Tuesday, April 16, 2013

रसोई यानी पूरा दवाखाना, दर्द भगाए चुटकी में


पेट दर्द
सबसे आम बीमारियों में से एक है- पेट दर्द। पेट दर्द के लिए कुछ घरेलू उपचार हैं-
एक चम्मच पुदीने के रस और नींबू रस के मिश्रण में कुछ बूंद अदरक का रस और चुटकी भर काला नमक मिला कर पीने से आराम मिलेगा।
एक चम्मच शुद्ध घी में हींग मिला कर पीने से आराम मिलता है।
थोड़े-से पानी के साथ दो ग्राम हींग पीस कर पेस्ट बनाए। नाभि और उसके आसपास पेट पर यह पेस्ट लगाने से दर्द में राहत मिलती है। अदरक रस की मालिश से भी फायदा होता है।
अजवायन तवे पर सेंक कर पिसे हुए काले नमक के साथ मिलाएं। गर्म पानी के साथ पीने से पेट का दर्द दूर होता है।
दो-तीन ग्राम जीरे को तवे पर सेंक लें और चबा कर खाएं या गर्म पानी के साथ पिएं।
एक-एक चम्मच पुदीने और नींबू के रस में आधा चम्मच अदरक का रस और थोड़ा-सा काला नमक मिला कर पीने से आराम मिलेगा।
सूखी अदरक मुंह में रख कर चूसने से भी पेट दर्द में राहत मिलती है।
एसिडिटी से होने वाले पेट दर्द में पानी में थोड़ा-सा मीठा सोडा मिला कर पीने से फायदा होता है।
जीरा, काली मिर्च, सोंठ, लहसुन, धनिया, हींग, सूखा पुदीना बराबर मात्रा में लेकर बारीक चूर्ण बनाएं। इसमें काला नमक मिलाकर एक चम्मच गर्म पानी के साथ पिएं, आराम मिलेगा।
एक चम्मच देसी घी में हरी धनिया का रस मिला कर पीने से पेट की व्याधि दूर होती है।
2 चम्मच मेथी दाना में नमक मिला कर गर्म पानी के साथ पीना फायदेमंद है।
सेंधा नमक में एक-दो ग्राम अजवाइन की सूखी और पिसी पत्तियां खाने से पेट दर्द में राहत मिलती है।
माइग्रेन या सिर दर्द
चार से 72 घंटे तक स्थायी रूप से होने वाले सिर दर्द को माइग्रेन नाम दिया गया है। चिंता, तनाव, भोजन या नींद की कमी, थकान, मासिक धर्म, हार्मोनल परिवर्तन इसकी मुख्य वजहें हैं। इससे राहत पाने के लिए ये उपाय अपनाएं-
सिर दर्द होने पर बिस्तर पर लेट कर दर्द वाले हिस्से को बेड के नीचे लटकाएं। सिर के जिस हिस्से में दर्द हो, उस तरफ वाली नाक में सरसों के तेल की कुछ बूंदें डालें, फिर जोर से सांस ऊपर की ओर खीचें। इससे सिर दर्द में राहत मिलेगी।
दालचीनी को पानी के साथ बारीक पीस कर माथे पर लेप लगाएं। सूखने पर हटा लें।
कपूर को घी में मिला कर सिर पर हल्के हाथों से मालिश करने से आराम मिलता है।
नींबू के छिलके पीस कर उसके लेप को माथे पर लगाने से आराम मिलता है।
10-10 ग्राम पीपल, सोंठ, गुलहठी और सौंफ मिला कर बारीक पीसें। इस चूर्ण में एक चम्मच पानी मिला कर गाढ़ा लेप बनाएं और माथे पर लगाएं। दर्द से राहत मिलेगी।
10-20 ग्राम तुलसी के पत्ते चबाने से या एक कप पानी में काढ़ा बना कर पीने से फायदा होगा।
अंगूर के रस का सेवन माइग्रेन के इलाज में सहायक होता है।
गाजर, चुकंदर, पालक, खीरे के रस का सेवन प्रभावी होता है।
बादाम तेल से मालिश करने से आराम मिलेगा।
दांत दर्द
वर्तमान जीवनशैली तनाव और गलत खाने की आदतों से भरी है, जिसमें दांत दर्द एक आम समस्या है। दांत दर्द की अक्सर महिलाएं शिकार होती हैं। इसके पीछे दांत क्षय, दांत संक्रमण, चीनी की अत्यधिक खपत प्रमुख कारण हैं। दांत दर्द के इलाज के लिए कुछ प्रभावी घरेलू उपचार हैं-
नींबू के रस में दो-तीन लौंग पीस लें। तैयार मिश्रण को दांत पर लगाएं। लौंग का तेल दर्द वाले दांत और मसूढ़े पर लगाने से आराम मिलता है।
चुटकी भर हींग में मौसमी या नींबू का रस मिलाएं। रुई के छोटे-से फाहे को भिगो कर दर्द वाले दांत के पास रखने से आराम मिलता है।
कच्चे प्याज के टुकड़े को कम से कम 3 मिनट चबाने से आराम मिलता है।
लहसुन की 2-3 कलियां कच्ची चबाएं।
नमक और काली मिर्च के एक-चौथाई चम्मच मिश्रण में कुछ बूंद पानी मिला कर लगाना फायदेमंद होता है।
पालक या अमरूद की पत्तियां 15-20 मिनट चबाने से आराम मिलता है।
नमक वाले पानी में कुछ बूंदे सिरका या 2-3 ग्राम बेकिंग सोडा मिला कर कुल्ला करना प्रभावकारी है।
दांत दर्द में वनिला की 3-4 बूंदे दांत पर डालने से राहत मिलती है।
आलू के टूकड़े काट कर दर्द वाले दांत के पास 15 मिनट रखने से फायदा होता है।
इस्तेमाल किया हुआ टी-बैग दांत पर रखने से राहत मिलती है।
अजवायन की पत्ती का तेल लगाने से दर्द में राहत मिलती है।
सरसों के 2-3 बूंद तेल में चुटकी भर नमक मिला कर दांत और जबड़ों की मालिश करने से लाभ होता है।

फ्रोजेन शोल्डर: सही खान-पान और व्यायाम है जरूरी


फ्रोजेन शोल्डर या कंघे में अकडऩ आज एक आम समस्या बनती जा रही है। आपाधापी वाली वर्तमान जीवनशैली भी इस तकलीफ का एक प्रमुख कारण है। हालांकि जीवनशैली में बदलाव लाकर और कुछ एहतियाती उपाय अपना कर इस पीड़ादायी समस्या से बचा जा सकता है।
फ्रोजेन शोल्डर या कंधे में अकडऩ की तकलीफ आज आम हो गई है। अगर किसी व्यक्ति के कंधे अकड़ जाते हैं, सही तरह से काम नहीं करते, किसी भी काम को करने में या सामान को उठाने में रोगी को कंधे में बहुत तेज दर्द होता है तो वह फ्रोजेन शोल्डर नामक बीमारी हो सकती है।
इसके कई कारण हो सकते हैं
फ्रोजेन शोल्डर कई कारणों से हो सकता है। तमाम सर्वे के मुताबिक फ्रोजेन शोल्डर वर्किंग क्लास और कंप्यूटर का इस्तेमाल करने वाले लोगों में अधिक पाया जाता है। इसकी वजह काफी समय तक कंधे एक ही स्थिति में रखना, बहुत देर तक एक ही कंधे पर अधिक भार उठाए रखना, कंधे से बहुत ज्यादा काम न लेना, हड्डियों का कमजोर होना आदि हैं। कई बार फ्रोजेन शोल्डर की समस्या कंधे को किसी तरह का आघात और चोट लगने पर भी होने लगती है।
फ्रोजेन शोल्डर के लक्षण
फ्रोजेन शोल्डर के दौरान कंधा बिल्कुल सूज जाता है और अकडऩ के कारण कठोर हो जाता है जिससे हाथ हिलाना बहुत मुश्किल होता है और हिलाने पर तीव्र दर्द होने लगता है।
कंधे को किसी भी दिशा में मोडऩे में रोगी को बहुत दिक्कत होती है।
कंधे का दर्द रोगी की गर्दन और उसके ऊपर के भाग में फैल जाता है।
हाथ की काम करने की गति बहुत धीमी हो जाती है और रात के समय दर्द अधिक परेशान करने लगता है। छोटे-छोटे काम जैसा कंघी करना, बटन बंद करना आदि भी मुश्किल हो जाता है।
हाथ को पीछे की ओर करना होता है तो कंधे में बहुत तेज दर्द होता है।
कई बार फ्रोजन शोल्डर के तहत बहुत ज्यादा सूजन और अचानक तेज दर्द शुरू हो जाता है और कंधे में ऐंठन होने लगती है, जो कई मिनटों या फिर घंटों तक भी रह सकती है। यह समय कई महीनों या सालों तक भी हो सकता है।
फ्रोजेन शोल्डर की आशंकाएं
फ्रोजेन शोल्डर के कारण कई और समस्याएं, जैसे- अवसाद, गर्दन और पीठ दर्द, थकान, काम करने में असमर्थता इत्यादि समस्याएं भी हो सकती हैं। फ्रोजेन शोल्डर से रोगी को मधुमेह, दौरा पडऩा, फेफड़ों का रोग, संयोजी ऊतक विकार और हृदय रोग अधिक होने का डर रहता है। यह बीमारी पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में अधिक पाई जाती है और 40 साल से कम उम्र के लोगों में अधिक देखने को मिलती है।
क्या है इलाज
फ्रोजेन शोल्डर का इलाज संभव है। इसमें शारीरिक चिकित्सा, औषधि, मालिश चिकित्सा, शल्य-चिकित्सा इत्यादि की जाती है। जो लोग इससे पीडित हैं, उन्हें कई महीनों या अधिक लंबे समय तक काम करने एवं जीवन की सामान्य गतिविधियां करने में अत्यधिक कठिनाई होने की आशंका रहती है।
सावधानी और रोकथाम
इस दौरान कंधों का हल्का-फुल्काव्यायाम बेहद जरूरी है।
खान-पान का खास ध्यान रखें और ताजा फल-सब्जियां, जूस और पौष्टिक आहार का सेवन जरूरी है।
गर्म पानी से सिंकाई करनी चाहिए।
प्रतिदिन मालिश करना भी बेहतर उपाय है।
रात के समय में कम से कम एक घंटे तक ठंडा लेप कंधे पर करना चाहिए।
फ्रोजेन शोल्डर में यह जरूरी है कि कंधे के दर्द को कम किया जाए और कंधे में मूवमेंट लाई जाए।


थैलीसीमिया: जागरूकता ही बचाव है


थैलीसीमिया एक अनुवांशिक रोग है। जागरूकता के अभाव के कारण पूरी दुनिया में इस रोग से पीडित बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है। कम गंभीर मामलों में सही उपचार अपना कर सामान्य जीवन जिया जा सकता है। इसके लिए इसके प्रति जागरूक बहुत जरूरी है। यह रोग क्या है, इसका इलाज क्या है और कैसे इससे अपने बच्चों को बचाया जा सकता है, बता रही हैं शमीम खान
थैलीसीमिया एक रक्त संबंधी विकार है। इसमें हीमोग्लोबिन, जो शरीर में ऑक्सीजन को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाता है, में खराबी आ जाती है। इसके कारण लाल रक्त कणिकाएं नष्ट हो जाती हैं, जिससे गंभीर एनीमिया हो जाता है। हमारे देश में थैलीसीमिया के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। भारत में करीब 6 करोड़ लोग थैलेसीमिया माइनर से पीडित हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर वर्ष 7-10 हजार थैलीसीमिया से ग्रस्त बच्चों का जन्म होता है।
क्या होता है थैलीसीमिया
यह अनुवांशिक रोग है, जो बच्चों को माता-पिता से विरासत में मिलता है। थैलीसीमिया के दो प्रकार होते हैं:
थैलीसीमिया मेजर
थैलीसीमिया माइनर
थैलीसीमिया माइनर तब होता है, जब बच्चे को क्षतिग्रस्त जीन एक ही पैरेंट यानी माता या पिता में से किसी एक से मिलता है। लेकिन जब माता और पिता दोनों से ही उसे क्षतिग्रस्त जीन मिलेंगे तो मेजर थैलीसीमिया की पूरी आशंका होती है। यदि माता-पिता दोनों सामान्य हैं तो उनके बच्चे थैलीसीमिया से पीडित नहीं होंगे। माता-पिता में से किसी एक को यदि माइनर थैलीसीमिया है तो बच्चों को यह हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है। यदि माता-पिता दोनों को माइनर थैलीसीमिया हो तो बच्चे को थैलीसीमिया होने का खतरा ज्यादा रहता है। इसमें 25 प्रतिशत बच्चे सामान्य हो सकते हैं, 50 प्रतिशत को माइनर थैलीसिमिया व 25 प्रतिशत को मेजर थैलीसीमिया होने की आशंका अधिक होती है।,
लक्षण
थैलीसीमिया मेजर के सबसे गंभीर रूप में मृत बच्चे का जन्म हो सकता है या गर्भावस्था के आखिरी समय में बच्चे की मृत्यु हो जाती है।
बच्चे जो थैलीसीमिया मेजर (कूले एनीमिया) के साथ जन्म लेते हैं, वे जन्म के समय सामान्य होते हैं, लेकिन जन्म के पहले वर्ष में उन्हें गंभीर एनीमिया हो जाता है।
अन्य लक्षण
चेहरे की हड्डियां का विकृत होना।
थकान।
असामान्य विकास।
त्वचा का पीला हो जाना (पीलिया)।
चेहरा सूख जाना और मुरझाया हुआ लगना।
लगातार कमजोरी और बीमारी की स्थिति बनी रहना, वजन नहीं बढम्ना।
उपचार
थैलीसीमिया मेजर के उपचार में नियमित अंतराल पर रक्त चढ़ाने की आवश्यकता होती है। जो लोग रक्ताधान (ब्लड ट्रांसफ्यूजन) ले रहे हैं, वे आयरन के सप्लीमेंट न लें, क्योंकि ऐसा करने से रक्त में आयरन की मात्रा बहुत बढ़ जाती है। इससे हृदय, लीवर और एंडोक्राइन सिस्टम क्षतिग्रस्त हो जाता है।
शरीर में आयरन का स्तर बढ़ जाने पर चिलेशन थेरेपी की आवश्यकता पड़ती है, जिसमें अतिरिक्त आयरन को शरीर से बाहर निकाला जाता है। बच्चों में इस रोग के उपचार के लिए अस्थि-मज्जा प्रत्यारोपण (बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन) सबसे कारगर होता है, जो सगे भाई या बहन द्वारा दिया जा सकता है।
बचाव
गंभीर थैलीसीमिया में 20 से 30 साल की उम्र में ही हार्ट फेल होने से मृत्यु हो जाती है। थैलीसीमिया के कम गंभीर रूप में आयु कम नहीं होती है। नियमित रूप से रक्त चढ़ाने और चिलेशन थेरेपी से सामान्य जीवन जीने में मदद मिलती है। सबसे कारगर उपाय है कि शादी से पहले लड़का-लड़की अपना चेकअप करा लें। थैलीसीमिया से पीडित दो लोगों को कभी आपस में शादी नहीं करनी चाहिए।
संभव है थैलीसीमिया की रोकथाम
गर्भवती महिला को गर्भावस्था के पहले तीन महीनों में ही थैलीसीमिया की जांच करा लेनी चाहिए और अगर वह थैलीसीमिया की कैरियर है, तब पति की भी जांच करानी चाहिए। अगर दोनों पॉजीटिव हैं, तब एंटी-नेटल डायग्नोसिस कराना चाहिए कि कहीं बच्चे को थैलीसीमिया होने का खतरा तो नहीं है। अगर बच्चा इससे पीडित है तो गर्भपात करा लेना चाहिए। अगर थैलीसीमिया से पीडित दो लोग शादी कर लेते हैं तो जन्म लेने वाले बच्चे के थैलीसीमिया मेजर से पीडित होने का खतरा 25 प्रतिशत बढ़ जाता है। इसका इलाज बहुत मंहगा है, क्योंकि पूरे जीवन भर उसे रक्ताधान कराना होता है। लगातार रक्ताधान और आयरन की मात्रा बढऩे से जीवन पर खतरा और बढ़ जाता है।
प्री-इम्प्लांटेशन जेनेटिक डायग्नोसिस क्या है?
प्री-इम्प्लांटेशन जेनेटिक डायग्नोसिस एक प्रभावकारी तकनीक है, जिससे जैविक विकारों को माता-पिता से बच्चों में स्थानांतरित होने से रोका जा सकता है। इस डायग्नोसिस में मां को स्टीम्युलेशन देकर अंडे प्रोडय़ूस कराए जाते हैं, जिन्हें इक_ा कर निषेचित कराया जाता है। फिर इन भ्रूणों को विभिन्न बीमारियों के लिए टेस्ट किया जाता है (जैसे- थैलीसीमिया, डाउन सिंड्रोम इत्यादि) और केवल सामान्य भ्रूणों को गर्भाशय में स्थानांतरित किया जाता है।
इस तरह से जन्म लेने वाला बच्चा सामान्य होता है। यह बच्चा थैलीसीमिया से पीडित भाई-बहन के लिए स्टेम सेल डोनर का काम कर सकता है। अगर पुरुष साथी को थैलीसीमिया है तो प्री-इम्प्लांटेशन जेनेटिक डायग्नोसिस कराने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि इस मामले में बच्चा थैलीसीमिया माइनर होगा।
यह महिलाओं के लिए जरूरी है कि वे गर्भावस्था के दौरान थैलीसीमिया टेस्ट कराएं, ताकि बच्चे में इस रोग के स्थानांतरित होने से रोका जा सके। इससे ऐसे बच्चे को मुश्किलों से भरी जिंदगी जीने से मुक्ति मिलेगी।





सरल नाड़ीशोधन प्राणायाम बनाए नाड़ी को मजबूत


नाडियां कमजोर हों तो अनेक बीमारियां परेशान कर सकती हैं। थकावट, कमजोरी, चिड़चिड़ापन जैसी समस्याओं के लिए नाड़ी दुर्बलता काफी हद तक जिम्मेदार होती है। कुछ आसन और प्रायाणम आपकी नाडियों को मजबूती दे सकते हैं।
आज की इस भागदौड़, तनावग्रस्त तथा आरामतलब जिन्दगी में नाड़ी दुर्बलता जैसी बीमारियां बहुत लोगों को अपनी चपेट में ले रही हैं। थकावट, कमजोरी, चिड़चिड़ापन, हताशा, निराशा, भय, असुरक्षा तथा किसी काम में मन न लगने आदि जैसी समस्याएं इसका प्रमुख लक्षण हैं। आज अधिकांश लोग इस समस्या से पीडित हैं। वस्तुत: यह समस्या मनोकायिक है, जिसका योग के अतिरिक्त कहीं अन्यत्र स्थायी समाधान नहीं है। इस समस्या के निदान हेतु यहां बताई गई यौगिक क्रियाएं बहुत लाभदायक हैं-
आसन
नाड़ी दुर्बलता की समस्या को दूर करने के लिए सर्वागासन तथा शीर्षासन बहुत प्रभावकारी हैं। किन्तु प्रारम्भ में अन्य सरल आसनों जैसे-सूर्य नमस्कार, जानु शिरासन, पश्चिमोत्तानासन, मेरुवक्रासन, राजकपोतासन, उष्ट्रासन तथा उत्तानासन आदि में दक्षता प्राप्त कर ही सिर के बल खड़े होने वाले आसनों का अभ्यास करना चाहिए।
उष्ट्रासन की अभ्यास विधि
घुटने के बल जमीन पर खड़े हो जाएं। दोनों घुटनों के मध्य आपस में एक फुट तथा दोनों पंजों के बीच भी एक से डेढ़ फुट का अंतर रखें। अब दाएं हाथ को पीछे ले जाकर दाएं पैर की एड़ी पर रखं। इसी प्रकार बाएं हाथ को बाएं पैर की एड़ी पर रखें। नितम्ब तथा कमर को आगे की ओर इस प्रकार धकेलें कि रीढ़ की आकृति ऊंट की रीढ़ जैसी बन जाए। इस स्थिति में श्वास-सामान्य रखते हुए आरामदायक स्थिति तक रुकें। इसके पश्चात वापस पूर्व स्थिति में आएं।
प्राणायाम
नसों-नाडियों को सशक्त करने हेतु सरल कपालभाति, नाड़ी शोधन तथा उज्जायी प्राणायाम का अभ्यास बहुत लाभकारी सिद्ध होता है। यदि नियमित रूप से नाड़ीशोधन का अभ्यास किया जाए तो उस समस्या को बहुत कम समय में जड़ से हटाया जा सकता है।
सरल नाड़ी शोधन की अभ्यास विधि
ध्यान के किसी आसन जैसे-पद्मासन, सिद्धासन, सुखासन या कुर्सी पर रीढ़, गला व सिर को सीधा कर बैठ जाएं। दाएं हाथ के अंगूठे से दांयी नासिका को बन्द कर बायीं नासिका से एक गहरी तथा धीमी श्वास अन्दर लें। अब बायीं नासिका को बंद कर दायीं नसिका से एक गहरी तथा धीमी श्वास बाहर निकालें। पुन: दायीं नासिका से श्वास अन्दर कर बायीं नासिका से श्वास बाहर निकालें। यह नाड़ी शोधन प्राणायाम की एक आवृत्ति है। प्रारंभ में इसकी 12 आवृतियों का अभ्यास करें। धीरे-धीरे इसकी आवृति अपनी क्षमतानुसार बढ़ाते जाना चाहिए।
आहार
सुपाच्य तथा संतुलित भोजन खूब चबा-चबाकर खायें। दूध, दही, म_ा, लस्सी, अंगूर, संतरे तथा मौसमी का रस पियें। हरी सब्जियों तथा सलाद पर्याप्त मात्रा में लें।

हमेशा सलामत रहेंगे आपके बाल


पूरे व्यक्तित्व की खूबसूरती में बालों की काफी भागीदारी होती है। बाल खूबसूरत हैं, चेहरे के अनुकूल कटे हैं तो व्यक्तित्व निखर जाता है।
उम्र के साथ बाल में कई परिवर्तन आते हैं। खासकर 45 की उम्र के बाद बाल सफेद होना, घनापन कम होना, बाल पतला होना, बाल गिरना आदि सामान्य बात है। जब ये सारी समस्याएं 20 से 30 वर्ष की उम्र में ही सामने आने लगें तो किसी भी व्यक्ति के लिए चिंतित हो उठना स्वाभाविक है।
गंजेपन की समस्या
सिर से जब सामान्य से ज्यादा बाल गिरने लगें और एक समय बाद बाल साफ ही हो जाएं तो इसे 'गंजापनÓ कहते हैं। लक्षण के आधार पर गंजेपन को कई नामों से जानते हैं। पुरुषों में आमतौर पर होने वाले सामान्य गंजेपन को 'एंड्रोजेनेटिक एलोपीसियाÓ कहते हैं। महिलाओं में आगे के बालों का उडऩा 'फीमेल पैटर्न बाल्डनेसÓ कहलाता है। जब बाल गोलाकार में झड़ते हैं तो उसे 'एलोपीसिया एरेटाÓ कहते हैं। कई बार बाल कसकर बांधने से भी निकल आते हैं, इसे ट्रैक्शन एलोपीसिया कहते हैं। शरीर में आयरन और पोषक तत्वों की कमी की वजह से या अत्यधिक दवाओं का सेवन करने की वजह से भी बाल गिरने लगते हैं।
क्या हो सकते हैं कारण
बाल गिरने या गंजेपन के कई कारण हो सकते हैं। कुछ लोगों में गंजापन अनुवांशिक आ जाता है तो कुछ लोग संक्रमण के शिकार हो जाते हैं। बालों पर अत्यधिक रसायन का इस्तेमाल भी कभी-कभी गंजेपन का कारण बनता है। इसके अलावा हार्मोनल बदलाव व शरीर में पोषक तत्वों की कमी भी इसकी वजह हो सकती है।
अनुवांशिक: घर में पहले भी किसी को गंजेपन की शिकायत रही है या एक उम्र के बाद दादा, पिता या घर के दूसरे पुरुषों में गंजापन आ जाता है तो आपमें भी गंजापन आ सकता है।
संक्रमण: सिर में फंगल संक्रमण की वजह से भी बाल उडऩे लगते हैं। लेकिन यह अनुवांशिक गंजेपन से अलग होता है। संक्रमण की वजह से जगह-जगह से काफी संख्या में बाल निकलने लगते हैं। इलाज के बाद इसे ठीक किया जा सकता है।
रसायनों का इस्तेमाल: फैशन के साथ कदमताल करने की फिराक में कई लोग अपने बालों के साथ बार-बार प्रयोग करते हैं। बाल सीधे करने या घुंघराले करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले रसायन बाल को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं। बाल पर अत्यधिक रसायन का इस्तेमाल उनके गिरने का कारण बन जाता है।
हार्मोन में बदलाव: शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव भी गंजेपन का कारण बन सकते हैं। महिलाओं में एंड्रोजेन की मात्रा बढ़ जाए तो उनमें भी गंजापन देखने को मिल सकता है। हाइपरथायरॉयड व हाइपोथॉयरॉयड की स्थिति में भी गंजापन हो सकता है।
पोषक तत्वों की कमी या अधिकता: 
शरीर में महत्वपूर्ण पोषक तत्व जैसे आयरन और प्रोटीन की कमी के कारण भी गंजापन हो सकता है। अत्यधिक कमजोरी की वजह से भी गंजापन आता है। डॉक्टरों के मुताबिक शरीर में विटामिन ए की अत्यधिक मात्रा की वजह से भी बाल गिरने लगते हैं और गंजापन आ जाता है।
दवाएं: कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव से भी गंजापन आता है। कीमोथेरेपी, एनाबोलिक स्टेरॉयड, गर्भ निरोधक दवाओं की वजह से भी गंजापन होता है।
बाल ऐसे रहेंगे स्वस्थ और घने
खानपान पर ध्यान दें
बालों की सेहत सुधारने में शाकाहारी भोजन ज्यादा मदद करते हैं। खासकर हरी सब्जियां बालों को जड़ से मजबूत करती हैं और उनकी मोटाई भी बढ़ाती हैं। किसी को भी यदि बाल गिरने की समस्या है तो उसे अपनी डायट में सबसे पहले बदलाव करना चाहिए। बाहरी चीजों जैसे कि फास्टफूड और तली-भूनी चीजों की जगह अपनी डायट में हरी सब्जियों को शामिल करना चाहिए। हरी सब्जियां, सोया, मशरूम, पनीर आदि में विटामिन एच की प्रचुर मात्रा पाई जाती है, जो कि हमारे बालों के लिए वरदान है।
शैम्पू का इस्तेमाल
बाजार में आने वाला हर नया ब्रांड अच्छा ही होगा, यह कहना मुश्किल है। इसलिए किसी भी शैम्पू पर आंख मूंद कर भरोसा न करें। बेहतर होगा कि माइल्ड शैम्पू का चुनाव किया जाए। आमतौर पर लोगों के दिमाग में यह धारणा बनी हुई है कि शैम्पू में बार-बार बदलाव नहीं किया जाना चाहिए, जबकि डॉक्टर किसी भी शैम्पू को लगातार तीन महीने से ज्यादा इस्तेमाल करने की सलाह नहीं देते। यदि आप सप्ताह में तीन बार शैम्पू करते हैं तो दो बार एक शैम्पू से बाल धोएं, जबकि तीसरी बार के लिए शैम्पू बदल दें। इसके अलावा हर तीन महीने पर अपना शैम्पू बदल देना चाहिए, क्योंकि एक समय के बाद त्वचा उसकी आदी हो जाती है और नई तरह की समस्या आने लगती है।
स्वास्थ्य जांच कराएं
मधुमेह के रोगियों को फंगल संक्रमण का डर बना रहता है। संक्रमण की शुरुआत में ही डॉक्टर से संपर्क करें, क्योंकि संक्रमण का जितनी जल्दी इलाज होगा, उतना ही कम नुकसान होगा। बाल ज्यादा गिरने या फंगल संक्रमण की स्थिति में लोग डॉक्टर के पास जाने की बजाय पार्लर जाते हैं। ये गलत है। इससे आपकी समस्या और गंभीर हो सकती है। यदि किसी व्यक्ति को अचानक फंगल इंफेक्शन हो जाए तो उसे सबसे पहले अपने मधुमेह के स्तर की जांच करानी चाहिए।
बालों के साथ ज्यादा छेड़छाड़ ठीक नहीं
युवाओं में यह ज्यादा देखा जाता है। बालों को रंगना, रसायन का इस्तेमाल करना, बालों की बार-बार स्ट्रेटनिंग कराना, घर में ड्रायर का हर दिन इस्तेमाल आदि कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जो बालों को नुकसान पहुंचाते हैं। बालों पर अत्यधिक स्टाइलिंग और रसायन का इस्तेमाल इन्हें कमजोर बना देता है और नतीजा कमजोर और पतले बालों के रूप में सामने आता है।