Wednesday, November 19, 2014

कैसे बनाएं वेब ब्राउजर को बेहतर



इंटरनेट पर जाने के लिए जिस प्लैटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं उसे ब्राउजर कहते हैं। मिसाल के तौर पर मोजिला, क्रोम, और एक्सप्लोरर। इन ब्राउजर्स की ताकत को बढ़ाने के लिए खास प्रोग्राम इंस्टॉल कर सकते हैं जिन्हें एक्सटेंशन कहते हैं। इन्हें इंस्टॉल करने के तरीके और फायदे के बारे में बता रहे हैं बालेन्दु शर्मा दाधीच:

ऐसे इन्स्टाल करें क्रोम के ऐड-ऑन 1. ब्राउज़र के सबसे दाईं ओर बने टूल्स आइकन पर क्लिक करें और फिर More Tools-Extensions मेन्यू पर क्लिक करें।
2. अब एक वेब पेज खुलेगा, जिसमें आपके ब्राउज़र में इंस्टॉल किए गए एक्सटेंशनों का ब्यौरा दिखाई देगा। यहीं पर नीचे की ओर Get more extensions नामक लिंक दिखेगा। इसे क्लिक करें। अब क्रोम वेब स्टोर नामक वेब पेज खुल जाएगा।
3. क्रोम वेब स्टोर को सीधे chrome.google.com/webstore टाइप करके भी खोला जा सकता है।
4. याद रहे, ऐसा करते वक्त आप इंटरनेट से कनेक्ट होने चाहिए। वेब स्टोर पर बाईं ओर Extensions नामक मेन्यू पर क्लिक करें। यहां तमाम तरह के एक्सटेंशनों का ब्यौरा दिखाई देगा, जैसे- Accessibility, By Google, Blogging, Search Tooks, Productivity आदि। इनमें से अपनी पसंद के विकल्प को चुनें और सामने दिखने वाले एक्सटेंशनों की सूची में से जरूरत के एक्सटेंशन का चुनाव कर लें, जैसे- गूगल डिक्शनरी या गूगल इनपुट टूल्स आदि।
5. अपनी पसंद के एक्सटेंशन के आइकन पर क्लिक करें। अब उसका ब्यौरा दिखाया जाएगा, जैसे कीमत और फीचर्स आदि। अगर ठीक लगता है तो ऊपर दाईं तरफ़ दिए नीले बटन पर क्लिक करें। आपसे इंस्टॉलेशन की पुष्टि करवाई जाएगी और इसके बाद एक्सटेंशन इन्स्टाल हो जाएगा और उसका आइकन ऊपर टूलबार में दिखने लगेगा।
6. अब अपने आपने ब्राउज़र में एक नई पावर जोड़ ली है। आइकन को क्लिक कर अब इस एक्सटेंशन का इस्तेमाल उसी तरह कर सकते हैं जैसे ब्राउज़र के दूसरे फीचर्स का किया जाता है।

इन्हे आजमाएं ऐडब्लॉक प्लस: अगर आप अपने ब्राउज़र में बार-बार उभरने वाले विज्ञापनों से परेशान हैं तो इस एक्सटेंशन का इस्तेमाल करें। यह न सिर्फ ज्यादातर विज्ञापनों को दिखने से रोकता है बल्कि स्पाईवेयर वगैरह को रोकने के लिए फिल्टर भी उपलब्ध कराता है। सुरक्षित और सुविधाजनक ब्राउज़िंग के लिए यह एक अच्छी युटिलिटी है।

ब्लैक मेन्यू: अगर आप बहुत सी गूगल साइटों का इस्तेमाल करते हैं (जैसे जीमेल, गूगल प्लस, गूगल ट्रांसलेट, गूगल मैप्स वगैरह) तो उन्हें बार-बार खोलने के झंझट से बचने के लिए इस क्रोम एक्सटेंशन का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह आपकी तमाम गूगल सर्विसेज को एक साथ, एक ही जगह पर आसान तरीके से मुहैया करा देता है। उसके बाद किसी को भी एक्सेस करना सिर्फ एक क्लिक का काम है।

माइटी टेक्स्ट: यह एक्सटेंशन आपके कंप्यूटर को ऐंड्रॉयड फोन के साथ कनेक्ट और सिंक्रनाइज़ करने की अनूठी सुविधा देता है। न सिर्फ आप अपने स्मार्टफोन के एसएमएस और एमएमएस मेसेज कंप्यूटर पर देख सकेंगे बल्कि कंप्यूटर के ही जरिए एसएमएस भी भेज सकेंगे। आप चाहें तो इसका इस्तेमाल अपने मेसेज को कंप्यूटर पर आर्काइव करने के लिए भी कर सकते हैं।

सिनाटा: आजकल हम बहुत सी क्लाउड बेस सर्विसेज का इस्तेमाल करते हैं, जैसे- फाइलों को सहेजने के लिए गूगल ड्राइव, वन ड्राइव या ड्रॉप बॉक्स, ऑफिस के कामकाज के लिए ऑफिस 365 या गूगल डॉक्स आदि। अगर आप इन सबको किसी एक जगह पर, सुविधाजनक अंदाज में एक्सेस करना चाहें तो सिनाटा का इस्तेमाल करें, जो इन सभी ठिकानों पर आपकी फाइलों को मैनेज, सर्च आदि करना आसान बनाता है।

जीमेल ऑफलाइन : आम तौर पर वेब बेस ईमेल सर्विसेज को इस्तेमाल करने के लिए इंटरनेट कनेक्शन की जरूरत होती है। न सिर्फ नए, बल्कि पुराने ईमेल मेसेज देखने के लिए भी आपको इंटरनेट पर लॉगिन करना होता है। लेकिन जीमेल ऑफलाइन क्रोम एक्सटेंशन यह सुविधा देता है कि सभी पुराने मेसेज ऑफलाइन भी देख सकें। यानी इंटरनेट का इस्तेमाल सिर्फ तभी करें जब नए मेसेज देखने हों या फिर कोई नया ईमेल भेजना हो। बाकी सब काम बिना इंटरनेट के, ऑफलाइन।

एवरनोट वेब क्लिपर: कई मौकों पर आप किसी पसंदीदा वेब पेज को सहेजकर रखना चाहते हैं, फिर भले ही वह स्क्रीनशॉट के रूप में हो या फिर पीडीएफ फाइल के रूप में। यह क्रोम एक्सटेंशन आपको वेब पेजों के किसी खास हिस्से या पूरे वेब पेज को सहेजने की सुविधा देता है, ताकि आप उन्हें फुर्सत से ऑफलाइन पढ़ सकें। इन पेजों को वेब, पीडीएफ या इमेज फॉर्मेट में सहेजा जा सकता है।

न्यूज़ स्क्वेयरः बहुत से ठिकानों से इकट्ठी की गई दिलचस्प और अहम खबरों को सरल अंदाज में पढ़ने-लिखने और एक्सेस करने की सुविधा देने वाला यह एक्सटेंशन अपने कूल डिजाइन के लिए जाना जाता है। इसमें हर खबर का शीर्षक एक खूबसूरत बॉक्स में हाइलाइट करके दिखाया जाता है और इसीलिए इसका नाम है न्यूज़ स्क्वेयर। आप पसंदीदा वेबसाइटों की ताजातरीन खबरों से लगातार जुड़े रहने के लिए इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। आपको उन सभी वेबसाइटों का बार-बार चक्कर लगाने की जरूरत नहीं रहेगी। आप चाहें तो इन खबरों को सोशल मीडिया पर शेयर भी कर सकते हैं।

गूगल ट्रांसलेट: गूगल की ट्रांस्लेशन सर्विस दुनिया भर में पॉप्युलर है। इसमें हिंदी समेत दूसरी भाषाओं के बीच आपस में अनुवाद करने की सुविधा मौजूद है। लेकिन बार-बार गूगल ट्रांसलेट की वेबसाइट पर जाना मुश्किल भरा महसूस हो सकता है। आप चाहें तो इस क्रोम एक्सटेंशन की मदद से गूगल ट्रांसलेट सर्विस से हमेशा जुड़े रह सकते हैं और एक ही क्लिक में ट्रांस्लेशन की सुविधा का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह एक्सटेंशन इंस्टॉल करने के बाद ब्राउज़र में दिखने वाले वेब पेजों को पूरा का पूरा ट्रांसलेट करके दूसरी भाषा में देखना मुमकिन है।

ऐसे इंस्टॉल करें फायरफॉक्स के ऐड-ऑन 1. सबसे पहले मेन्यू बटन पर क्लिक करें। अब Fx नाम के विकल्प पर क्लिक करें और फिर Add-ons को चुनें।
2. इससे ऐड-ऑन मैनेजर टैब खुल जाएगा। यहां Get Add-ons नामक पैनल को सलेक्ट करें।
3. आप चाहें तो किसी ऐड-ऑन को इंस्टॉल करने से पहले उसके बारे में ज्यादा जानकारी पाना चाहें तो उस पर क्लिक करें।
4. अगर सब कुछ मनमुताबिक है तो वहां बने हरे रंग के Add to Firefox नामक बटन पर क्लिक करें। ऐड-ऑन इंस्टॉल होने लगेगा।
5. अगर आपकी पसंद या जरूरत का ऐड-ऑन यहां मौजूद नहीं है तो ऊपर बने सर्च बॉक्स का इस्तेमाल पसंदीदा ऐड-ऑन की खोज के लिए करें। सर्च नतीजों में दिखने वाले ऐड-ऑन के साथ दिखने वाले Add to Firefox बटन पर क्लिक करें।
6. फायरफॉक्स पूछेगा कि क्या आप इस ऐड-ऑन को इंस्टॉल करना चाहते हैं? इस पर हां में जवाब दें। ऐड-ऑन इंस्टॉल हो जाएगा।
7. यदि ब्राउज़र को रिस्टार्ट करने का मेसेज मिले तो उसे रिस्टार्ट कर लें। ऐड-ऑन एक्टिव हो जाएगा।

इन्हें आजमाएं

विडियो रिज्यूमर: वेब पर देखे जाने वाले विडियो आम तौर पर हमेशा शुरूआत से दिखते हैं। लेकिन इस ऐड-ऑन के जरिए आप फायरफॉक्स में देखे जाने वाले विडियो को उसी जगह से शुरू कर सकते हैं जहां तक आपने इसे पिछली बार देखा था। जाहिर है, यह आपका वक्त भी बचाएगा और इंटरनेट का डाटा भी।

स्टाइलिश: अगर आप वेबसाइटों का पारंपरिक रंगरूप देखकर बोर हो चुके हैं तो इस ऐड-ऑन को आजमाएं जो किसी फेसबुक, गूगल, यूट्यूब आदि वेबसाइटों का चेहरा-मोहरा और रंगरूप बदलकर दिखाने लगता है। यह खास तरह की थीम को उन वेबसाइटों पर एप्लाई करके ऐसा करता है।

ब्लूहेल फायरवॉल: वेब ब्राउज़िंग को ज्यादा सेफ बनाने के लिए कई तरह के सॉफ्टवेयर, ऐड-ऑन और एक्सटेंशन इस्तेमाल होते हैं। बहरहाल, यह एक बहुत हल्का फुल्का ऐड-ऑन है जो न सिर्फ आपके ब्राउज़र को वायरसों और स्पाईवेयर से सुरक्षित रखने में सक्षम है बल्कि जटिलता से भी पूरी तरह मुक्त है।

एक्स-नोटिफायर : इस ऐड-ऑन को अपने ईमेल अकाउंट्स से जोड़ने के बाद आप किसी भी नए ईमेल को पढ़ने में देर नहीं करेंगे क्योंकि यह लगातार आपके ईमेल अकाउंट्स पर नजर रखेगा। जैसे ही आपके वेब अकाउंट में कोई नया ईमेल आएगा, यह तुरंत आपको सूचित करेगा, भले ही उस वक्त आप कोई दूसरी वेबसाइट ही क्यों न देख रहे हों।

ऐसे इंस्टॉल करें इंटरनेट एक्सप्लोरर के ऐड-ऑन 

इंटरनेट एक्सप्लोरर में 'ऐड-ऑन' नामक टूल्स इंस्टॉल करने की व्यवस्था है। ऐड-ऑन की परिभाषा अधिक व्यापक है। इसमें प्लग-इन भी आते हैं और एक्सटेंशन जैसे टूल्स भी। क्रोम वेब स्टोर की ही तरह माइक्रोसॉफ्ट ने भी इनके लिए एक खास वेबसाइट बनाई है, जिसका नाम है- इंटरनेट एक्सप्लोरर गैलरी। यहां दर्जनों किस्म के उपयोगी ऐड-ऑन आपका इंतजार कर रहे हैं, जिन्हें अपने ब्राउज़र में इंस्टॉल करके इसे और पावरफुल बनाया जा सकता है। इसके लिए इस तरह आगे बढ़ें:

1. इंटरनेट एक्सप्लोरर में यह वेब पता टाइप करें - iegallery.com
2. अब खुलने वाले पेज पर Pinned Sites, Add-ons और Tracking Protection Lists नामक तीन ऑप्शन दिखाई देंगे। इनमें से Add-ons पर क्लिक करें।
3. इससे बाईं तरफ कई तरह के ऐड-ऑन का ब्यौरा दिखाई देगा, जैसे- विडियोज, सोशल, सर्च, यूटिलिटीज आदि। अपनी ज़रूरत के लिहाज से कैटिगरी को क्लिक करें। इससे सामने की ओर मौजूद ऐड-ऑन की लिस्ट दिखाई देगी।
4. अपनी पसंद के ऐड-ऑन के आइकन पर क्लिक करें। इससे एक वेब पेज खुलेगा, जिस पर Add to Internet Explorer लिखा बटन दिखाई देगा। इस पर क्लिक करें।
5. जरूरत का प्लग-इन या ऐड-ऑन इंस्टॉल हो जाएगा।

इन्हें आजमाएं

पैरंटल कंट्रोल: जो पैरंट्स इस बात को लेकर परेशान रहते हैं कि उनके बच्चे कहीं गलत वेबसाइटों का इस्तेमाल तो नहीं कर रहे, वे इस ऐड-ऑन को इन्स्टाल करके देखें। यह आपको अपने ब्राउज़र का बेहतर ढंग से कंट्रोल करने की सुविधा देता है, खासकर ऐडल्ट वेबसाइटों पर रोक लगाना बहुत आसान है।

गूगल प्रिव्यू : किसी वेब पेज पर दिखने वाले किसी भी शब्द से जुड़ी वेब सर्च को आसान ढंग से अंजाम देने के लिए यह प्लग इन इस्तेमाल होता है। किसी वेब पेज से हटे बिना ही उसमें मौजूद शब्दों से जुड़ी सर्च करने के लिए इसे आजमाएं। इससे आपका काफी वक्त बचेगा।

रीड ऑन वेब : इसका इस्तेमाल वेबसाइटों की सामग्री को आसान अंदाज में पढ़ने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। यह वेब पेज पर मौजूद तमाम दूसरी सामग्री (विज्ञापन, विजेट, ग्राफिक्स आदि) को हटाकर सिर्फ मूल सामग्री (लेख आदि) को स्क्रीन पर दिखाता है। आप चाहें तो इन्हें बाद में पढ़ने के लिए सहेज सकते हैं या जरूरत के मुताबिक ऐडिट भी कर सकते हैं।

स्पेकी : किसी ईमेल, ब्लॉग, सोशल नेटवर्क या फिर फॉर्म में टाइप किए गए अंग्रेजी शब्दों की स्पेलिंग चेक करने के लिए स्पेकी एक अच्छा ब्राउज़र ऐड-ऑन है। यह गलत महसूस होने वाले शब्दों की पहचान करता है और उनके नीचे लाल घुमावदार अंडरलाइन कर देता है। करीब-करीब उसी तरह जैसे एमएस वर्ड में होता है। इस शब्द पर राइट क्लिक करके आप सही स्पेलिंग देख सकते हैं और क्लिक करके उसे बदल भी सकते हैं।

प्लग-इन बोले तो
प्लग-इन ब्राउज़र से बाहर, कंप्यूटर में इन्स्टाल ऐसे प्रोग्राम होते हैं, जो किसी वेब पेज पर मौजूद खास कंटेंट को दिखाने में ब्राउज़र की मदद करते हैं। प्लग-इन दो तरह के होते हैंः
पहले वे, जिनकी जरूरत किसी वेबसाइट में इस्तेमाल किए गए खास किस्म के कंटेंट या सामग्री को देखने या इस्तेमाल करने के लिए पड़ती है। मिसाल के तौर पर किसी साइट पर फ्लैश एनिमेशन का इस्तेमाल किया गया हो। वह एनिमेशन आपके ब्राउज़र में तब तक दिखाई नहीं देगा, जब तक कि उसमें फ्लैश प्लेयर नामक प्लग-इन मौजूद न हो। यह प्लग-इन इन्स्टॉल किए जाने के बाद ब्राउज़र फ्लैश एनिमेशन को दिखाने में सक्षम हो जाता है। इस तरह के प्लग-इन में ऑडियो, विडियो, एपल क्विक टाइम, जावा, माइक्रोसॉफ्ट सिल्वरलाइट, ऐडोब रीडर वगैरह को लिया जा सकता है। ब्राउज़र में कोई खास जावा ऐप चलाना तब तक संभव नहीं होगा, जब तक कि उसमें जावा प्लग-इन मौजूद न हो। इन सभी प्लग-इंस का संबंध वेब पेज के भीतर की सामग्री को देखने-पढ़ने और इस्तेमाल करने से है।

दूसरी तरह के प्लग-इन ज्यादा पावरफुल होते हैं। इनका इस्तेमाल ब्राउज़र के भीतर खास किस्म की एक्टिविटी को अंजाम देने के लिए किया जाता है। मिसाल के तौर पर आपके ब्राउज़र में यह इन-बिल्ट क्षमता मौजूद नहीं है कि वह किसी वेबसाइट में वायरस की मौजूदगी को जांच कर आपको सचेत कर सके और संबंधित वेब पेज को खुलने से रोक सके। अलबत्ता, नॉर्टन, मैकेफी, अवास्ट आदि एंटी-वायरस कंपनियों की तरफ से बनाए गए खास प्लग-इन को इंस्टॉल करने पर ऐसा मुमकिन हो जाता है। यहां पर प्लग-इन ब्राउज़र के भीतर रहकर काम करने वाले किसी इंडिपेंडेंट सॉफ्टवेयर की तरह काम करता है। इस तरह के प्लग-इन में एंटी-वायरस, एंटी-स्पाईवेयर, स्क्रीनशॉट मेकर, ऑडियो ऐडीटिंग टूल, वेब सर्च प्लग-इन, स्पेलिंग चेकर आदि को लिया जा सकता है। इस किस्म के प्लग-इन ब्राउज़र के भीतर रहते हुए ऐसे काम करते हैं, जिन्हें ब्राउज़र खुद नहीं कर सकता। हालांकि वे ब्राउज़र से अलग रहते हुए, अपनी अलग पहचान बनाए रखते हैं। अमूमन प्लग-इन के उलट इनका इस्तेमाल वेब पेज की सामग्री को देखने-पढ़ने और इस्तेमाल करने तक सीमित नहीं है बल्कि वह इन पेजों की सामग्री में सुधार, उसके लिए फैसले करने (जैसे असुरक्षित वेब पेज को लोड होने से रोकना) और किसी सॉफ्टवेयर जैसे काम (जैसे फोटो में काट-छांट) करने में किया जाता है।

एक्सटेंशन का ऐंगल
आपने एक तीसरी किस्म की चीज़ का जिक्र भी सुना होगा, जिसे एक्सटेंशन कहते हैं। खासकर गूगल क्रोम के पॉप्युलर होने के बाद एक्सटेंशनों के इस्तेमाल में भी खूब इजाफा हुआ है। एक्सटेंशन खुद ब्राउज़र की पावर को बढ़ाते हैं और उसमें नए फीचर, नई क्षमताएं जोड़ देते हैं। लेकिन वे किसी इंडिपेंडेंट टूल की तरह नहीं बल्कि ब्राउज़र का ही एक हिस्सा बनकर काम करते हैं। कई बार ब्राउज़र के फीचर्स की संख्या बहुत ज्यादा होती है लेकिन उनको डिवेलप करने वाली कंपनी उन्हें एक हल्के-फुल्के और आसानी से डाउनलोड और इंस्टॉल होने वाले सॉफ्टवेयर के रूप में छोटे साइज में जारी करती है। वह यूज़र को यह छूट देती है कि एक बार मूल ब्राउज़र सॉफ्टवेयर को इंस्टॉल करने के बाद अपनी जरूरत के लिहाज से फीचर्स को बाद में जोड़ ले। इन फीचर्स को एक्सटेंशन की तरह उपलब्ध कराया जाता है। जैसे- क्रोम वेब ब्राउज़र में अनुवाद, स्पेल चेक, वॉयस इनपुट जैसे एक्सटेंशन खुद गूगल ने उपलब्ध कराए हैं। क्रोम वेब स्टोर पर जाकर ऐसे एक्सटेंशन डाउनलोड और इंस्टॉल किए जा सकते हैं। वे आपके ब्राउज़र में नई काबिलियत जोड़ देते हैं। अगर गूगल ने क्रोम ब्राउज़र में पहले ही ये सभी एक्सटेंशन जोड़कर डाउनलोड करने के लिए उपलब्ध कराया होता तो डाउनलोड का साइज बहुत बड़ा होता और बहुत से लोग इसी वजह से उसे डाउनलोड नहीं करते। अगर पहले से मौजूद एक्सटेंशनों में से ज्यादातर हमारे लिए किसी काम के नहीं होते तो एक्सटेंशन की व्यवस्था बड़े काम की दिखाई देती है। यह कुछ वैसा ही है जैसे आप किसी दावत में अपनी प्लेट लेकर खड़े हो जाते हैं और खाने-पीने की सिर्फ उन्हीं और उतनी ही चीजों का इस्तेमाल करते हैं, जो आपके मन की हैं। वैसे तो वहां पर बहुत कुछ है। ब्राउज़र को डिवेलप करने वाली कंपनियां उनके लिए एक्सटेंशन बनाने की छूट प्राइवेट डेवलपरों और दूसरी कंपनियों को भी दे सकती हैं, बशर्ते वे उनकी तरफ से मुहैया कराए गए साधनों का इस्तेमाल करें और उनके बनाए नियमों का पालन करें। एक्सटेंशन फ्री भी हो सकते हैं और पेड भी।

कैसे इन्स्टाल करें प्लग-इन (सभी ब्राउज़रों में)
1. आम तौर पर किसी खास कंटेंट को दिखाने वाले प्लग-इन की गैर-मौजूदगी की हालत में ब्राउज़र में मेसेज दिखाई देते हैं जिसमें प्लग-इन का नाम और उसे डिवेलप करने वाली कंपनी का जिक्र होता है। मिसाल के तौर पर ऐडोबी फ्लैश प्लेयर, जहां कंपनी का नाम ऐडोबी है और प्लग-इन का नाम फ्लैश प्लेयर। कई बार इस मेसेज के साथ ही यूज़र को संबंधित प्लग-इन की डाउनलोड साइट पर जाने का लिंक भी मुहैया कराया जाता है।
2. जब ऐसा लिंक मुहैया न कराया जाए तो मेसेज में दिखने वाले प्लग इन और कंपनी का नाम गूगल में सर्च करें, जैसे Adobe Flash Player Download और सर्च नतीजों का इस्तेमाल कर डाउनलोड साइट तक पहुचें।
3. डाउनलोड साइट पर आपसे अपने ऑपरेटिंग सिस्टम (विंडोज, मैक, लिनक्स आदि), उसके वर्जन आर्किटेक्चर (32 बिट या 64 बिट) और ब्राउज़र के बारे में सवाल पूछे जा सकते हैं। इन्हें बताकर आप प्लग-इन की सही डाउनलोडेबल फाइल को चुनें। कुछ वेबसाइटें खुद ही आपके सिस्टम के अनुरूप सही डाउनलोड फाइल सुझा देती हैं। इससे जुड़े लिंक या बटन को क्लिक करें।
4. इससे इंस्टॉल होने योग्य प्लग-इन की सेटअप फाइल डाउनलोड होने लगेगी। डाउनलोड होने के बाद उसे डबल क्लिक कर इन्स्टाल कर लें। हो सकता है कि इस दौरान आपसे ब्राउज़र को बंद करने के लिए कहा जाए। वैसे कई बार प्लग-इन सीधे ही ब्राउज़र में इंस्टॉल हो जाता है।
5. इंस्टॉलेशन पूरा होने के बाद इससे संबंधित मेसेज दिखाई देता है। जैसे फ्लैश प्लेयर इंस्टॉल होने के बाद बाकायदा आपके ब्राउज़र में एक फ्लैश एनिमेशन दिखाकर पूछा जाता है कि क्या आप इसे देख पा रहे हैं? अब आप उस कन्टेन्ट को एक्सेस कर सकते हैं, जिसे इस प्लग-इन की गैर-मौजूदगी में इस्तेमाल नहीं कर पा रहे थे।

Friday, October 3, 2014

एक और रिहाना नहीं (कहानी)


दिन भर की बूँदा-बाँदी शाम को थककर बन्द हुई। हवा वातावरण में हल्की ठण्डक घोलने लगी। रूई के फाहों की तरह भूरे, कुछ हल्के स्लेटी बादल, आसमान के एक छोर पर धीरे-धीरे ऐसे इक_े हो रहे थे मानो आकाश जैसे बड़े कैनवस पर, कोई सुन्दर चित्रकला में रंग भरने की क्रिया कर रहा है। बारिश थमने के बाद से ही मैं छत पर बैठा इस अनोखी कारीगरी को देख रहा था। एकदम शान्त एकाग्र होकर जैसे मैं यह माने बैठा था कि मेरे कुछ बोल पडऩे या गुनगुनाने से आकाश में छपती ये सुन्दर आकृतियाँ बिगड़ जायेंगी कि अचानक चीख-चिल्लाहट की आवाज से मेरी एकाग्रता भंग हुई। यह आवाज मेरे पड़ौसी बुन्दू की बड़ी बेटी रिहाना की थी। बुन्दू मेरे घर के ठीक पीछे वाले प्लॉट में बने में एक कमरे में रहता है। मकान मालिक ने उसे खरीदा ही था कि उसे दिल्ली में काम मिल गया इसलिए किराए पर उठाकर चला गया। मैंने छत से झाँककर देखा रिहाना के हाथ आटे से सने हुये थे। आँखों से क्रोध में डूबी खीझ टपक रही थी। उसके मुँह से भद्दी गालियाँ निकल रहीं थीं जो उसके अपने छोटे नौ बहन-भाइयों के लिए थीं जिन्हें वह, कुनबा कह रही थी दारीकेऔ एकऊ ने आवाज निकारी तौ मौंह तोड़ दूँगी... कुनबा वा बाप ते नाय रोय सकतु जा नरिऐ भरिवे कूँ...? इतनौ कहाँ ते लाऊँ तुमकूँ। दरअसल यह उसके मन का गुबार अपने उस बाप के लिए था जिसके लिए पारिवारिक तथा सामाजिक सरोकारों का कोई अर्थ नहीं है। उसका दिन शराब की दुकान से शुरु होकर जुआरियों के साथ बैठकर खत्म होता है।
चीखती-चिल्लाती रिहाना, अपने बहन-भाइयों को रोटी तथा तरकारी बाँट कर दे रही थी तब बुन्दू ने घर में प्रवेश किया। उसकी आँखें लाल हो रहीं थीं। वह पूरी तरह शराब के नशे में था। रिहाना की आँखें बच्चों को इतनी रोटी से ही भूख शान्त करने का आदेश दे रहीं थीं ताकि उसके घर की अन्तिम सांसें गिनती आबरू अर्थी में न बदले। मगर बन्दू इतने पर भी शर्मसार तो बिल्कुल भी नहीं था हाँ गौरवान्वित मुद्रा में, मुहम्मद बिन तुगलक जैसी मूँछों पर हाथ फिरा रहा था। इस दृश्य को देखकर जैसे आसमान भी रो पड़ा था। बारिश तेज होन लगी तो मैं भी छत से उतरकर नीचे आ गया। कुछ देर बाद बारिश फिर थमी तो मेरी माँ कुछ रोटियाँ तथा तरकारी रिहाना की बीमार माँ को देने गयी।
रहीमा को टी.बी. की यह बीमारी विरासत में नहीं मिली बल्कि, भूखे पेट पूरा-पूरा दिन मेहनत करना ऊपर से पति द्वारा उसकी इच्छा के विरुद्ध नौ बच्चों को शीघ्रातिशीघ्र जन्म देने का परिणाम है। लोगों से सुनकर वह इतना भी जानती है कि, आज इस बीमारी का इलाज है। लेकिन चालीस रुपये में कॉल्डस्टोर में, जहाँ गर्मियों में भी हाड़ कंपा देने वाली सर्दी होती है में मजदूरी करके वह वर्षों से बच्चों का पेट भरने की कोशिश में ही जुटी रही है। अब ऐसे में उसे अपनी बीमारी का ध्यान ही कहाँ था...। किसी ने बताया था तो एक दो बार सरकारी अस्पताल गयी भी तो वहाँ देने के लिए उसके पास कुछ था नहीं इसलिए उसकी वहाँ सुनने वाला ही कौन था। उसके बाद उसने पति के नकारापन के साथ इस बीमारी को भी भाग्य का लेखा मान लिया किन्तु, उस पर अपने छोटे बेटे का अपाहिजपन नहीं देखा जाता। जब वह छोटा था तब तेज बुखार में उसे यह शिकायत हुई थी। डाक्टर ने कहा था कि अभी ठीक हो जायेगा। मगर दवाई के लिए पैसे कहाँ जुटा पायी। इसके लिए उसने बुन्दू से भी खूब झगड़ा किया एकाध बार पिटी भी। अन्त में एक दिन बुन्दू ने साफ कह दिया मर जान्दै भैन के लौड़ाऐ। जादा मरी जाय रई ऐ तौ दूसरौ खसम करि लै।
तू मरि तौ जा पहलैं तबई तौ कछु करि लुँगी। और कुछ न कर सकी बेटा अपाहिज हो गया। आज भी जब रहीमा की नजर अपने बेटे पर जाती है तो कलेजा धक से रह जाता है। इसी से तो उसने बुढ़ापे की उम्मीदें जोड़ीं थीं। बड़े बेटे रज्जाक का सहारा तो उसके लिए पहले ही जाता रहा है। वह अ_ारह वर्षीय हट्टा-कट्टा जवान है किन्तु रहीमा के लिए यह भी दुर्भाग्य की काली छाया ही है। वह अपने बाप से भी दो कदम आगे है। पक्का कामचोर बाप की तरह ही लड़ झगड़कर माँ की कमाई खा-खाकर खूब फल-फूल रहा है। ऐसे में रहीमा को यह मान लेने में ज्यादा कठिनाई नहीं होती कि रज्जाक के रूप में दूसरा बुन्दू तैयार हो रहा है जैसे इतिहास खुद को दुहराने की तैयारी कर रहा हो।
इन दिनों रहीमा को शारीरिक बीमारियों से ज्यादा उन्नीस वर्षीय रिहाना की शादी की चिंता सता रही है तभी उसकी बीमारी उसको चारपाई से न उठने को मजबूर कर रही है। ऐसे में वह किसका सहारा तलाशे पति का ... पुत्र का...? या स्वयं अपना ...? पति के इन कर्मों के कारण परिवार से भी सम्बन्ध टूटे वर्षों हो गये। इसलिए अब उनका मुँह फेरे रखना उसे कुछ गलत नहीं लगता। अब तक तो उसे भरोसा था कि बेटा सयाना हो जाएगा तो उसकी मुश्किलें कुछ कम हो जायेंगी परन्तु ऐसा भी नहीं हुआ। इसी दिन रात की चिन्ता ने रहीमा की कमर तोड़ कर रख दी। बीमारी ने भी उसके साथ कोई कसर नहीं छोड़ी, आखिर उसने चारपाई पकड़ ही ली। अब न चाहते हुए भी परिवार के पालन-पोषण की पूरी जिम्मेदारी ही रिहाना और अपाहिज पुत्र सलीम पर आ गई। सलीम का एक पैर जमीन पर नहीं आता है अब ऐसी हालत में भी सिलाई की मशीन चलाता देखकर किसी माँ का हृदय तार-तार क्यों न हो जाये...। स्यानी लड़की है, कोलिस्टोर में कैसे भेज दऊँ...? जमानौ ठीक नाँय मैं का करि लुंगी...। इसी डर से रिहाना घर पर ही मोतियों की माला बनाने में जुटी रहकर शाम तक कुछ पैसा कमाने और सुबह शाम ताऊ के घर पर खाना पकाती है सिर्फ कुछ रोटियों के लिए। करना तो उसकी माँ भी कुछ ऐसा ही चाहती है लेकिन असमर्थ है। तब वह बच्चों के पेट को डाँट-फटकार या कभी-कभी पिटाई व गालियों से भरकर सुलाने में मदद करती है। तब रिहाना इस तरह झल्लाने के अलावा कुछ नहीं कर पाती। कभी-कभी तो वह परेशान होकर मर जाना भी चाहती है किन्तु उसे इस कुनबे के सामने सिवाय अंधकार के कुछ भी तो नजर नहीं आता और अगले ही पल वह पूरी हिम्मत से खड़ी हो जाती है। मेरी माँ को हाथ में खाना लिए दरवाजे पर खड़ी देखकर रहीमा मुश्किल से उठकर आ सकी। मेरी माँ से यह खाना लेते वक्त रहीमा के हाथ काँप उठे थे। उसने कनखियों से देखा कि बुन्दू की निगाह उसी पर थीं परन्तु क्या करे, बच्चों का पेट तो भर ही जाएगा यही सोचकर उसने झुकी निगाहों से खाना ले लिया। परन्तु खौं-खौं करती रहीमा जैसे किसी बोझ से दबी जा रही हो। उसका चेहरा कुछ ज्यादा ही मलिन हो गया था। मेरी माँ के संकोच न करने के आग्रह पर उसने अपने आप को संयत करने का असफल प्रयास किया। रहीमा ने मुड़कर एक नजर बुन्दू पर डाली। उसे भय था कि आज वह जरूर मार-पीट करेगा... किन्तु बुन्दू की लालच में चमकी नजरें सिर्फ रोटियों पर ही टिकी थीं। ला रांणी जल्दी उसने रहीमा के हाथ से खाना छीन लिया और खा पीकर वहीं सो रहा। रहीमा मन मसोस कर यह देखती भर रही गयी। सिवाय आँखों से आँसू टपकाने के वह चाह कर भी कुछ न कर सकी।
रोज की तरह उस दिन भी मैं समाचार पत्र को उलट-पलटकर कोई सार्थक खबर पढऩे की तमन्ना में चाय की चुस्कियाँ भर रहा था कि सर जी नमस्ते यह अब्दुल था रिहाना के ताऊ का बड़ा लड़का। उम्र में रिहाना से लगभग तीन साल बड़ा। मेरी तरह उसका भी रोज का काम था मेरे पास बैठकर राजनैतिक खबरें पढऩा और उन पर अपनी टिप्पणी करते हुए नेताओं को गरियाना और उनके द्वारा पब्लिक को बेवकूफ समझ कर दिये गये बयानों पर ठठाकर हँसना साले उल्लू समझते हैं। मगर उसने मुझे दोपहर को बुन्दू के घर आने का आमंत्रण देकर चौंकाया आज कोयी खास बात है क्या...? मैंने पूछ लिया, उसके चेहरे पर एक अजीब सी वितृष्णा फैलकर स्थाई हो गयी अरे कुछ नहीं, मजबूरी है... कि पिताजी की नाक कटी जा रही है। उनकी मान-मर्यादा एकदम जाग गयी है... और भायपन भी... सो, साले इसी चाचा की लड़की की शादी करनी पड़ रही है... आज उसे देखने वाले आ रहे हैं। अन्तिम शब्दों तक आते आते वह अन्दर से खौलने लगा था। चलो कोई बात नहीं है... तुम इस लायक हो तो कर दो... आखिर बहन ही है। मैंने कहकर उसे चलता किया।
दोपहर तक बुन्दू के घर का स्वरूप ही बदल गया था। रहीमा के बच्चों के चेहरे उस दिन फूलों की तरह खिले हुये थे। घर में बन रहे खाने की महक उनकी आँखों में उतरकर चमक रही थी। यही खाना आज उन्हें भी मिलने वाला था। इसी उमंग में वे इधर-उधर खुशी से उछल-कूद रहे थे। डेढ़ वर्षीय बच्ची को आज पेट भर दूध मिल गया था इसलिए उसकी उल्लासभरी किलकारी अपनी तरफ ध्यान आकर्षित कर रही थी। रहीमा को भी जैसे कोई बीमारी नहीं रह गयी थी। वह हँसती सी चूल्हे के पास बैठी कुछ पका रही थी। उसने रिहाना की नानी द्वारा दिये गये कपड़े पहन रखे थे। चमकीला सा हरे रंग का सलवार तथा उसी रंग का कुर्ता और चमकीला गोटा लगा दुपट्टा, आज रेगिस्तान में भी जैसे हरियाली की लहर दौड़ पड़ी थी। बदन में बनियान तथा गमछा लपेटे रज्जाक, पड़ौस से चारपाई पर बिछाने को चादर माँ गकर लाया था। कुछ झुँझलाया सा क्यों कि आज उसे कुछ हाथ-पैर हिलाने पड़ रहे थे, अपनी मर्जी के बिना। बुन्दू कहीं नजर नहीं आ रहा था। यही सवाल उस बूढ़ी औरत के मन में था जो रहीमा से पूछ रही थी बुन्दू नाँय दिख रए का उनें पतौ नाँय? रहीमा खाँसी के बाद लम्बी-लम्बी साँसों को संयत करते हुए बोली बाय सब पतौए... परि कैसें आबैगौ? जेब में कछु होयगौ तबई तौ आबैगौ... शराब पीवे और सटटौ लगायवे ते फुरसत मिलै तबई तौ...?
उसने पल भर में पति को गालियों के साथ न जाने क्या-क्या भला-बुरा कह डाला। उस बूढ़ी ने जैसे उसके अन्दर पति के लिए सुलगती चिंगारी को हवा दे डाली थी। रिहाना के ताऊ शमशुद्दीन के डाँटनें पर ही वह शान्त हुई। किन्तु उसके होंठ देर तक कुछ बड़बड़ाते रहे। रिहाना की भाभी ने रिहाना के केशों को सँवार कर आँखों में काजल लगा दिया था। एकदम हरे रंग के कपड़ों में लिपटी रिहाना के लाली लगे होंठ कश्मीर की हरी वादी में खिले हुए किसी फूल की पंखुडी से दिखने लगे। चेहरे पर काजल लगी आँखें फूलों पर आ बैठे भँवरे सी दिखने लगी। पूरी तरह से सजी सँवरी रिहाना की झुकी हुई निगाहें उसे और सुन्दर बना रहीं थीं। माँ से रहा न गया तो उठकर एक काला टीका रिहाना के माथे पर लगा दिया कि बेटी को नजर न लग जाय। रिहाना इससे पूर्व इस दिन की कल्पना भी नहीं कर पाई थी। बाप की गैर जिम्मेदारी के कारण घर की जिम्मेदारियों के बोझ को ढोते-ढोते, उसे समय ही कहाँ मिला था, युवा सपने संजोने का। अब अचानक आये इस दिन न जाने कैसी-कैसी उथल-पुथल उसके भीतर हो रही थी। उसके हृदय की घड़कनें बढ़ी हुई थीं। साँसे तेज चल रही थीं। इसे उसके उरोजों के उत्थान-पतन से महसूस किया जा सकता था। कोई अनचाहा डर उसके भीतर वैचारिक भूचाल खड़ा कर रहा था। उसके मस्तिष्क पर रेखाएँ बन-बिगड़ रहीं थी। कैसा होगा वह घर...? कैसे लोग होंगे...? उसका दूल्हा कैसा होगा...? वह अपनी माँ के पति की कल्पना मात्र से ही सिहर उठती है। फिर अचानक उसके होंठ हल्की मुस्कान में फैलने लगे मन में कुछ गुदगुदी के साथ नयी तरंगे तरंगित होने लगीं जो उसके लिए बिल्कुल अनौखी और अंजान थी। वह मन के भीतर कहीं इस नारकीय घर से दूर, सपनों के एक ऐसे घर की बुनियाद रख रही थी जहाँ उसकी जिन्दगी भी सहेली वसीमा और किरण जैसी होगी। उसके सुख-दुख का ध्यान रखने वाला उसका पति होगा। दूर-दूर तक कोई दुख नहीं होगा। माँ की खांसी तथा छोटी बहन के रोने के सम्वेत स्वरों ने उसकी चेतना भंग कर दी। उसकी नजर माँ पर आकर ठहर गयी। आँखे लबालब भरी किसी झील सी नजर आने लगीं। मम्मी तौ अब बैठिवेतेऊ परेसानै तौ जि इन बालकन्ने कैसैं समारैगी...? अब तौ बामै इतनी तागतिऊ नाँय बची कै बाबूए परे धकेलि कै खुदकूँ बचायले.... जि मर जाइगी... वैसैंऊ अकेलौ सलीम जा कुनबाए कब तक जियावैगौ?
इन्हीं सब बातों को सोचते-सोचते उसकी आँखों का किनारा कहीं से टूट गया और पानी की बूँदें उसके गालों से लुढ़ककर उसके आंचल में दम तोडऩे लगीं। अचानक चार-पाँच स्त्री-पुरुषों के आते ही सब ऐसे सतर्क हो गए जैसे किसी मोर्चेबंदी पर हों। रिहाना को देखा जाने लगा बेटा जरा खड़ी हो जाना। लड़के का बाप बोला। रिहाना खड़ी हो गई। जरा चलके तो दिखा। लड़के की माँ ने पूरी तसल्ली कर ली कि वह लंगड़ी नहीं है। बेटा चेहरे से ये घूंघट हटा के जरा चेहरा ऊपर हमारी तरफ तो कर। लड़के के दादा जी अपना चश्मा ठीक करते हुए बोले थे। इस सबसे रहीमा को परेशान होता देख लड़के का बाप कह उठा आप परेशान न हों ये सब तो होता ही है मट्टी का घड़ा भी ठोक-बजा के ही खरीदा जावै है। आखिर में रिहाना उनको पसंद आ ही गई।
शाम धीरे-धीरे गहराने लगी थी। अब रहीमा कुछ चिन्तातुर लगने लगी थी उसकी मन: स्थिति ठीक नहीं थी। उसने अभी खाना भी नहीं खाया था। रिहाना ने माँ से कहा मम्मी तू रोटी खाइलै। तू खाइलै मेरौ मन नांऐं। रहीमा ने कहीं खोये हुए जबाब दिया। अब काऐ रोटी खाय चौं नाँय रई। रिहाना ने जिद की तो रहीमा जैसे झल्ला पड़ीद मैं नाँय खाय रई मौय भूंख नाँय, तू खाय लै। और उठकर कमरे से बाहर आ बैठी। दरअसल रहीमा बुन्दू को लेकर परेशान थी उसे पता था आज वह जान बूझकर सारा दिन घर नहीं आया है फिर जैसा भी है बुन्दू उसका पति है। इसलिए वह इस खुशी को पति के साथ बांटना भी चाहती है। अपने भीतर की इन सब बहसों के बाद भी वह रिहाना को इस सब का एहसास भी नहीं होने देने में पूरी तरह सफल दिख रही थी।
गलियों में रात का सन्नाटा फैलने लगा तब बुन्दू के साथ ही शराब की चिरपरिचत गन्ध ने घर में प्रवेश किया। रहीमा कुछ कहने को थी कि बुन्दू के लडख़ड़ाते शब्द फूटे कर ले तू अपने मन की... वो... वो शादी करेगा मेरी लड़की की... मैं क्या मर गया हूँ... अरे मेरी लड़की है जब चाहूँगा तब करूँगा या कभी न करूँ वो कौन होता है... समझा, मेरी लड़की को बेचना चाहता है साला?... लड़की मेरी, पैसा तू गिनेगा... ये शादी नहीं हो सकती... तू सुन ले रांणी। अन्तिम शब्दों के साथ ही उसने पत्नी को अपना फैसला सुनाया और एक कोने में जाकर पड़ गया। यह चीखना-चिल्लाना आज कुछ नया नहीं था। शराब के नशे में पत्नी या बेटी को पीटना और चिल्लाना उसके लिए आम बात थी। बहाना कोई भी हो, चाहे सब्जी में नमक कम हो या ज्यादा, पत्नी जल्दी सो गई या देर तक क्यों नहीं सोई...। ऐसा लगता है जैसे उधार लेकर जुए में हार जाने पर उधारी वालों की गाली-गलौच की पूरी खीझ वह यहाँ घर में आकर उतारता है। इससे गली के लोग परेशान भी होते हैं मगर कोई उसके मुँह नहीं लगना चाहता। बुन्दू के इस फैसले से रहीमा कुछ बुदबुदाती सी सिसकने लगी थी। रिहाना का तो सपनों का पूरा महल ही रेत की तरह बिखर गया। उसे लगा बुन्दू ने उसके शीशे के मन पर कोई पत्थर दे मारा हो और उसकी किरचें भीतर चुभकर रिसने लगी हैं। रिहाना अपने ही मन के किसी कोने में छटपटाने लगी। माँ की खाँसी की तरह उसके आँसुओं का भी कहीं अन्त नहीं हो रहा था। दिन भर की भूख ने इतना साहस भी नहीं छोड़ा था कि वह माँ को ढांढस बंधाती। वह साहस जुटा भी ले तो आखिर कहेगी क्या...? यह प्रश्न उसे भूख से कहीं ज्यादा अपाहिज किये हुये था क्योंकि भूख से लडऩे की ताकत तो उसको बचपन से ही मिल गई है। रिहाना जब पाँच साल की थी, रज्जाक को कूल्हे पर रखे घूमती रहती जब थक जाती और समझ लेती कि अब मम्मी ने रोटी पका ली होगी। वह घर आती। लेकिन जब कभी वह तरकारी और आटा फिंका हुआ देखती और बाप के हाथों माँ को पिटता देखती तब उसका मासूम मन यह तो नहीं समझ पाता था कि आखिर माँ का दोष क्या है? हाँ भूखे पेट करवटें बदलते आज ही की तरह रात काटने को मजबूर होना पड़ता था। रिहाना कमरे के बाहर पड़े छप्पर में रोज की तरह जमीन पर कुछा बिछा कर लेट गई। पास ही झूला हो चुकी चारपाई पर रहीमा आँखें मूंदे पड़ी थी। कभी-कभी उठती खाँसी उसके जगे होने का एहसास करा देती थी। कमरे के कोने से उठते बुन्दू के खर्राटों की आवाज दोनों को बैचेन कर रही थी।
रहीमा के पिता ने रहीमा की शादी बुन्दू के नाम कुछ एकड़ जमीन के टुकड़े को देखकर कर दी थी। जब कि उन्हें यह पता चल गया था कि बुन्दू काम-धाम तो कुछ नहीं करता सिवाय नेताओं की रैलियों और जुलूसों में घूमने और आवारागर्दी के। वहीं उसमें यह सब गन्दी आदतें भी पनपी हैं। फिर भी उन्होंने यह सोचकर शादी कर दी थी कि चलो नेतागिरी तो करता है तो कुछ इधर-उधर करके कमा लेगा फिर जमीन भी है... और शादी के बाद जब वजन आ जाएगा तो सुधर जाएगा। बिना दान-दहेज के अच्छा घर भी मिल गया है। किन्तु शादी के बाद ही शहर जा बसने की जिद करके अपने हिस्से की जमीन बेचकर वह शहर चला आया। जमीन का पैसा उसके बुरे कर्मों में कुछ दिन ही साथ दे पाया तब तक रहीमा के आँगन में रिहाना और रज्जाक के रूप में दो पुष्प महकने लगे थे। साथ ही उत्पन्न हुई थी बच्चों का पेट भरने और उनकी पढ़ाई-लिखाई के लिए खर्चे की समस्या रहीमा के रोज-रोज कहने और झगडऩे से तिलमिलाकर बुन्दू इन जिम्मेदारियों से और दूर भागने लगा। अब वह सुबह जो भी मिलता खाकर सुबह घर से निकलता और शाम को घर लौटता खाली हाथ लेकिन शराब पीकर। रहीमा दिन भर इन्तजार करती कि आज कुछ कमा लाएगा। शाम को बुन्दू को खाली हाथ देखती तो पड़ोसियों से कुछ माँग-मूँग कर कुछ पका लेती। रहीमा सोचती कि वह कमाता तो है तो क्या सब रुपयों की शराब पी आता है? रहीमा ने इस बात पर भी झगडऩा शुरु किया तो बुन्दू मारपीट पर उतारू हो आता मादरचोद तुझसे कुछ माँ गता हूँ? मगर रहीमा का यह भ्रम भी जल्दी ही टूट गया जब कुछ उधारी माँ गने वाले घर तक पहुँचकर रहीमा को ताकने लगे तब से बुन्दू घर में भी देर रात को आने लगा कि कोई देख न ले। अब पड़ोसियों का भी सब्र टूट गया सो उनके दरवाजे भी रहीमा के लिए बन्द हो गये। रहीमा दोनों बच्चों की भूख से दुखी होकर पहली बार मजदूरी करने गयी थी। उस दिन शाम को घर की आवरू का हवाला देते हुए बुन्दू ने रहीमा को बहुत मारा था। इतनी पिटाई के बाद भी रहीमा ने अपनी कमाई के पैसों से दोनों बच्चों का पेट भरकर असीम शान्ति का अनुभव किया था। इसके बाद तो रहीमा की जैसे दिनचर्या ही बन गई थी कि सुबह से शाम तक हाड़तोड़ मेहनत के बाद पति की गाली-गलौज सुनना या पिटना ऊपर से पति की शारीरिक भूख को भी तृप्ति देना। रहीमा ने इसे अपनी नियती मान लिया था। मासूम रिहाना इन क्रियाकलापों को देखती और समझने को अपने दिमाग पर जोर डालती जब कुछ समझ नहीं पाती तो सो जाती मगर आज रिहाना की आँखों से नीद कोसों दूर है। रिहाना की हालत एक ऐसे निर्दोष कैदी की सी हो रही है जिसे, जेल से रिहाई की खबर के बाद अचानक पुन: जेल में सडऩे का आदेश सुना दिया हो। इसी बेचैनी में उसकी नजर अपने कुनबे से होती हुई अपने बाप पर पहुँची जो नशे में बेसुध सो रहा था। न जाने क्यूँ रिहाना को उसका चेहरा किसी सांप का सा नजर आने लगा। जिसके डर से उसका कुनबा कीड़े-मकोड़ों की तरह सिकुड़ा-सिमटा पड़ा है। दीये की मध्यम रोशनी में रिहाना को अपने पिता का चेहरा और ज्यादा डरावना दिखने लगा और उसने घबराकर आँखे बन्द कर लीं। वह कुछ अच्छा सोचना चाहती थी लेकिन, उसे बचपन की वह रात बार-बार याद आ रही थी। वह आठ वर्ष की थी, और सिर्फ इतना जान पाई थी कि पूरे रोजे रखने पर ईद पर नये कपड़े मिलते हैं। इसी तमन्ना में उसने पूरे तीस रोजे रखे थे। वह ईद की चाँद रात थी, जब रिहाना ने बाप से पहली बार कुछ बोलने की हिम्मत जुटाई थी बाबू मैंने पूरे रोजे रखे हैं ईद पै नए कपड़ा पहरुंगी। ला हरामखोर पहले तुझे पोशाक पहना दूँ। बाप की इस गाली के साथ उसे इतनी मार खानी पड़ी थी कि वह रात भर माँ के आंचल में मुँह छिपाये सिसकती रही थी। वह चाह कर भी बाप की तरफ देखने का साहस तब भी कहाँ जुटा पाई थी। उसके बचपन का वह डर घृणा में बदल गया था जब उसने इसी छोटे से कमरे में मेहनतकशी से टूटी हुई माँ के साथ अपने बाबू को जबरदस्ती करते देखा था। अपने पति के सामने हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाती माँ कितनी बेबस नजर आती थी। रिहाना मूकदर्शक बनी उसे देखती रहती थी। कभी-कभी उसका मन करता था कि वह अपने बाबू को धक्का मारकर बाहर निकाल दे मगर, मन के कोने में बैठा डर उसे ऐसा करने से रोकता था। जब बड़ी होने लगी तो वह आत्म-ग्लानि से आँखे मूँद लेती थी किन्तु, पिता के हाँफने की आवाज और माँ की सुबकियाँ उसे देर तक विचलित करती रहती थीं। माँ को टी.बी. हो गई। भाई अपाहिज हुआ। इन्हीं स्मृतियों में खोये-खोये ही न जाने कब उसकी आँख लग गई।
रिहाना की शादी टूटने के बाद, दिनभर मेहनत, सुबह शाम खाना पकाना, रात को माँ की लगातार खाँसी और उनींदी आँखों के अलावा बाप की निर्लज्जता के खर्राटे सुनते न जाने कब एक वर्ष बीत गया। इस एक साल में वैसे तो कुछ नहीं बदला, लेकिन रिहाना का चेहरा, अगले दस वर्षों के बराबर तरक्की कर चुका था। रिहाना अब उन औरतों की चर्चाओं का हिस्सा बन गई थी जो रेड लाइट एरिया की तरह, दोपहर में बन ठन कर बिना किसी काम के घरों के दरवाजों पर बैठी बतियाती रहती हैं। इन चर्चाओं में वे रिहाना के चरित्र को लेकर चटखारे भरती और गरामागरम बहसें करतीं। ऐसी बे सिर पैर की बातें जब रहीमा को सुनने को मिलतीं तो रहीमा का चेहरा अपाहिजपन से खिन्न हो उठता। रिहाना की बेचारगी उसके चेहरे को ढंक लेती उसको लगता उसके हृदय को कोयी मुटठी में दबाकर निचोड़ रहा है। लड़कों को जैसे कोई काम ही नहीं रह गया था सिवाय रिहाना पर नजरें गढ़ाने के। रिहाना को यह नजरें नोंचती सी लगतीं। रहीमा को कोसों तक कोयी रास्ता नजर नहीं आता कहाँ जाऊँ...? किसके पैर पकडूँ? किससे कहूँ ...? सोचते-सोचते रहीमा एक बार फिर रिहाना के ताऊ के घर पहुँची। यह सोचकर कि उनके पैर पकड़ लूँगी तो शायद उन्हें कुछ रहम आए।
शमशुद्दीन के पैर पकड़ कर रहीमा रो पड़ी थी मैं तौ औरतूँ पराई समजौ मेरौ काऐ परि जि तौ तुमारे खानदान की इज्जतै अबके कैसैऊ करौ...! कहते-कहते वह खाँसने लगी और देर तक खाँसती रही। पत्नि के नाक-भौं सिकुड़े देखकर शमशुद्दीन खुलकर तो कुछ नहीं बोले चल-चल मैं देखुँगौ... तू जा। रहीमा इतना सुनकर संतोष से भर गई थी।
शमशुद्दीन उन दिनों अपने छोटे बेटे की नौकरी को लेकर परेशान थे। उसे उन्होंने जैसे-तैसे दे दिलाकर हाईस्कूल पास करा दिया था। कद-काठी का ठीक था इसलिए फौज की भर्ती देखने गया था। वहाँ वह शारीरिक परीक्षा में तो पास हो गया मगर लिखित परीक्षा में औकात सामने आ गयी। अब शमशुद्दीन के पास न तो पैसा था रिश्वत देने को और न ही कोयी बड़ी सिफारिश, इसलिए घर बैठा बेटा उन्हें अपनी छाती पर रखा बोझ सा लग रहा था। अब शमशुद्दीन की भाग-दौड़ इसी के लिए हो रही थी कि कहीं छोटी-मोटी कैसी भी हो, सरकारी नौकरी लग जाय।। एक दिन शाम को शमशद्दीन खुश मगर किसी उधेड़बुन में घर पहुँचे हज्जो! पत्नी को आवाज दी पत्नी पास आ गयी।
आज एक रिश्तेदार मिले।
कौन से... ? पत्नि ने बीच में ही बात काट दी
तू नहीं जानती... और मैं भी नहीं जानता था... बातों-बातों में रिश्ता निकल आया।
तौ फिर... ! हज्जो की उत्सुकता बढ़ गयी।
कह रहे थे जल निगम में जुगाड़ है नौकरी लगवा देंगे लेकिन... एक बात और कही ढंग से मेरी समझ में नहीं आयी....।
क्या... ? हज्जो की आँखें गोल-गोल फैल गयीं।
कह रहे थे लड़कियाँ कम हो रही हैं। लड़के की शादी में दिक्कत आ रही है... फिर बोले कोयी लड़की हो तो मेरे लड़के की शादी करवा दो... तुम्हारे लड़के की नौकरी तो समझो लग गयी। शमशुद्दीन सब बातें एक साँस में बोल गये।
शादी कहाँ से करवा दें...? हज्जो परेशान होकर बोली।
अपनी रिहाना से करवा देते हैं... उस पर ऐहसान भी हो जायेगा और अपना भी काम...। शमशुद्दीन की इस बात से दोनों के चेहरों पर एक साथ मुस्कान तैर गयी। शमशुद्दीन तो जैसे वहीं से सारी बातें पक्की करके ही आये थे। वे तो बस हज्जो के मन की बात जानना चाह रहे थे। दूसरे ही दिन रहीमा को भी शादी की दिन तारीख बता दी गई। यह सब इतना गुपचुप हुआ था कि बुन्दू को खबर न लग जाय। इस बार शमशुद्दीन रिहाना की शादी का टल जाना नहीं चाह रहे थे। क्योंकि शादी में ही बेटे की नौकरी छिपी थी। उन्होंने रिहाना की शादी की तैयारी अपने घर पर पूरी करवाई। शादी से दो दिन पहले रहीमा अपने कुनबे के साथ शमशुद्दीन के घर आ गयी थी। अब बुन्दू भी कुछ नहीं कर पा रहा था।
सुबह से ही परिवारीजन बारात आगमन की तैयारियों में व्यस्त थे। रहीमा, शमशुद्दीन और उनकी पत्नी हज्जो की तारीफें करते नहीं थक रही थी। उसके लिए तो शमशुद्दीन अल्लाह का भेजा फरिश्ता बन गये थे। बुन्दू उदासी का आवरण ओढ़े थके कदमों से इधर-उधर घूम रहा था। आज वह नशे में नहीं था। वह लोगों से नजरें चुराना चाह रहा था कि लोग उससे उसकी उदासी का कारण न पूछ बैठें। इसलिए अपनी उदासी को छुपाने के लाख प्रयासों के बाद भी उसकी सारी कोशिशें बेकार साबित हो रही थीं। अन्दर कमरे में बैठी तन्हा रिहाना युवा मन के पंख फैलाकर कल्पना लोक में उड़ रही थी। यहाँ उसे बाप के आतंक का कोयी डर नहीं था। वह पी मिलन से पूर्व सपनों के समुद्र में डूबक लगा रही थी अब मैंऊँ वसीमा की तरै मैंगे कपड़ा पैरकैं सजी-धजी कबऊ-कबऊ आऔ करुँगी। कोहनी तक चूड़ी और ऊँची ऐड़ी की सैंडिल मोयपेऊ होइगी। युवा मन मचल रहा था उस अजनबी से मिलने को जो अपनी बाँहों में समेट लेगा उसके सम्पूर्ण अस्तित्व को और वह बचपन से अब तक की सारी पीड़ा एक पल में भुला देगा। मैं चैन की नींद सोउँगी और जगुंगी। मैं जब रूठ जाउँगी तो वु अपनी उँगरियन तै मेरी ठोड़ी पकरिकै ऊपर उठाय कै मोय मनावैगौ। यहाँ उसने हमेशा छोटे भाई-बहनों को मनाया ही था, अगर वह कभी रूठी, तो उसे किसी ने मनाया हो उसे याद नहीं पड़ता। बचपन में बाल हठ में रूठने पर दिन भर काम में भूखी लगी रहने के बाद उसके भूखे पेट की टीस ही उसे मान जाने को मजबूर करती थी। रिहाना अचानक रूँआसी हो गयी जब उसकी नजर धौंकनी सी चलती साँसों को नियंत्रित करने का असफल प्रयास करती माँ पर पड़ी जो ढाई वर्षीय बच्ची को चुप करने की कोशिश में थी। रिहाना भी उस माँ के बड़े परिवार में से एक है। कभी-कभी वह सोचती थी कि अगर उसके भाई-बहन कम होते तो हमें यूँ भूखे पेट ठण्ड से ठिठुरकर रातें नहीं काटनी पड़तीं। और मम्मी भी इतनी जल्दी न बूढ़ी होती और न बीमारी होती। वह कर भी क्या सकती थी सोचने के अलावा... ?
बैंड-बाजों की आवाज पास आती गई और बारात आँगन में आ गयी। बारात देखने के लिए औरतें छत पर जाने लगी। रिहाना भी छत पर जा पहुँची अपने सपनों के राजकुमार को देखने। वह अवाक् रह गयी, एकदम जड़, जैसे पत्थर में तब्दील हो गई हो। उसकी नजर अपने से लगभग छह वर्ष उम्र में छोटे एक असुन्दर से लड़के पर थी जो घोड़े पर सवार उसे ब्याहने आया है। उसके चेहरे से बचपन की परत भी पूरी तरह से हठ नहीं पायी थी। बैण्ड बाजों की आवाज शान्त हो गयी। औरतें लड़कियाँ रिहाना को साथ लेकर नीचे आने लगी। रिहाना को लगा उसका एक-एक पैर सौ-सौ मन का हो गया है जो पूरी ताकत से उठ पा रहा है। उसका मन दहाड़े मारकर रोने को हो रहा था। आखिर भरे मन से ही सही निकाह हो गया। विदाई हो रही थी। रिहाना अपने अन्दर उठ रहे बबण्डर को रोक नहीं पा रही थी। आज वह जी भर रो लेना चाह रही थी। उसके धैर्य का बाँध टूट चुका था। उसकी आँखों से जैसे झरना फूट पड़ा था जिसमें उसके सारे सपने बह रहे थे। रिहाना का दुख जैसे सबकी आँखों में आँसू बनकर उतर आया था। हृदय द्रवित हो रहे थे।
रिहाना रोते हुए अपने बाबू को पुकार रही थी। वह अपने बाबू से शिकायत करना चाहती थी अपने भविष्य की जिन्दगी के साथ हुए इन्साफ की। वह बाबू को अपने आँसू पौंछने को बुला रही थी। सभी ने बुन्दू को रिहाना के पास जाने को कहा मगर वह साहस नहीं जुटा पा रहा था रिहाना को गले लगाने का। बुन्दू गली के छोर पर खड़ा भरी आँखों से कुछ बड़बड़ाता सा दूर जाती रिहाना को देखता रहा था।
अपने भाग्य पर कुदरत की एक और चोट समझकर रिहाना नये घर में खुद को खुश रखने के पूरे प्रयास में जुट गयी। वह अपनी स्मृति में बीते जीवन की एक भी छाया नहीं रहने देना चाहती थी। बहुत जल्दी ही उसने अपनी मेहनत और प्रेम से घर वालों का दिल भी जीत लिया और वह खुश रहने लगी। जैसे उसे जन्नत मिल गई किन्तु उसका यह मिथक जल्दी ही टूट गया जब एक रात उसका पति शराब के नशे में घर लौटा। रिहाना का कलेजा धक से रह गया। वह कुछ समझ पाती कि वह किसी बहसी की तरह उस पर टूट पड़ा। रिहाना के प्रतिरोध करने पर उसने एक थप्पड़ रिहाना के मुँह पर जड़ दिया और जोर जबरदस्ती के बाद ठण्डा होकर सो गया। रिहाना देर तक बैठी फफकती रही। सोते हुए पति में उसे अपने बाप की शक्ल दिखाई देने लगी। उसके बाद तो जैसे यह रोज का क्रम ही बनने लगा। वह किसी से शिकायत भी नहीं कर सकती थी पति की धमकी के कारण उसने पहले ही दिन कह दिया था किसी से शिकायत की तो बोटी-बोटी कर दूँगा। एक दिन रोटी लेकर जाते समय रिहाना ने अपनी सास को अपने पति से कहते सुना देख रहे हो कल वह टी.बी. का स्टेपलाइजर बेचकर रात को भी पीकर आया था। शराब पीकर आने की तो वह जान गई थी घर चीजें बेचकर पीता है यह सुनते ही रिहाना के पैरों तले की जमीन खिसकने लगी। उसका दिल धड़धड़ाकर बाहर आने को हुआ। पूरे दिन किसी भी काम में उसका मन नहीं लगा। शाम को रिहाना का ससुर अपने पुत्र को डाँट रहा था अगर तू अपनी हरकतों से अब भी बाज नहीं आया तो इस घर में तेरे लिए कोयी जगह नहीं है। उसने चेतावनी दी थी। रिहाना का पति प्रतिवाद कर रहा था घर में से मेरा हिस्सा मुझे दे दो चला जाऊँगा। किवाड़ की आड़ में खड़ी रिहाना यह सब एक बेबस प्रतिमा की भाँति सुन व देख रही थी। उसके हाथ-पैर जैसे निर्जीव होते जा रहे थे। उसे अपना अतीत अट्टाहास करता महसूस हो रहा था। अचानक रिहाना का चेहरा पथराने लगा जैसे उसने कोई फैसला किया हो। दूसरे दिन वह माँ की याद आने का बहाना बनाकर मायके आ गयी। रिहाना का पति रिहाना को बुलाने आया तो रिहाना ने जाने को मना कर दिया। कुछ दिनों के बाद रिहाना का ससुर कुछ अन्य लोगों के साथ, रिहाना को समझा बुझाकर वापस बुलाने आया, तब भी रिहाना ने साफ मना कर दिया। सभी ने उसे समझाया भी किन्तु उसने अपनी हठ नहीं छोड़ी। रिहाना के आँगन में यहाँ-वहाँ के लोगों की भीड़ इक_ी हो गयी थी। सौ लोग सौ-बातें वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी। सभी रिहाना से ससुराल न जाने का कारण जानना चाह रहे थे। उसे मजबूर किया तो रिहाना फफक कर रो पड़ी जो अब तक सिर झुकाये सिमटी बैठी थी। अचानक रोते-रोते जैसे चीखी थी वह बस... अब एक और रिहाना नहीं। इतना कहा उसने और रोती हुई वापस बुन्दू के कुनबे में समाहित हो गयी।
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Tuesday, August 19, 2014

इजरायल में विरोध के बीच यहूदी लड़की और मुस्लिम लड़के ने रचाई शादी


(तस्वीर: शादी के दौरान यहूदी युवती मराल मलका और मुस्लिम युवक मंसूर)

रिशोन लेझियोन (इजरायल)। प्रेम किसी भी सीमा को नहीं मानता। इसकी जीती जागती मिसाल है, यह शादी। यहूदी युवती मराल मलका (23) और मुस्लिम युवक मंसूर (26) की इस शादी का भारी विरोध भी हुआ और समर्थन भी। विरोध प्रदर्शनों की आशंका के कारण इनके वकील ने कोर्ट से प्रदर्शनों पर रोक लगाने की मांग की थी। कोर्ट ने मना कर दिया। तब तेल अवीव पुलिस ने इन्हें सुरक्षा दी। 
 
कड़ी सुरक्षा के बीच दोनों की शादी हुई। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को 200 मीटर दूर रखने की कोशिश की। कट्टर इजरायली समर्थकों में से चार को गिरफ्तार कर लिया गया। विरोध प्रदर्शनों का आयोजन लेहावा समूह ने किया। ज्यादातर प्रदर्शनकारी युवा काली शर्ट पहन कर आए थे। यहूदी मूल की मलका ने इस्लाम कबूल करने के बाद शादी की है।
 
मलका के पिता ने शादी का विरोध नहीं किया। लेकिन बेटी के धर्म बदलने और दामाद के अरब होने पर अफसोस जताया है। शादी के समर्थक कुछ अन्य इजरायलियों ने हल्के फुल्के स्तर पर जवाबी प्रदर्शन किया। फूल और गुब्बारों के साथ वे संदेश दे रहे थे, 'प्यार की सब पर जीत होती है।' यहूदी बहुल देश इजरायल में करीब 20 फीसदी आबादी अरब मुस्लिमों की हैं।

शादी और विरोध प्रदर्शन की तस्वीरें...












Monday, July 21, 2014

प्यार के लिए रूस छोड़ भारत आई ये विदेशी, देसी छोरे से रचाएंगी ब्याह


(विक्रम की दादी के साथ इवगिनिया पैट्रोवा और विक्रम।)
 
कुरुक्षेत्र। कहते हैं प्यार में प्रेमी सात समुद्र भी लांघ कर अपने मुकाम को पाते हैं, तभी तो रूस की इवगिनिया पैट्रोवा अपने प्यार को पाने यहां पहुंच गई। हरियाणा के कुरुक्षेत्र स्थित गांव बेरथली में रहने वाले छोरे विक्रम संग आठ माह पहलेफेसबुक पर हुई उसकी दोस्ती कब प्यार में बदल गई, खुद उन्हें भी पता नहीं चला। अब दोनों एक दूसरे के हमसफर बनने जा रहे हैं। पैट्रोवा को देहात के रीति-रिवाज भी भा गए हैं। लिहाजा वह हिंदू रीति-रिवाज से ही शादी करेगी। पैट्रोवा आठ जुलाई को यहां पहुंची। 
 
डाॅक्टर के सहायक को हुआ रूसी बाला से इश्क
बेरथली के 26 वर्षीय विक्रम अमृतसर में एक बाल रोग विशेषज्ञ के पास बतौर सहायक कार्य करते हैं। उनके पिता राम कुमार जगाधरी कोर्ट में वैल्फ हैं। विक्रम ने बताया कि उन्होंने 2009 में फेसबुक अकाउंट बनाया था। अमृतसर में जाने के बाद उन्हें दोस्तों की कमी महसूस होती थी। उसने पैट्रोवा काे फ्रेंडशिप रिक्वेस्ट भेजी, जिसे उसने स्वीकार कर लिया। इसके बाद चैटिंग होने लगी। इसी दौरान उन्होंने एक-दूसरे को अपना जीवन साथी बनाने का फैसला कर लिया। विक्रम ने बताया कि उनकी शादी के लिए दोनों परिवारों की रजामंदी है।  

भाई, हम तो इशारे में समझ लैंवा
विक्रम के परिजन भी विदेशी बाला को बहू के रूप में देखने को आतुर हैं। विक्रम की मां शिक्षा बताती हैं कि उनकी शादी हिंदू रीति-रिवाज से की जाएगी, लेकिन रूसी रस्मों का भी ध्यान रखेंगे। हालांकि, उन्हें पैट्रोवा की भाषा समझ नहीं आती, लेकिन उनकी बेटी सुमन अंग्रेजी भाषा समझ लेती हैं। बेटी के घर होते समय कोई दिक्कत नहीं होती।
 
पैट्रोवा का परिवार भी शादी को राजी 
पैट्रोवा बताती हैं कि अभी वह कागजी कार्रवाई पूरी करने के लिए अकेले ही भारत आई हैं। उसने फैसले से परिवार भी राजी है। शादी में उनके पिता सेरगेव पैत्रोव, माता एकेगैरिना, भाई ईलिया व बहन वसिटीसा भी भारत आएंगे। इवगिनिया के पिता का फूड प्रोडक्शन का काम करते हैं और वह चकचक व हावोरस आदि प्रोडक्ट्स बनाते हैं।  
 
संस्कृति अपनाने में लगेगा समय 
इवगिनिया पैट्रोवा बताती हैं कि उसने भारत के बारे में सुना था। यहां आई तो इस देश ने उनके दिल को छू लिया। हालांकि, रूस व भारत के कल्चर में जमीन आसमान का फर्क है। रचने-बसने में उसे थोड़ा समय लगेगा। पैट्रोवा ने स्कूल स्तर की शिक्षा हासिल की है और सेंट पीटर्सबर्ग में विज्ञापन से संबंधित कार्य करती हैं। यहां उसे आम, लीची, आड़ू, आलू बुखारा, तरबूज व केला काफी पसंद आए हैं। वह शादी को लेकर उत्सुक है। अभी कानूनी प्रक्रिया के तहत एक माह तक नोटिस लगवाया है। इसके बाद शादी की तिथि तय करेंगे। पैट्रोवा ने बताया कि शादी के बाद वह चाहती हैं कि अपने पति संग रूस में रहे। विक्रम भी इसके लिए राजी है और वीजा का प्रबंध कर रहा है। 
  
गांव वालों में है कौतूहल
रूसी बाला को गांव में देखकर लोगों में भारी कौतूहल दिखाई दिया। जहां-जहां भी विक्रम व पैट्रोवा जाते, ग्रामीण उनके पीछे-पीछे आते रहे। हालांकि, इस नजारे को देख पैट्रोवा भी खुश नजर आती है।


(गांव में रहन-सहन सीखती रूस से आई इवगिनिया पैट्रोवा।)


(विक्रम के दादा के पैर छूकर आशीर्वाद लेती इवगिनिया, साथ में विक्रम ने भी आशीर्वाद लिया।)


(रूस से आई इवगिनिया पैट्रोवा साथ में विक्रम जगाधरी।)


(गांव में हुआ दो सभ्याताओं का मेल, खेत में इवगिनिया और विक्रम।)


(इस विदेशी लड़की ने गांव में रहने के लिए सारे तौर तरीकों पर ध्यान दिया।)


(फुर्सत के पलों को साझा करते हुए दोनों प्रमी।)


(प्रेमी जोड़ा फैमिली संग ग्रुप फोटो खिंचवाते हुए।)


(इन्टरव्यू देते हुए इवगिनिया और विक्रम।)


(ग्रामीण रहन-सहन सीखते इवगिनिया, साथ में है विक्रम।)