Thursday, August 8, 2013

अंगोरा खरगोश पाल कर बढ़ाएं कमाई


खरगोश पालन क्यों अत्यधिक सन्तति उत्पादन के कारण मांस व ऊ न उत्पादन प्रति खरगोश सभी पालतू जीवों से अधिक है। यह जीव शोर व कोलाहल नहीं करता है। इसकी ऊ न बहुत बारीक व मुलायम होती है और इसकी ऊ न की ताप अवरोधक शक्ति भेड़ की ऊ न से लगभग तीन गुना होती है। इस कारण इसके पैसे ज्यादा मिलते हैं।
जलवायु: यद्यपि अंगोरा खरगोश 7 डिग्री से 28 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान में पाले जा सकते हैं, परंतु 20 डिग्री सेंटीग्रेड पर इनकी उत्पादन क्षमता अच्छी रहती है। बहुत अधिक तापमान में इनकी प्रजनन क्षमता पर बुरा असर पड़ता है। न्यून पर इनके फीड़ खाने की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे आर्थिक दृष्टि से हानि होती है। खरगोशों के लिए 70 प्रतिशत अपेक्षित आर्द्रता उचित रहती है। बेहतर प्रजनन के लिए दिन में 16 घंटे प्रकाश की आवश्यकता होती है।



भवन व पिंजरे: जंगली अवस्था में खरगोश बिल खोदकर रहते हैं, लेकिन पालतू अवस्था में उन्हें अकेले पिंजरों में रखा जाता है। अंगोरा खरगोश को रखने के लिए भवनों का निर्माण इस ढंग से किया जाना चाहिए, जहां यह बाहरी प्रभावों जैसे सूर्य की तेज सीधी रोशनी, खराब मौसम व अवांछित शोर से बचे रहें। खिड़कियों तथा रोशनदानों पर जाली लगी हो, ताकि कीड़े-मकौड़े, पक्षी, चूहे, नेवले इत्यादि अन्दर न आने पायें। भवन में वायु का प्रभावशाली आवागमन हो।
खरगोशों को गैलवेनाई जड़ आयरन वैल्डेड वायरमैश से बने पिंजरों में रखा जाता है। एक पिंजरों में एक खरगोश रखा जाता है। पिंजरे में आहार तथा पानी के बर्तन इस ढंग से लगाए जाते हैं कि विभिन्न आयु वर्ग के जानवरों को आहार लेने व पानी पीने की सुविधा रहे।
प्रजनन योग्य खरगोशों के लिए पिंजरे का आकार 60 वर्ग सेंटीमीटर तथा अन्य खरगोशों के लिए -60 गुणा 35 सेंटीमीटर रखना चाहिए। बच्चे देने वाली मादाओं के पिंजरे के साथ प्रसव से पांच दिन पहले नैस्ट बॉक्स लगाए जाते हैं, जो प्लाईवुड के बने हों। नैस्ट बॉक्स का आकार 36 वाई 36 वाई 30 सेंटीमीटर होता है।
खरगोशों के लिए आहार: खरगोश शाकाहारी जीव है और घास इसका महत्वपूर्ण आहार है। यह सूखी हरी घास व हरी पत्तीयां जैसे शहतूत, दूब घास, लूसर्नघास, पालक, बरशीम आदि मुलायम हरे पत्तों को खूब खाता है। इसके अतिरिक्त शलजम, गाजर, चुकन्दर, गोभी, बंदगोभी आदि भी इसके मनचाहे खाद्य पदार्थ हैं।
अंगोरा खरगोशों को आहार पैलेट्ज के रूप में दिया जाता है। औसतन एक खरगोश प्रतिदिन 150-175 ग्राम आहार लेता है।
गर्भवती एवं बच्चे दिए हुई मादा के आहार में 100 ग्राम दैनिक वृद्धि हो जाती है। इसके अतिरिक्त 80-100 ग्राम हरी घास व हरी सब्जियां भी देनी चाहिए। एक खरगोश दिन में लगभग 350 मिलीलीटर पानी पीता है।
प्रजनन: केवल स्वस्थ व रोग मुक्त खरगोशों से ही प्रजनन करवाया जाना चाहिए। अंगोरा खरगोश 5-6 माह की आयु में जब इनका भार लगभग तीन किलोग्राम हो जाए, प्रजनन योग्य हो जाते हैं। उत्तेजित अवस्था में मादा की योनी लाल हो जाती है व अपनी ठोढ़ी पिंजरे में मलती हुई पूंछ को खूब हिलाती है। प्रजनन दो से करवाया जाता है।
प्राकृतिक गर्भधान: इसमें मादा खरगोश को नर खरगोश के पिंजरे में ले जाते हैं। समागम का ठीक व उचित समय सायं का रहता है। समागम के अंत में वह एक विशेष आवाज निकालता है। प्राकृतिक गर्भाधान के पश्चात मादा को वापस अपने पिंजरे में छोड़ दिया जाता है।
कृत्रिम गर्भधान: इसमें कृत्रिम वैजाईना की सहायता से वीर्य एकत्रित करके, उसे दूध से पतला किया जाता है तथा इसका एक मिली लीटर प्रत्येक प्रजनन योग्य मादा खरगोश की योनी में छिड़काव किया जाता है।
गर्भाधान के 14 दिन के बाद गर्भ हेतु जांच की जाती है। यदि गर्भधारण न हुआ हो तो दोबारा से मादा को नर के पास ले जाकर समागम करवाया जाता है। गर्भ के 25वें दिन नैस्ट बॉक्स लगा दिए जाते हैं। गर्भित मादा की विशेष देखभाल की जानी चाहिए। गर्भित मादा 31वें दिन बच्चे देती है।
बच्चे जनने के तुरंत बाद मां बच्चों को दूध पिलाने लगती है। जब खरगोश के बच्चों का जन्म होता है, तब उनके शरीर पर बाल नहीं होते। इनका रंग लाल और आंखें बंद होती हैं। तापमान को सामान्य रखने के लिए उन्हें एक ही स्थान पर रखना आवश्यक होता है। मादा अपने बच्चों को 24 घण्टों में एक बार ही लगभग 5-7 मिनट तक दूध पिलाती है और यदि कोई बच्चा दूध पीने से रह जाए तो वह अत्यंत कमजोर हो जाता है। जन्म से 11-12 दिन में वह चुस्त और फुरतीले हो जाते हंै और हरी घास व दाने को मुंह मारने लगते हैं। लगभग 4-5 सप्ताह की आयु होने पर इन बच्चों को मां से अलग कर दिया जाता है। इसे वीनिंग कहते हैं। अंगोरा खरगोश से वर्ष में 5-6 बार बच्चे लिए जा सकते हैं तथा प्रत्येक बार औसतन 6 बच्चे उत्पन्न होते हैं।
ऊन उत्पादन: अंगोरा खरगोश मुख्यत: अपनी बेहतरीन ऊ न के लिए पाले जाते हैं। एक वयस्क खरगोश से वर्ष में 4 बार ऊ न उतारी जाती है। औसतन एक खरगोश 200 से 250 ग्राम ऊन देता है। पहली ऊ न की कटाई खरगोश की 60 दिन की उमर पर कर देनी चाहिए, लेकिन दिसंबर या जनवरी में सर्दी के मौसम में ऊ न नहीं काटनी चाहिए।
अंगोरा खरगोश पालन हेतु अनुकूल है। अंगोरा पालन प्रदेश के कृषकों व बेरोजगार युवक-युवतियों द्वारा अपनाया जा रहा है। आरंभ में खरगोश प्रजनन फार्म नगवाई (जिला मण्डी) में 1984 में स्थापित किया गया था। इसके पश्चात पालमपुर में सन् 1986 में दूसरा खरगोश प्रजनन प्रक्षेत्र खोला गया। इन प्रक्षेत्रों में जर्मन अंगोरा खरगोश रखे जाते हैं। अंगोरा खरगोश की ऊन मुलायम और बारीक होती है, जिसकी बाजार में अच्छी कीमत मिलती है। अंगोरा खरगोश पालन के इच्छुक व्यक्तियों को विभागीय प्रक्षेत्रों पर प्रशिक्षण प्रदान करवाया जाता है।
कुछ अन्य महत्वपूर्ण बातें
खरगोश को पकडऩे व उठाने में विशेष ध्यान देना चाहिए। खरगोश को ऊपर से हाथ को कन्धे पर रखकर दोनों तरफ चमड़ी को पकड़ कर तथा दूर हाथ पेट के नीचे पिछले भाग में रखकर उठाया जाता है। कभी भी खरगोश को कान व टांगों से नहीं उठाना चाहिए।
कौपरोफेजी- खरगोश अपनी मेंगनों का एक भाग दोबारा खा जाता है। यह सामान्य बात है। यह मेंगने आम तौर पर दो प्रकार की करता है। जो मेंगने नरम हल्की हरी सी होती है, उन्हें वापस खा जाता है। खरगोश बैक्टीरियल पाचन का पूरा फायदा उठाता है, जो मेंगने दिन में करता है वह मामूली मटियाली और सख्त होती हैं वह उन्हें नहीं खाता। अंगोरा खरगोश नाजुक व डरपोक जानवर होता है। इसके आसपास विस्फोट, शोरगुल आदि उत्पादन क्षमता पर बुरा प्रभाव डालते हैं। अंगोरा इकाई छोटे रूप में 10-15 खरगोशों से शुरू करनी चाहिए।
सामान्य बीमारियां एवं उनकी रोकथाम
खरगोशों में पाई जाने वाली मुख्य बीमारियों में कक्सीडियोसिस, टलारीमियाय, मयुकोएड एंटरोपैथी, न्यूमोनियाय, आंख आना, रिंग वर्मय, फोड़े इत्यादि प्रमुख हैं। इनकी रोकथम के लिए पिंजरों में आहार व पानी के बर्तनों व अन्य उपयोग में आने वाले उपकरणों को समय पर कीटाणु रहित करना चाहिए। किसी भी अंगोरा कक्सीडियोसिस इकाई का लाभप्रद होना मुख्यत: ऊन उत्पादन तथा ऊन की कीमत तथा आहार के मूल्य पर निर्भर करती है। ऊन का विक्रय ही आय का मुख्य स्त्रोत है। ऊन के इलावा इनकी खाल, मांस तथा युवा खरगोशों के विक्रय से भी आय में वृद्धि होती है। अंगोरा खरगोश इकाईयों को आर्थिक दृष्टि से जीवित रखने तथा खरगोशों की ऊन उत्पादन क्षमता को बनाए रखने हेतु बढिय़ा स्टाकॅ का चयन करना व कम उत्पादन वाले खरगोशों का नियमित रूप से निष्कासन अति आवश्यक है।



Monday, August 5, 2013

दिमागी कसरत


इस फोटो को देख कर अपने दिमाग के घोड़े को दौड़ना है….
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आप को ये बताना है कि इस फोटो में कितने जानवर हैं??


Monday, July 22, 2013

पढ़िए 'घरेलू प्राणी पति' की मजेदार परिभाषा


पति एक घरेलू प्राणी है , यह सभी घरों में अनिवार्य रूप से पाया जाता है।

इस घरेलू प्राणी को पालने का पूरा अधिकार पत्नी नामक ओहदे से सम्मानित महिला को प्राप्त होता है।

1. इसकी दो आंखे होती है जिससे यह मूक रहकर मात्र देखता है।

2. इसके दो कान होते है जिससे पत्नी कि डांट फटकार सुनता है।

3. इसका एक मुख होता है जिसके खुलने पर पूर्णतः पाबंदी होती है।

4. इसकी इकलौती कटी नाक में अदृश्य नकेल होती है।

5. यह काफी कुछ मनुष्य से मिलता जुलता प्राणी होता है।

6. वैसे पति होने से पूर्व यह मनुष्य कि श्रेणी में होता है।

पति के प्रकार:

जोरू का गुलाम: यह प्रजाति हमारे देश में बहुतायत रूप से पायी जाती है। इस प्रजाति के पति टिकाऊ, मेहनती, सीधे व वफादार होते है। यह उम्दा नस्ल के होते है। डांट, मार, गालियां इन पर प्रभावहीन होती है। पालने के लिए यह पति सबसे अच्छे होते है।

जोरू का बादशाह: यह प्रजाति धीरे धीरे लुप्त होती जा रही है इसलिए सरकार जल्द ही इनके संरक्षण के लिए "बादशाह पति संरक्षण " नामक अभियान चलने जा रही है|

Thursday, July 11, 2013

रोचक इंटरव्यू: हर सवाल का जवाब M.P

अफसर -: आपका नाम क्या है..?
मोहन -: एम.पी.,
अफसर -: ठीक से पूरा बताओ
मोहन -: मोहन पाल,
अफसर -: आपके पिता का नाम?
मोहन : एम.पी.,
अफसर -: इसका क्या मतलब है?
मोहन -: मनमोहन पाल
अफसर -: आप कहां रहते हैं?
मोहन : एम.पी., सर।
अफसर -: अच्छा, मध्य प्रदेश?
मोहन -: नहीं सर, महाराजपुर
अफसर -: ओह,हो! तुम्हारी क्वालिफ़िकेशन क्या है?
मोहन -: एम.पी., सर।
अफसर -: अब यह क्या है?
मोहन -: मैट्रिक पास, सर।
अफसर -: तुम्हे यह नौकरी क्यूं चाहिए?
मोहन -: एम.पी., सर।
अफसर -: (गुस्से से) अब इसका क्या मतलब है?
मोहन -: मनी प्रॉब्लम , सर।
अफसर -: अपनी विशेषता बताओ।
मोहन -: एम.पी., सर।
अफसर -: अरे, साफ-साफ बताओ।
मोहन -: मल्टिपरपज परस्नैलिटी।
अफसर -: इंटरव्यू यहीं खत्म होता है, आप जा सकते हैं।
मोहन -: एम.पी., सर।...??
अफसर -: अब इसका क्या मतलब है...?
मोहन -: मेरा परफ़ारमेंस...?
अफसर -: (बाल नोचते हुए) एम.पी. !!!
मोहन -: यानि..?
अफसर -: MENTALLY PUNCTURE

Thursday, June 27, 2013

स्मरण शक्ति और बुद्धि बढ़ाने वाली ब्राह्मी


ब्राह्मी को यह नाम उसके बुद्धिवर्धक होने के गुण के कारण दिया गया है। इसे जलनिम्ब भी कहते हैं क्योंकि यह प्रधानतः जलासन्न भूमि में पाई जाती है। मुख्यतः यह हिमालय की तराई, बिहार तथा उत्तर प्रदेश आदि में नदी नालों के किनारे पाई जाती है। गंगा नदी के किनारे भी यह लगभग पूरे वर्ष ही पाई जाती है।
इसका पौधा फैलने वाला होता है। इसकी पत्तियां चिकनी तथा नरम होती हैं जिनकी लंबाई ज्यादा से ज्यादा एक इंच तथा चौड़ाई सामान्यतः 10 मिलीमीटर होती है। इसमें गर्मियों में नीले सफेद या हल्के गुलाबी रंग के फूल आते हैं जिनमें से छोटे−छोटे बीज निकलते हैं। इसका काण्ड लगभग 2−3 फुट ऊंचा होता है परन्तु यह छोटा और झुका हुआ दिखाई देता है क्योंकि काण्ड की ग्रंथियों से जड़ें निकलकर जमीन पकड़ लेती हैं।
ब्राह्मी में एल्केलाइड तथा सेपोनिन नामक दो मुख्य जैव सक्रिय पदार्थ पाए जाते हैं। इसमें पाए जाने वाले दो मुख्य एल्केलाइड हैं ब्राह्मीन तथा हरपेस्टिन जबकि बेकोसाइड ए तथा बी मुख्य सेपोनिन हैं। गुणों की दृष्टि से ब्राह्मी कुचला में पाए जाने वाले एल्केलाइड स्ट्रीककनीन के समान हैं परन्तु यह उसकी तरह विषाक्त नहीं होती। इनके अतिरिक्त ब्राह्मी में बोटूलिक अम्ल, डी0 मेनिटॉल, स्टिग्मा स्टेनॉल, बीटा−साइटोस्टीरॉल तथा टेनिन आदि भी पाए जाते हैं। हरे पत्तों में प्रायः एल्केलाइड तथा उड़नशील तेल पाए जाते हैं जबकि सूखे पौधों में सेण्टोइक एसिड तथा सेण्टेलिंक एसिड भी पाए जाते हैं।
ब्राह्मी के पौधे के सभी भाग उपयोगी होते हैं। प्रायः इसका ताजा या सुखाया गया पचांग प्रयोग किया जाता है। जहां तक हो सके ब्राह्मी को ताजा ही प्रयोग करना चाहिए। परन्तु जहां यह उत्पन्न नहीं होती वहां इसका छाया में सुखाया गया पचांग ही प्रयोग में लाया जाता है। यदि इसे उबाला जाए या धूप में सुखाया जाए तो इसका उड़नशील तेल नष्ट हो जाता है और इसके गुण नष्ट हो जाते हैं इस कारण इसका क्वाथ भी प्रयोग में लाया जाता है। सुखा कर रखे गए पचांग के चूर्ण को एक वर्ष तक प्रयोग किया जा सकता है।
ब्राह्मी का प्रभाव मुख्यतः मस्तिष्क पर पड़ता है। यह मस्तिष्क के लिए एक पौष्टिक टॉनिक तो है ही साथ ही यह मस्तिष्क को शान्ति भी देती है। लगातार मानसिक कार्य करने से थकान के कारण जब व्यक्ति की कार्यक्षमता घट जाती है तो ब्राह्मी का आश्चर्यजनक असर होता है। ब्राह्मी स्नायुकोषों का पोषण कर उन्हें उत्तेजित कर देती है और हम पुनः स्फूर्ति का अनुभव करने लगते हैं।
मिरगी तथा उन्माद में भी यह बहुत लाभकारी होती है। मिरगी के दौरों में यह विद्युत स्फुरण के लिए उत्तरदायी केन्द्र को शांत करते हैं इससे स्नायुकोषों की उत्तेजना कम होती है तथा दौरे धीरे−धीरे घटते हुए लगभग बिल्कुल बंद हो जाते हैं। उन्माद में भी यह इसी प्रकार काम करती है।
उदासी, निराशाभाव तथा अधिक बोलने से होने वाले स्वर भंग में भी ब्राह्मी बड़ी गुणकारी होती है। यदि कोई बच्चा जन्म से ही तुतलाता हो तो उसका उपचार भी ब्राह्मी द्वारा सफलतापूर्वक किया जा सकता है। अनिद्रा के उपचार के लिए ब्राह्मी चूर्ण की तीन ग्राम मात्रा को गाय के दूध के साथ रोगी को दिया जाता है। यदि ताजा पत्ते उपलब्ध हों तो इसके 20−25 पत्तों को अच्छी तरह साफ करके आधा किलो गाय के दूध में घोंट छानकर लगभग सात दिनों तक दिया जाता है। इससे वर्षों पुराना अनिद्रा का रोग भी दूर हो जाता है।
मिरगी के दौरों में ब्राह्मी का रस आधा चम्मच शहद के साथ दिया जाता है यदि रस उपलब्ध नहीं हो तो चूर्ण का शहद के साथ प्रयोग किया जा सकता है। शुरू में चूर्ण केवल ढाई ग्राम ही देना चाहिए परन्तु यदि फायदा न हो तो 5 ग्राम तक दिया जा सकता है।
स्मृति दौर्बल्य तथा अल्पमंदता में ब्राह्मी का रस या चूर्ण पानी या मिसरी के साथ रोगी को दिया जाना चाहिए। ब्राह्मी के तेल की मालिश से मस्तिष्क की दुर्बलता तथा खुश्की दूर होती है तथा बुद्धि बढ़ती है। तेल बनाने के लिए 1 लीटर नारियल तेल में लगभग 15 तोला ब्राह्मी का रस उबाल लें। यह तेल सिरदर्द, चक्कर, भारीपन, चिंता आदि से भी राहत दिलाता है।

हिस्टीरिया जैसे रोगों में यह तुरन्त प्रभावी होती है जिससे सभी लक्षण तुरन्त नष्ट हो जाते हैं। चिन्ता तथा तनाव में ठंडाई के रूप में भी इसका प्रयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त किसी ज्वर या अन्य बीमारी के कारण आई निर्बलता के निवारण के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। कुष्ठ तथा अन्य चर्म रोगों में भी यह उपयोगी है। बच्चों को खांसी या छोटी उम्र में क्षयरोग होने पर छाती पर इसका गर्म लेप करना चाहिए। खांसी तथा गला बैठने पर इसके रस का सेवन काली मिर्च तथा शहद के साथ करना चाहिए। अग्निमंदता रक्त विकार तथा सामान्य शोध में भी यह तुरन्त फायदा पहुंचाती है।