू ब्रीद (मुंह से कृत्रिम सांस) दें।
30 कंप्रेशन और दो कृत्रिम श्वास इन्हें बारी-बारी से दोहराएं।
अस्थमा
अस्थमा श्वास संबंधी रोग है। इसमें श्वास नलिकाओं में सूजन आने से वह सिकुड़ जाती हैं, जिससे सांस लेने में तकलीफ होती है। लेकिन कई बार सर्द हवाओं के संपर्क में आने, अत्यधिक व्यायाम करने, कम वायु दाब वाले स्थानों जैसे पहाड़ों पर, वायु प्रदूषण या बारिश में भीगने पर अचनक अस्थमा का प्रकोप बढ़ जाता है और मरीज की सांसें उखड़ने लगती हैं। इसे अस्थमा अटैक कहते हैं। अटैक अधिक तीव्र होने पर मरीज बेहोश भी हो जाता है।
क्या करें
अस्थमा के रोगी नियमित रूप से दवाओं का सेवन करें और उन कारकों से बचें, जिनसे अस्थमा होता है तो अस्थमा के अटैक का खतरा टाला जा सकता है। परंतु फिर भी यदि कोई इमरजेंसी हो जाए तो-
बिना कोई देर किए डॉक्टर द्वारा दी दवाएं लें।
सीधे बैठ जाएं, लेटें बिल्कुल भी नहीं।
कपड़ों को ढीला कर लें, संभव हो तो आरामदायक कपड़े पहन लें।
शांत रहने का प्रयास करें।
डॉक्टर से संपर्क करें या बिना देर किए नजदीक के किसी अस्पताल में जाएं।
अगर व्यक्ति अस्थमा की कोई दवाई जैसे इनहेलर आदि इस्तेमाल कर रहा हो तो, उसे इस्तेमाल करने में उसकी मदद करें।


चोकिंग
चोकिंग तब होता है, जब कोई बाहरी वस्तु गले या सांस की नली में अटक जाती है और हवा के प्रवाह को अवरुद्ध कर देती है। बड़ों में अधिकतर खाने की कोई चीज फंस जाती है और कई बार बच्चे कोई छोटी चीज निगल लेते हैं। चोकिंग से मस्तिष्क को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती, इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि जितनी जल्दी से जल्दी हो सके, प्राथमिक उपचार उपलब्ध कराया जाए।
लक्षणों की जांच करें
चोकिंग का सामान्य लक्षण है कि पीडित अपने गले को हाथों से दबाता है। यह नहीं होता है तब इन संकेतों को समझें।
बोल नहीं पाना।
सांस लेने में तकलीफ होना।
त्वचा, होंठ और नाखून नीले या धूसर पड़ने लगना।
बेहोशी की स्थिति आने लगना।
क्या करें
चोकिंग होने पर रेड क्रॉस ने प्राथमिक उपचार देने के लिए ‘पांच और पांच’ की सिफारिश की है:’कमर पर पीछे कंधे की ब्लैड के बीच में मुट्ठी से पांच धीमे-धीमे मुक्के मारें।
व्यक्ति के पीछे खड़े हो जाएं। अपनी बांहें उसकी कमर के आसपास लपेट दें। व्यक्ति को थोड़ा-सा आगे की ओर झुका दें।
एक हाथ की मुट्ठी बांध लें। इसे व्यक्ति की नाभी के थोड़ा-सा ऊपर रखें।
मुट्ठी को दूसरे हाथ से पकड़ें। उसे पेट में अंदर और ऊपर की ओर तेजी से दबाएं, जैसे आप उसे उठाने का प्रयास कर रहें हों।
कुल पांच बार जोर-जोर से पेट में अंदर की ओर झटके दें। फिर भी ब्लॉकेज न निकले तो इसे पांच-पांच के समूह में दोहराते रहें।
चिकित्सा सहायता पहुंचने से पहले अगर व्यक्ति बेहोश होने लगे तो उसे सीपीआर और कृत्रिम श्वास दें। वैसे अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन कमर पर घूंसे मारने की सिफारिश नहीं करता है।
रखें इन बातों का ध्यान
घर में फर्स्ट एड बॉक्स सही जगह पर जरूर रखें।
बॉक्स में तमाम जरूरी सामान हो, इसकी जांच करते रहें।
रसोई में चाकू, लाइटर, माचिस आदि को सही जगह पर रखें।
रसोई में सामान को सही जगह पर रखें ताकि बच्चे उन तक न पहुंच पाएं।
कुछ जरूरी टेलीफोन नम्बर की लिस्ट घर में सही जगह टांग कर रखें।
अगर आपको हार्ट, अस्थमा आदि की तकलीफ है तो अपनी दवाओं की उपलब्धता की जांच करते रहें, ताकि दवा की कमी न आए।
अगर घर में बुजुर्ग हैं तो उनके स्वास्थ्य की जांच समय-समय पर करवाते रहें। खासकर आंखों की जांच छह महीने पर जरूर करवाएं।
गिरना
गिरने से सामान्य से लेकर गंभीर चोटें आ सकती हैं। अगर कोई गिर जाए तो सबसे पहले उसे उठाएं और खुली हवा में लेटा दें। चोटों का मुआयना करें। व्यक्ति बेहोश हो गया हो तो पहले उसे होश में लाने का प्रयास करें। व्यक्ति को ज्यादा हिलाएं-डुलाएं नहीं जब तक कि डॉक्टरी सहायता पहुंच नहीं जाती।
औंधे मुंह गिरा है तो सबसे पहले उसे सीधा कर लें, उसे कमर के बल लेटा दें। सांसें उखड़ रही हों तो कृत्रिम रूप से सांस दें और लेटा दें।
घर में अकेले हों और सीढियों से या किसी ऊंची जगह से गिर जाएं तो जल्दी से उठने की कोशिश न करें। पास में अगर कोई कुर्सी और सोफा है तो उस तक रेंगते हुए पहुंचें और फिर धीरे से उस पर बैठ जाएं।
परिचित या अस्पताल में फोन करें।
कटना
सब्जी या फल काटते हुए चाकू के फिसलने से उंगली कट जाना, शरीर के किसी भाग विशेषकर पैर या हाथ में कील या कांच चुभ जाना और जख्म से खून बहने लगना, इस संसार में शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा होगा जिसे इसका अनुभव कभी न हुआ हो। कभी-कभी मामूली रूप से कटना भी संक्रमण फैलने से जानलेवा हो जाता है।
रखें इन बातों का ध्यान
हल्के जख्म में डॉक्टर के पास न जाएं।
घाव से गंदगी बाहर निकाल दें।
जख्म को बहते हुए ठंडे पानी से धो लें।
हाइड्रोजन परऑक्साइड से अच्छी तरह साफ करने के बाद बैंडेड से लपेट लें।
सूजन कम करने के लिए कटी हुई जगह पर बर्फ मलें।
घाव को साफ रखें ताकि संक्रमण न फैले, लगातार पट्टी बदलते रहें।
कटने पर अगर दस मिनट में खून बहना बंद हो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
जलना
खाना बनाते समय आग की चपेट में आ जाना जलने की सबसे प्रमुख वजह है। मामूली रूप से जलने के जख्म तो समय के साथ वैसे ही ठीक हो जाते हैं, पर गंभीर रूप से जलने पर विशेष देखभाल करनी होती है।
क्या करें-क्या नहीं
आग लग जाए तो वह फर्श पर लोट जाएं, धुंए की परत से नीचे, अगर आग पूरे स्थान पर फैल रही है तो बाहर निकलकर भागें।
मामूली रूप से जले हुए स्थान पर 10-15 मिनट तक ठंडा पानी डालें। ध्यान रहे पानी ज्यादा ठंडा नहीं होना चाहिए।
जली हुई त्वचा पर सीधे बर्फ न रखें। इससे त्वचा को और नुकसान पहुंच सकता है।
जख्म के थोड़ा सूखने के बाद उस पर सूखी पट्टी ढीली बांधें, ताकि गंदगी और संक्रमण न फैले।
गंभीर रूप से जलने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।