Wednesday, November 19, 2014

बिजनेस का फॉरन कनेक्शन : इंपोर्ट-एक्सपोर्ट


एक्सपोर्ट या इंपोर्ट अच्छा बिजनस हो सकता है क्योंकि इसमें अच्छी कमाई के साथ-साथ दूसरे देशों में घूमने और उन्हें जानने का मौका भी मिलता है। अच्छे एक्सपोर्टर या इंपोर्टर बनने के लिए इस फील्ड से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जानकारी होना जरूरी है, वरना फायदे के बजाय नुकसान हो सकता है। एक्सपर्ट्स की मदद से एक्सपोर्ट-इंपोर्ट से जुड़ी अहम जानकारियां और सावधानियां दे रही हैं प्रियंका सिंह :

शुरुआत से पहले होमवर्क
- सबसे पहले तय करें कि आप किस फील्ड में बिजनस करना चाहते हैं। उसके बारे में पूरी स्टडी करें, जानकारी जमा करें। इसके लिए इंटरनेट के अलावा उस फील्ड से जुड़े लोगों से मिलें और उनसे सीखें।
- एक्सपोर्ट के लिए प्रॉडक्ट की डिमांड के बारे में जानकारी जमा करें और देखें कि कौन-से देशों में उसकी मांग ज्यादा है और वहां इसका इस्तेमाल कैसे होता है। अच्छे मार्केट तलाशें।
- सप्लाई चेन और मटीरियल फ्लो के बारे में अच्छी जानकारी लें। मैन्युफैक्चरिंग हब से लेकर लीड टाइम (प्रॉडक्ट तैयार होने में लगने वाला वक्त), शेल्फ टाइम (जितने वक्त के लिए मटीरियल स्टोर में रहेगा) के बारे में जानें।
- एक्सपोर्ट में प्रॉडक्ट का सेलेक्शन सबसे अहम है। कम कीमत से शुरू करना चाहते हैं तो ऐसा प्रॉडक्ट चुनें, जिसमें आइडिया अहम हो।
- जिस भी देश में काम शुरू करना हो, वहां की स्टडी करें। देखें कि वहां उस प्रोडक्ट का कॉम्पिटिशन कैसा है। हर बाजार के नियम-कायदे अलग हैं। उनका ध्यान रखें।
- इसके बाद पता लगाएं कि आपकी मदद के लिए कौन-सी सरकारी स्कीम या संस्थाएं हैं। मसलन, क्लस्टर एक अच्छी सरकारी स्कीम है, लेकिन लोग दूसरों को पता न लग जाए, इस डर से इसका फायदा नहीं उठाते। इसमें एक ही तरह के प्रॉडक्ट बनाने वाले लोग मिलकर सरकार को अप्रोच करते हैं और फिर सरकार उसे एक इंडस्ट्री की तरह मानकर मदद करती है। इस स्कीम में 80 फीसदी फंडिंग बिना ब्याज होती है। देखें : msmedinewdelhi.gov.in
- एक्सपोर्ट प्रमोशन कैपिटल गुड्स स्कीम, विशेष कृषि एंड ग्राम उद्योग योजना (सीकेजीयूवाई), फोकस प्रोडक्ट स्कीम (एफपीएस), मार्केट लिंक्ड फोकस प्रोडक्ट स्कीम (एमएलएफपीएस), स्पेशल बोनस बेनेफिट स्कीम, साथ ही ड्यूटी वापस लेने की स्कीम भी है। 

स्कीमों की और जानकारी के लिए आप eximguru.com, eximbankindia.com, commerce.nic.in, indiatradefair.com आदि की मदद ले सकते हैं।
ऐसे करें शुरुआत
- आप अपने बिजनस की शुरुआत घर में बैठकर एक फोन के साथ कर सकते हैं। हाई स्पीड इंटरनेट कनेक्शन के साथ एक कंप्यूटर या लैपटॉप जरूरी है। अगर बहुत बड़ा ऑर्डर मिलता है तो बैंक से सपोर्ट की जरूरत पड़ सकती है। हालांकि अडवांस पेमेंट वाले कस्मटर भी मिलते हैं।
- अट्रैक्टिव कैटलॉग बनवाएं, जिसमें आपके प्रॉडक्ट की पूरी जानकारी होनी चाहिए। इसकी हार्ड और सॉफ्ट, दोनों कॉपी हों। साथ में सारे जरूरी सर्टिफिकेट भी होने चाहिए।
- आपका बिजनस कार्ड, लेटर हेड इंटरनैशनल कॉरपोरेट इमेज वाला हो। कंपनी का लोगो तैयार कराएं और कंपनी के नाम के आगे देश का नाम जोड़कर लिखें मसलन इंडियन ट्रेडिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड और कॉन्टैक्ट नंबर में इंटरनैशनल कोड यानी +91 जोड़ें।
- इसके बाद अलग-अलग ग्रुप और फोरम से मिलें। फ्री साइट्स को भी देखें, जोकि खरीदनेवालों की अच्छी जानकारी देती हैं। इन साइटस पर पेड लिस्टिंग कराने पर आपको बेहतर रिजल्ट मिलते हैं। ऐसी साइट्स पर लिस्टिंग के लिए कंपनियां 12-15 हजार रुपये सालाना तक चार्ज करती हैं। आप बाइंग हाउस से भी कॉन्टैक्ट कर सकते हैं। ये एक्सपोर्टर को खरीदार से कनेक्ट करने में मदद करते हैं। कुछ प्रमुख साइट्स हैं : www.indiamart.com, www.alibaba.com, www.thomasnet.com, www.exportersindia.com, www.tradeindia.com
- होमवर्क पूरा करने के बाद खुद जाकर मार्केट का जायजा लें। टारगेट मार्केट, कंस्यूमर और उनकी जरूरतों को निजी तौर पर जानने के लिए वहां जाना बेहतर है। वहां आप अपने संभावित खरीदारों या सप्लायर्स के साथ मीटिंग करें और प्रॉडक्ट बेचने व खरीदनेवाले स्टोर्स में घूमें। अपने कॉम्पिटीटर की कीमतों का जायजा लें। उसी के मुताबिक कीमत तय करें। अपने एक्सपोर्ट या इम्पोर्ट मार्केट की जियोग्रफी और भाषा को भी थोड़ा जान लें तो बेहतर है।
- विदेशों में अपना प्रॉडक्ट बेचने के इच्छुक लोकल सप्लायर्स से संपर्क करें और उन्हें भरोसा दिलाएं कि आपके विदेशों में कॉन्टैक्ट हैं और आप उनके एक्सपोर्ट एजेंट हो सकते हैं। आप उनके तमाम पेपरवर्क, शिपिंग, कस्टम और फॉरेन डिस्ट्रिब्यूशन की जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं।
नोट : अपनी ताकत और कमजोरियों को पहचानें। मौके और खतरों पर भी गौर करें।
कॉन्टैक्ट्स और कागजात जरूरी
- अपने टारगेट मुल्क के कानूनों को ध्यान में रखते हुए लाइसेंस, एक्सपोर्ट परमिट आदि की जरूरत होती है। इंडस्ट्री से जुड़े लोगों के अलावा संबंधित एक्सपोर्ट अथॉरिटी इस बारे में जानकारी दे सकते हैं।
- आपको ट्रेडिंग और डिलिवरी की शर्तों, इंटरनैशनल पेमेंट के तरीकों, अंतरराष्ट्रीय व्यापार मूल्यों को समझना चाहिए और ऐसी शर्तें चुननी चाहिए, जो फायदेमंद हों। इसके बाद आप कंपनी का माल एक्सपोर्ट या इम्पोर्ट करने के लिए लीगल अग्रीमेंट करेंगे।
- अब आपके निर्माता और खरीदार दोनों के साथ कॉन्ट्रैक्ट हैं और आप काम शुरू करने के लिए तैयार हैं।
- इस बिजनेस में कॉन्टैक्ट्स बहुत अहम हैं। कॉन्टैक्ट्स पाने के लिए दूसरे देशों के कॉन्स्युलेट्स होते हैं, जिनमें कमर्शल अटैची होते हैं। इनका काम यहां अपने देशों के कमर्शल इंस्टिट्यूशंस के आउटलेट्स स्थापित करना है। ये अटैची अपने देशों के इंपोर्ट-एक्सपोर्ट एंटरप्राइज ढूंढने में मदद कर सकते हैं। ज्यादा जानकारी के लिए देखें : india. gov.in/overseas/embassies
- दूसरे देशों में मौजूद भारतीय दूतावास भी कॉन्टैक्ट्स हासिल करने और उनकी जांच का जरिया हो सकते हैं। यहां से आप किसी विदेशी कंपनी की साख और माली हालत का जायजा ले सकते हैं।
- जिन शहरों से बिजनस शुरू करना चाहते हैं, वहां के कॉन्स्युलेट्स, दूतावासों और चैंबर्स ऑफ कॉमर्स से अनुरोध करें कि वे अपने मासिक बुलेटिन में आपका नोटिस छापें। जिन कंपनियों के नाम आपको मिलें, उन्हें मेल करें।
- जब आप विदेशी कंपनियों के साथ बातचीत शुरू करें तो उनके सेल्स रिप्रजेंटेटिव्स से भी बेहतर संबंध बनाने पर ध्यान दें।
- एक्सपोर्ट क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया कई तरह की सेवाएं देती है, जैसे : गुड्स और सर्विसेज के एक्सपोर्ट में नुकसान होने पर क्रेडिट रिस्क इंश्योरेंस को मुहैया कराना। बैंकों और फाइनैंशल इंस्टिट्यूशंस को गारंटी मुहैया कराना ताकि वे एक्सपोर्टर्स को बेहतर सेवाएं दे सकें। विदेश में लोन के हिस्सेदार के तौर पर जॉइंट वेंचर बनाने वाली भारतीय कंपनियों को ओवरसीज इनवेस्टमेंट इंश्योरेंस मुहैया कराना।
यह है सबसे खास : इंपोर्टर-एक्सपोर्टर कोड का मतलब है एक्सपोर्टर या इंपोर्टर के तौर पर केंद्र सरकार से मान्यता लेने के लिए आईईसी लेना। इसे विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी), नई दिल्ली से 1,000 रुपये की ऐप्लिकेशन फीस देकर हासिल किया जा सकता है। यह फीस पेऑर्डर या डिमांड ड्राफ्ट के जरिए जमा की जानी चाहिए, जोकि जोनल जॉइंट डीजीएफटी के फेवर में बना होना चाहिए। यह फॉर्म www.dgft.gov.in पर ऑनलाइन भी भर सकते हैं। यह फॉर्म भरने के लिए पैन कार्ड होना अनिवार्य है। ध्यान रखें कि आईईसी कोड तीन तरह के होते हैं : मर्चेंट एक्सपोर्टर, मैन्युफैक्चर एक्सपोर्टर और मर्चेंट एक्सपोर्टर/मैन्युफैक्चर एक्सपोर्टर। आप ध्यान से अपना कोड चुनें क्योंकि उसी के मुताबिक आप सरकार की अलग-अलग स्कीम का फायदा उठा सकते हैं।
नोट : कुछ खास सेंसिटिव प्रॉडक्ट्स, जैसे दवाएं, शराब, केमिकल, हथियारों के अलावा कुछ खास फूड आइटम और कपड़ों के एक्सपोर्ट या इंपोर्ट में आपको लाइसेंस की जरूरत पड़ सकती है। इसके लिए डीजीएफटी से पूरी जानकारी जरूर हासिल कर लें। अलग-अलग देशों के बहुत सारे एक्सपोर्ट सर्टिफिकेट की भी जरूरत होती है जैसे कि यूएस के लिए एएसटीएम और यूरोप के लिए ईएन सर्टिफिकेट की जरूरत होती है। हमारे देश में एनएबीएल एक्रेडिट लैब्स हैं, जो ये सर्टिफिकेट मुहैया कराती हैं।
मिलना-जुलना है बहुत जरूरी
- मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स के तहत स्पेशल काउंसिल्स होती हैं, जोकि खासतौर पर एक्सपोर्ट पर ही फोकस करती हैं। ये काउंसिल अलग-अलग देशों में बायर-सेलर मीट्स कराती हैं। ये एक्सपोर्ट्स को इंटरनैशनल लेवल के ट्रेड फेयर्स में हिस्सा लेने का मौका देती हैं। ये ट्रांसलेटर्स, रहने और खाने का इंतजाम, लोकल ट्रैवल आदि का बेहद कम खर्चे पर इंतजाम कराते हैं। इसके लिए काउंसिल का मेंबर बनना जरूरी है, जिसके लिए सालाना फीस ली जाती है, जोकि काफी कम है। ज्यादा जानकारी के लिए देखें : commerce.nic.in
- इसी तरह, दूसरे देशों में लगने वाली एग्जीबिशन की भी जानकारी इंटरनेट से लें। मसलन चीन और साउथ कोरिया में लगनेवाली इलेक्ट्रॉनिक गुड्स की एग्जबीनिशन की जानकारी hktdc.com, globalsources.com से ले सकते हैं।
बैंक चुनें, सावधानी से
- आपको ऐसे बैंक का चुनाव करना है, जो आपका इंटरनैशनल कारोबार हैंडल कर सके। एक फॉरन करंसी अकाउंट खोलें। हमारे देश में यूएसडी यानी अमेरिकी डॉलर अकाउंट खोलना होता है क्योंकि अमेरिकी डॉलर दुनिया भर में चलते हैं। बैंक कैश मुहैया कराने के अलावा क्रेडिट मैनेजर का भी काम करेगा। बैंक जरूरत पड़ने पर आपके सौदों के सिलसिले में अहम सलाह और रेफरेंस भी देगा।
- बैंक से लेटर ऑफ क्रेडिट इश्यू कराएं। यह एक अहम दस्तावेज है, जो तय करता है कि जिसे आप सामान एक्सपोर्ट कर रहे हैं वह इसकी कीमत अदा कर सकेगा। ऐसा तब ही होता है जब पूरा माल बिना किसी अडवांस लिए एक्सपोर्ट किया जाता है। इसे रद्द नहीं किया जा सकता। इससे यह भी तय हो जाता है कि खरीदने वाला आपका ऑर्डर किसी भी समय कैंसल नहीं कर सकता।
- नए एक्सपोर्टस के लिए खासतौर पर क्रेडिट इंश्योरेंस एक अहम इंस्ट्रूमेंट है, जो आपको खरीदार के डिफॉल्ट या दिवालियेपन से पैदा होने वाले जोखिम से बचाता हैं। यह इंश्योरेंस तीन तरह की सेवाएं देता है : जोखिम से बचाव, कर्ज की वसूली और दावों का भुगतान।
- क्लाइंट की डिटेल्स जांचने के लिए आप डीएनबी जैसी रेटिंग एजेंसी से भी रेटिंग सर्टिफिकेट ले सकते हैं। इस रेटिंग आधार पर ही इंश्योरेंस का प्रीमियम तय होता है।
ऑर्डर को कराएं अप्रूव
- एक्सपोर्ट में मार्केट के ट्रेंड और मिजाज को समझना बहुत जरूरी है। जो पैकेजिंग एक देश में कामयाब हो, वह दूसरे देश में नाकाम हो सकती है। अगर आप कोई एक प्रॉडक्ट 3-4 मार्केट में एक्सपोर्ट कर रहे हैं, तो आपको उन सभी के ट्रेंड को अलग-अलग समझना होगा। उन मार्केट में प्रतिबंधित इंग्रेडिएंट्स और लोकल ग्रेड्स के हिसाब से अपने प्रॉडक्ट में बदलाव भी करना होगा।
- एक बार ऑर्डर फाइनल होने के बाद आपको खरीदार को प्रोफॉर्मा इनवॉयस भेजना होता है। इसमें खरीदार की पूरी डिटेल्स, डिलिवरी की डेट, गुड्स की डिटेल्स, कीमत और नियम लिखे होते हैं। यह बेहद बेसिक पर अहम डॉक्युमेंट है। आप इसमें पेमेंट के नियमों का भी चुनाव कर सकते हैं। आमतौर पर 30 एडवांस और 70 फीसदी डिलिवरी के वक्त पेमेंट का नियम सही रहता है।
- इंपोर्ट में हो सके तो पहले सैंपल मंगवाएं और बाद में बल्क ऑर्डर दें। एक्सपोर्ट में आपको टाइम पर डिलिवर करना है, इसलिए अपने खरीदार से प्रॉडक्ट को अप्रूव करा लें। अगर खरीदार बड़ा है तो उसकी एजेंसी होगी, जो आपकी फैक्टरी या प्रॉडक्शन हाउस आकर सामान देखेगी। अगर खरीदार बड़ा नहीं है तो आप ईमेल से फोटो भेज सकते हैं या कूरियर से सैंपल भेजकर अप्रूव करा सकते हैं।
- अप्रूव होने के बाद आप खरीदार के नॉमिनेटिड शिपर को कॉन्टैक्ट करें ताकि वह शिपमेंट के लिए कंटेनर मुहैया कराए। अगर खरीदार का शिपर नहीं है तो आप शिपर तलाश कर खरीदार से अप्रूवल ले लें।
ट्रांसपोर्टेशन का इंतजाम
- एक्सपोर्ट-इंपोर्ट में ट्रांसपोर्ट बहुत अहम भूमिका निभाता है। आपको एफओबी (फ्रेट ऑन बोर्ड) यानी गोदाम से लेकर माल के लोड होने तक की कीमत कोट करनी होगी क्योंकि इंडिया में बहुत सारे कस्टमर को वेट (समुद्री) पोर्ट की जरूरत होती है। कीमत कोट करते वक्त सावधानी बरतें क्योंकि आमतौर पर लोग वेट पोर्ट की कीमत नहीं लिखते। कंटेनर को लोड कराने के लिए आईसीडी (तुगलकाबाद, लोनी, दादरी) के साथ रजिस्ट्रेशन करना होगा। ध्यान रखें कि कंटेनेर आपके नाम पर बुक होता है इसलिए आपको एक सिक्युरिटी अमाउंट डिपॉजिट करना होगा और जब तक कंटेनर तय जगह पर नहीं पहुंचकर वहां से रिलीज़ नहीं होगा, जिम्मेदारी आप पर होगी। अगर सारी चीजें सही हैं तो कंटेनर खरीदार की ओर निकल जाएगा। अलग-अलग देशों के लिए सेलिंग टाइम अलग है जैसे कि यूएस के लिए 30 दिन, साउथ अफ्रीका के लिए 20-25 दिन, यूरोप के लिए 20-25 दिन लगते हैं।
- अगर प्लेन से माल भेजना है तो अलग-अलग फ्लाइट के रेट कंपेयर करें। फॉरवर्डिंग एजेंट की मदद लें। ये एजेंट सामान को भेजने में आने वाली मुश्किलों को आसान करते हैं और इसके बदले चार्ज करते हैं।
- ध्यान रखें कि यह पूरी प्लानिंग से होता है। आपको अपना शिपमेंट टाइम पर देना है, इसलिए आपको कंटेनर की बुकिंग पहले से करके रखनी होगी। शिपिंग की डेट भी फिक्स होती है, जिसे आप मिस नहीं कर सकते क्योंकि इसका पूरा एक साइकल होता है।
विवाद होने पर
- माल रिजेक्ट होने पर सबसे पहले आपको अपने खरीदार से बात करके रकम कुछ कम करके मामला हल करने की कोशिश करनी चाहिए।
- विवाद चाहें कैसा भी हो उसे हल करने के लिए हर एंबेसी में एक अलग कमर्शल रिड्रेसल विंग होता है।
- वह ऐसे मामले को सुलझाने में मदद करता है।
- विवाद से होने वाले नुकसान से बचने के लिए सामान का इंश्योरेंस कराना चाहिए। सरकार भी अलग-अलग स्कीमों के जरिए इंश्योरेंस कराती है।

क्या खासियतें जरूरी
- मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेडिंग से जुड़ी बेसिक जानकारी
- पूरे प्रॉसेस को अच्छी तरह मैनेज करने की आर्ट
- अपनी बातों और बर्ताव से दूसरों का भरोसा जीतने की क्वॉलिटी
- अपना माल बेचने का हुनर होना
- प्रॉडक्ट की क्वॉलिटी से समझौता न करना
- वक्त पर डिलिवरी सुनिश्चित कराना
क्या करें
- अपने टारगेट मुल्क के कायदों को फॉलो करें।
- डिलिवरी शेड्यूल और पेमेंट शेड्यूल को लेकर साफ अग्रीमेंट बनाएं।
- अपने प्रॉडक्ट का इंश्योरेंस कराएं।
- अपने प्रॉडक्शन और क्वॉलिटी को लेकर बढ़ चढ़ कर कमिटमेंट न करें।
- एक साथ कई के बजाय किसी एक प्रोडक्ट पर फोकस करें।
क्या न करें
1. मार्केट में घुसने से पहले उसकी अच्छी तरह जानकारी न लेना
2. अधूरे या सही कागजात न होना
3. सरकारी स्कीमों की जानकारी न होना
4. सरकारी महकमों में सही ढंग से रजिस्ट्रेशन न कराना
5. इंस्पेक्शन प्रोसेस को फॉलो न करना
6. किसी एक ही खरीदार या सप्लायर पर डिपेंड रहना


पहले 5-7 साल जमकर किया स्ट्रगल


आज से 12 साल पीछे देखती हूं तो लगता है कि पहले के मुकाबले एक्सपोर्ट अब बहुत आसान हो गया है। फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने के बाद करीब 6 साल नौकरी की और उसके बाद मैंने कुछ अपना करने की सोची। पहले साड़ी और सूट्स के लोकल मार्केट में काम किया लेकिन वहां पेमेंट का बहुत पंगा था। फिर मैंने एक्सपोर्ट में आने की सोची। मैंने इंटरनेट की मदद ली और मिडल ईस्ट के देशों के फैशन पर फोकस किया। कुल 4.5 लाख रुपये से शुरुआत की। अपने कुछ सैंपल तैयार कराए और फिर उन्हें लेकर कुवैत और दुबई गई। वहां की एग्जीबिशन में हिस्सा लिया। पहला ऑर्डर बहुत छोटा-सा था, सिर्फ 70-80 पीस का। पर लगा कि चलो शुरूआत तो हुई। उस वक्त कपड़ा लाने से लेकर डिजाइनिंग तक का काम मैं खुद करती थी। फिर धीरे-धीरे और बायर्स आने लगे। इसी तरह एक देश से दूसरे देश तक के खरीदार अप्रोच करने लगे। आज एक ठीक-ठीक टीम और कारीगरों की बड़ी संख्या मेरे साथ काम कर रही है। शुरूआत में सबसे ज्यादा दिक्कत आई डॉक्युमेंट्स पूरे करने की। मेरा शिपमेंट तैयार था और मैं डीएम के ऑफिस में बैठी थी अपना पैनकार्ड लेने के लिए। उस वक्त यह इतनी आसानी से नहीं मिलता था। इसी तरह मैंने अपना आईईसी कोड भी खुद ऑफिस में बैठकर निकलवाया। फिर पेमेंट की दिक्कत आई। मिडिएटर पैसा लेकर भाग गए तो कुछ माल लेकर गायब हो गए। शुरुआती 5-7 साल काफी स्ट्रगल किया। फिर धीरे-धीरे 10 मशीनों से शुरू किया गया काम आज ठीक लेवल पर पहुंच गया है। एक्सपोर्ट में आने के इच्छुक लोगों को मेरी सलाह है कि डॉक्युमेंट्स, अकाउंट्स और पेमेंट के नियम व शर्तों पर खास तौर पर गौर करें। 

- शालिनी बत्रा, गारमेंट एक्सपोर्टर

बिजनस के पहिए, लाइसेंस-रजिस्ट्रेशन


केस स्टडी 
दिल्ली के शाहदरा में ऑटो लाइट कंपोनेंट का शोरूम चलाने वाले विजय कुमार की दुकान जब चल निकली और अच्छे-खासे पैसे भी आ गए तो उन्हें अपनी खुद की फैक्ट्री लगाने की सूझी। उन्होंने एनसीआर के कुछ इंडस्ट्रियल इलाकों से प्लास्टिक और मेटल मोल्डिंग की सेकंड हैंड मशीनरी खरीदी और शोरूम के बेसमेंट में इंस्टॉल कर लिया। फर्स्ट और सेकंड फ्लोर पर असेंबलिंग और पैकेजिंग का काम करने लगे। अब न तो इम्पोर्ट का झंझट था और न ही प्रॉफिट मार्जिन की चिंता। उनका माल धड़ाधड़ बिकने भी लगा। लेकिन अगले महीने से ही एक-एक कर नई मुश्किलें आने लगीं। नगर निगम अधिकारियों ने लैंडयूज के गलत इस्तेमाल और बिना लाइसेंस के फैक्ट्री चलाने के आरोप में यूनिट पर सीलिंग का नोटिस चस्पा कर दिया। अभी वह निगम दफ्तर के चक्कर लगा ही रहे थे कि वैट एन्फोर्समेंट का छापा पड़ा और फिर डीपीसीसी ने उनका बोरवेल सील कर दिया। इस बीच, बीआईएस और डीएसआईआईडीसी के नोटिस भी मिलने लगे। हालांकि विजय ने कारोबार की शुरुआत के समय कई स्थानीय अधिकारियों पर खर्च भी किया था, लेकिन अब वे भी उनकी कोई बात सुनने को तैयार नहीं थे। अब विजय को समझ आ गया था कि कुछ जरूरी रजिस्ट्रेशन और औपचारिकताएं पूरी नहीं करने के चलते ही ये सारी मुश्किलें आ खड़ी हुई हैं। उन्होंने अब नए सिरे से कारोबार को कानून की पटरी पर चलाने की कोशिशें शुरू कर दी हैं।


इंडस्ट्री के जानकार कहते हैं कि किसी भी बिजनस में उतरने से पहले उनसे संबंधित जरूरी रजिस्ट्रेशन और लाइसेंसिंग को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए और मानकों पर खरा उतरने की कोशिश करनी चाहिए। इसके बाद जो भी दिक्कतें पेश आएंगी, वे अपने साथ कानूनी समाधान लेकर आएंगी।


बिजनस का ख्याल आते ही सबसे पहले ज़हन में यही सवाल उभरता है कि इसके लिए कौन-कौन से रजिस्ट्रेशन, लाइसेंस या मंजूरियां लेनी होंगी। फेहरिस्त लंबी है, जो बिजनस शुरू हो जाने के बाद बढ़ती ही चली जाती है। लेकिन कुछ बुनियादी रजिस्ट्रेशन और लाइसेंस ऐसे हैं, जिनसे पाला शुरू में ही पड़ सकता है। इनके बारे में एक्सपर्ट्स की मदद से बता रहे हैं प्रमोद राय...

मैन्युफैक्चरिंग (अगर आप खुद कोई प्रॉडक्ट बनाना चाहते हैं)

1 लैंड यूज और निगम लाइसेंस


- कोई भी फैक्ट्री सिर्फ इंडस्ट्रियल या कॉन्फर्मिंग एरिया में ही लगाई जा सकती है।

- दिल्ली में डीएसआईआईडीसी, यूपी में यूपीएसआईआईडीसी या हरियाणा में एचएसआईआईडीसी के तहत आने वाले इंडस्ट्रियल एस्टेट्स, पार्क या एरिया में फैक्ट्री के लिए मंजूरी इन्हीं अथॉरिटीज से लेनी पड़ेगी।

- बाकी जगहों के लिए नगर निगम, विकास प्राधिकरण या जिला उद्योग दफ्तर में फैक्ट्री रजिस्ट्रेशन कराना होगा।

- किसी भी यूनिट के लिए सबसे पहला लाइसेंस निगम लाइसेंस होता है। इसके लिए आवेदन मैन्युअल या ऑनलाइन भी किया जा सकता है। यहीं, आपकी एरिया कैटिगरी और प्रॉपर्टी टैक्स की दर भी तय होती है।

जरूरी दस्तावेज और फीस

- प्लॉट की ओनरशिप या लीजहोल्ड का प्रूफ

- बिल्डिंग या साइट प्लान की मंजूरी की कॉपी, जो मशीन आप लगाएंगे उनकी डिटेल्स और हॉर्स पॉवर, मैन्युफैक्चरिंग प्रॉसेस का खाका इत्यादि।

- दिल्ली में फीस 2000 रुपए, अन्य राज्यों में भी लगभग इतनी ही। यह लाइसेंस हर साल, कुछ राज्यों में तीन साल पर रिन्यू कराना पड़ता है।

2 एनवारयमेंट कंसेंट और रजिस्ट्रेशन

- फैक्ट्री शुरू करने से पहले पर्यावरण विभाग से कंसेंट लेना अनिवार्य है। तीन तरह की कैटिगरी में यह मंजूरी दी जाती है।

ग्रीन कैटिगरी - फैक्ट्री से किसी तरह का प्रदूषण नहीं होता ऑरेंज कैटिगरी, थोड़ा-बहुत प्रदूषण होता है, जिसके लिए वॉटर या एयर ट्रीटमेंट प्लांट लगाना अनिवार्य है।

रेड कैटिगरी - इसमें प्रदूषण वाले उद्योग आते हैं और इन्हें अब कोई भी राज्य मंजूरी नहीं देता।

जरूरी दस्तावेज और फीस :

- यूनिट का लेआउट प्लान

- मैन्युफैक्चरिंग प्रॉसेस

- निगम लाइसेंस की कॉपी

- साइट पजेशन का प्रूफ

- इंडस्ट्री कैटिगरी के हिसाब से यह कंसेंट 1 से 5 साल के लिए दिया जाता है। इसकी फीस अलग-अलग है।

- एयर पल्यूशन कंट्रोल ऐक्ट के तहत 5 लाख से 1 करोड़ तक के पूंजी निवेश वाली फैक्ट्री के लिए फीस 250 रुपए से 2000 रुपए तक। वॉटर ऐक्ट के तहत पानी की किलोलीटर खपत के हिसाब से फीस 6500 रुपए तक है।

3 लेबर डिपार्टमेंट का फैक्ट्री लाइसेंस

- इसे चीफ इंसपेक्टर ऑफ फैक्ट्रीज (सीआईएफ) का लाइसेंस भी कहा जाता है।

- यह सबसे अहम रजिस्ट्रेशन और लाइसेंस प्रॉसेस है, जहां आपको फैक्ट्री का पूरा प्रोफाइल दिखाना पड़ता है।

- लेबर डिपार्टमेंट के इंस्पेक्टर समय-समय पर फैक्ट्री की जांच करते हैं। इसके तहत आपको कई तरह के रजिस्टर मेनटेन करने होते हैं और वर्कर से जुड़ी दर्जनों फॉर्मैलिटीज पूरी करनी होती हैं।


जरूरी दस्तावेज और फीसः 

- नगर निगम लाइसेंस और एनवायरमेंटल कंसेंट की कॉपी

- साइट या लेआउट प्लान की कॉपी

- फायर डिपार्टमेंट का एनओसी

- मैन्युफैक्चरिंग प्रॉसेस का फ्लो चार्ट

- कर्मचारियों की संख्या और प्रोफाइल (मेल-फीमेल, स्किल्ड, सेमी या अनस्किल्ड), वेतन आदि।

- दस्तावेज की संख्या और फीस हर राज्य में अलग-अलग। इसे स्टेट लेबर डिपार्टमेंट की साइट पर देखा जा सकता है।


4. एम्प्लॉयमेंट स्टेट इंश्योरेंस (ईएसआई)

- अगर आपकी फैक्ट्री में 10 से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं तो आपको एम्प्लॉयी स्टेट इंश्योरेंस कवर लेना पड़ेगा।

- इसके तहत सिर्फ वही कमर्चारी आएंगे, जिनकी मंथली सैलरी 15,000 रुपए से कम है।

- दुकान, होटल, रेस्तरां, मॉल, प्राइवेट मेडिकल या एजुकेशनल संस्थानों के लिए 20 से ज्यादा कर्मचारियों पर यह कवर लेना होगा।

- इसका मकसद कर्मचारियों को मुफ्त मेडिकल सुविधाएं देना है।


दस्तावेज और फीस:

- रजिस्ट्रेशन की औपचारिकता और फीस मामूली हैं, कंट्रिब्यूशन और रिटर्न नियमित रूप से भरना होगा।

- स्कीम के लाभ के लिए एम्प्लॉयर को हर महीने कर्मचारी की सैलरी के 6.5 फीसदी के बराबर रकम ईएसआई फंड में जमा करानी होती है।

- कमर्चारी की सैलरी से 1.75 फीसदी रकम काटी जाती है, जबकि एम्प्लॉयर 4.75 फीसदी अपनी तरफ से देता है।


5. एम्प्लॉयीज प्रॉविडेंट फंड (ईपीएफ) रजिस्ट्रेशन

- 20 से ज्यादा कर्मचारियों वाले एम्प्लॉयर को प्रॉविडेंट फंड में रजिस्ट्रेशन लेना अनिवार्य है।

- हालांकि इससे कम कर्मचारी संख्या वाले एम्प्लॉयी चाहें तो स्वैच्छिक रूप से रजिस्ट्रेशन ले सकते हैं।

- इसका मकसद कर्मचारी के लिए भविष्य निधि इकट्ठा करना है, जिसका लाभ वह रिटायरमेंट या एमर्जेंसी जरूरत पर उठा सके।


कॉन्ट्रिब्यूशन रेट :

- ईपीएफ में हर महीने कर्मचारी की बेसिक सैलरी का 12 फीसदी जमा होता है और इतनी ही रकम एम्प्लॉयर अपनी तरफ से देता है।

- 20 से कम कर्मचारी वाली यूनिटों (वॉलंटरी रजिस्ट्रेशन), बीमार इकाइयों के लिए कॉन्ट्रिब्यूशन रेट 10 प्रतिशत है।

- एम्लॉयर की ओर से जमा होने वाली रकम का एक हिस्सा पेंशन फंड में जाता है।


6 एमएसएमई रजिस्ट्रेशन

- अगर आपने प्लांट और मशीनरी में 25 लाख रुपए तक निवेश किया है तो आप माइक्रो इंडस्ट्रीज के तहत आएंगे। 25 लाख से 5 करोड़ तक निवेश किया है तो स्मॉल और 5 से 10 करोड़ के बीच लागत आई है तो मीडियम एंटरप्राइजेस कहलाएंगे।

- एमएसएमई ऐक्ट 2006 के तहत इन इकाइयों को राज्य के डिपार्टमेंट ऑफ इंडस्ट्रीज में एमएसएमई रजिस्ट्रेशन कराकर सर्टिफिकेट लेना जरूरी है।

- यह सर्टिफिकेट इतना अहम है कि इसके बगैर आप लघु उद्योगों को मिलने वाले ज्यादातर सरकारी लाभ से वंचित रह जाएंगे।

- नैशनल स्मॉल स्केल इंडस्ट्रीज और वित्तीय संस्थानों की स्कीमों से जुड़ने के लिए भी आपको एमएसएमई रजिस्ट्रेशन कराना होगा।


7. वैट रजिस्ट्रेशन

- जब आप कोई सामान बनाएंगे तो जाहिर है, उसे बेचेंगे भी।

- अगर आपकी सेल्स 20 लाख (दिल्ली में) या 10 लाख (दूसरे राज्यों में) सालाना से ज्यादा है तो संबंधित राज्य में वैट रजिस्ट्रेशन कराना होगा।

- वैट विभाग किसी राज्य में सेल्स टैक्स डिपार्टमेंट तो किसी में कमर्शिल टैक्स डिपार्टमेंट के नाम से जाना जाता है।

- अगर आप टैक्स फ्री चीज बनाते हैं तो आपको वैट रजिस्ट्रेशन की जरूरत नहीं, लेकिन अगर आपका माल राज्य से बाहर जाता है तो आपको 1 रुपए की सेल्स पर भी वैट रजिस्ट्रेशन कराना होगा, चाहे आपका टर्नओवर कितना भी हो।

- ऐसे में आपको वैट विभाग में ही केंद्रीय बिक्री कर (सीएसटी) के तहत भी रजिस्ट्रेशन लेना होगा।


जरूरी दस्तावेज और फीस :

- पैन की कॉपी

- आवेदक का आईडी प्रूफ

- ओनरशिप का प्रूफ

- पार्टनरशिप डीड (अगर फर्म पार्टनरशिप में है)

- कंपनी, सोसाइटी या ट्रस्ट होने पर संबंधित विभागों का रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट।

- 500 रुपए फीस वाले ऐप्लिकेशन फॉर्म के साथ 1 लाख रुपए का श्योरिटी बॉन्ड भी भरना होगा। लेकिन सिक्यॉरिटी की रकम कुछ खास दस्तावेजों की कॉपी जमा करने पर 50,000 रुपए तक कम हो सकती है।


8. एक्साइज ड्यूटी रजिस्ट्रेशन

- अगर आपकी फैक्ट्री का टर्नओवर 1.5 करोड़ रुपए सालाना से कम है तो आप एक्साइज ड्यूटी से मुक्त हैं।

- लेकिन इससे ज्यादा टर्नओवर पर कमिश्नर एक्साइज और सेंट्रल एक्साइज डिपार्टमेंट के जोनल ऑफिस में रजिस्ट्रेशन कराकर ड्यूटी चुकानी होगी और रिटर्न भरना होगा।


9. पैकेज्ड कमोडिटी और वेट्स एंड मेजर्स

- अगर आप कोई पैक होने वाली कमोडिटी बनाते हैं, जिसके वजन से ग्राहक का सरोकार है तो आपको पैकेज्ड कमोटिडी ऐक्ट के तहत राज्य के कन्जयूमर अफेयर्स डिपार्टमेंट के कुछ मानकों का पालन करना होगा। अगर आप माप-तोल से जुड़ी चीजें बनाते हैं तो वेट्स एंड मेजर्स ऐक्ट के तह रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है

10. बीआईएस रजिस्ट्रेशन

-अगर आपके उत्पाद सेफ्टी, सिक्यॉरिटी, प्रेशस वैल्यू या मानकों पर खरे उतरने की अनिवार्यता वाली कैटिगरी में आते हैं तो आपको ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड (बीआईएस) में भी रजिस्ट्रेशन कराना होगा और जरूरी लाइसेंस लेने होंगे।


11. फूड सेफ्टी रजिस्ट्रेशन और लाइसेंस

-अगर आप खाद्य चीजों का उत्पादन करते हैं तो 12 लाख रुपए सालाना से ज्यादा टर्नओवर पर फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसआईए) से लाइसेंस लेना अनिवार्य है। इससे कम टर्नओवर पर सिर्फ रजिस्ट्रेशन कराना होगा। इनकी फीस प्रॉडक्ट कैटिगरी, टर्नओवर और सेफ्टी मेजर्स के हिसाब से अलग-अलग है। अथॉरिटी की साइट पर देख सकते हैं।


सर्विस सेक्टर

अगर आप चीजों के उत्पादन की बजाय सेवाएं देने के बिजनस में हैं। मसलन, आईटी, बीपीओ, कॉल सेंटर, टूर एंड ट्रैवल, होटल, बार, ब्यूटी पार्लर, कैटरिंग, ट्रांसपोर्ट, कूरियर, लॉजिस्टिक्स, टेलिकॉम से जुड़ी सेवाएं और आपका टर्नओवर 10 लाख से ज्यादा है तो आपको सर्विस टैक्स डिपार्टमेंट में रजिस्ट्रेशन कराना होगा।

अलग-अलग सर्विसेज के लिए आपको कई दूसरे विभागों के रजिस्ट्रेशन और लाइसेंस भी लेने पड़ सकते हैं।

- होटेलियर्स को लग्जरी टैक्स डिपार्टमेंट में रजिस्ट्रेशन कराकर 1000 रुपए प्रति दिन से ज्यादा चार्ज वाले कमरों पर 10 पर्सेंट लग्जरी टैक्स देना पड़ता है।

- पब, बार या होटल जहां शराब परोसी जाती है, वहां एक्साइज (आबकारी) विभाग में रजिस्ट्रेशन तो कराना ही पड़ता है, कई अलग-अलग लाइसेंसेज लेने पड़ते हैं।

- स्पा, ब्यूटी पार्लर या जिम कारोबार के लिए 5 लाख से ज्यादा टर्नओवर पर लग्जरी टैक्स में रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है और इसके लिए 3 प्रतिशत टैक्स चुकाना होता है।

- आईटी और टेलिकॉम सेवाओं के लिए कम्यूनिकेशन मिनिस्ट्री के तहत हाल के दिनों में बने कई नए नॉर्म्स पर भी खऱा उतरना होगा।

- ट्रांसपोर्ट, कूरियर और लॉजिस्टिक्स फर्मों को ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट के अलावा वैट डिपार्टमेंट में भी रजिस्ट्रेशन कराना पड़ सकता है।


शॉप, ट्रेड या कॉमर्स

1 ट्रेड लाइसेंस

- किसी भी तरह की शॉप या व्यावसायिक गतिविधि के लिए आपको स्थानीय निकाय (नगर निगम) से ट्रेड लाइसेंस लेने की जरूरत होगी।

- दिल्ली सहित कई राज्य इसके लिए ऑनलाइन ऐप्लिकेशन भी मंगाने लगे हैं और रिन्युअल एक साल की बजाय तीन साल पर होने लगा है।

- दिल्ली में एमसीडी पहले कमोडिटी या आइटम के हिसाब से ट्रेड लाइसेंस फीस लेती थी, लेकिन अब कुछ अपवादों को छोड़कर दुकान की साइज को आधार बनाया गया है।

- मसलन 10 वर्गमीटर की दुकान के लिए 200 रु. 10 से 20 वर्गमीटर 500 रुपए और इससे बड़े प्रतिष्ठान पर प्रति वर्गमीटर 50 रुपए ज्यादा शुल्क लगता है। हर राज्य में फीस स्ट्रक्चर अलग-अलग है।

2 वैट रजिस्ट्रेशन

- इसके लिए जरूरत या प्रक्रिया वही है, जो मैन्युफैक्चरिंग में बताई जा चुकी है। मूलतः वैट कमर्शियल या ट्रेडिंग ऐक्टिविटीज पर ही लागू होता है और अगर आप शॉप या कमर्शल गतिविधियों में शामिल हैं तो इस विभाग से ही आपका सरोकार सबसे ज्यादा होगा।

- वैट रजिस्ट्रेशन से छूट की सीमा दिल्ली में 20 लाख और दूसर राज्यों में 10 का टर्नओवर है। रजिस्ट्रेशन के बाद बिक्री पर हर कमोडिटी के लिए तय अलग अलग रेट के मुताबिक टैक्स देना होगा। वैट फ्री कमोडिटी के ट्रेड पर रजिस्ट्रेशन जरूरी नहीं है। लेकिन इंटरस्टेट ट्रेड पर हर हाल में रजिस्ट्रेशन कराना होगा और रिटर्न भरना होगा।

3. फूड सेफ्टी रजिस्ट्रेशन और लाइसेंस

- अगर आप खाद्य सामग्री बेचते हैं या इसके स्टोरेज, डिस्ट्रिब्यूशन या इम्पोर्ट से जुड़े हैं तो आपको फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड ऐक्ट 2006 और रेग्युलेशन 2011 के तहत रजिस्ट्रेशन और लाइसेंस लेने हैं। शर्तें और जरूरत मैन्युफैक्चरिंग सेग्मेंट की तरह ही हैं।

4. आईईसी रजिस्ट्रेशन

- अगर आप इम्पोर्ट या एक्सपोर्ट के बिजनस में हैं तो आपको 10 अंकों का आईईसी कोड लेना अनिवार्य है।

- यह कोड वाणिज्य मंत्रालय के डायरेक्टरेट ऑफ जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड (डीजीएफटी) की ओर से जारी होता है।

- आप अपनी फर्म या खुद के नाम से इसके लिए अप्लाई कर सकते हैं।

5 शॉप्स ऐंड इस्टैब्लिशमेंट रजिस्ट्रेशन

- लेबर डिपार्टमेंट के तहत होने वाले इस रजिस्ट्रेशन के तहत आपको दुकान खोलने बंद करने के समय से लेकर लेबर संबंधी नॉर्म्स का पालन करना पड़ता है।

- इसके लिए फीस मामूली है और जरूरी दस्तावेज लगभग वही हैं जो एक ट्रेड लाइसेंस के लिए चाहिए होते हैं।


किस कंपनी का कैसा रजिस्ट्रेशन

प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के लिए रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज (आरओसी) में रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य है।

मिनिस्ट्री ऑफ कॉरपोरेट अफेयर्स के तहत आने वाले आरओसी में रजिस्ट्रेशन के लिए ओनरशिप पैटर्न के आधार पर नॉर्म्स और जरूरी दस्तावेज देने पड़ते हैं।

अलग-अलग जरूरतों और ओनरशिप के लिए आईएनसी-1 से लेकर आईएनसी-22 तक उपलब्ध फॉर्म्स में से कोई एक या ज्यादा दाखिल करना पड़ता है। ये रजिस्ट्रेशन अब ऑनलाइन भी होने लगे हैं।

कंपनी के लिए आपको तीन नाम प्रस्तावित करने होते हैं, पहले से उस नाम से रजिस्टर्ड कंपनी का नाम आपको नहीं मिल सकता। इसके अलावा एम्स ऐंड ऑब्जेक्टिव और कुछ अन्य जानकारियां देनी होती हैं।

1 लाख रुपए से कम नॉमिनल शेयर कैपिटल वाली कंपनी के रजिस्ट्रेशन की फीस 4000 रुपए है। इससे बड़ी कंपनी के लिए कुछ पैमानों के आधार पर फीस में मामूली बढ़ोतरी होती जाती है।

सोल प्रॉपराइटरशिप फैक्ट्री या कंपनी के लिए आरओसी रजिस्ट्रेशन अनिवार्य नहीं है। आप महज अपने लेटर हेड के आधार पर बैंकिंग या अन्य वित्तीय संस्थाओं में खुद को दर्ज करा सकते हैं।

पार्टनरशिप फर्म का कंपनी रजिस्ट्रेशन अनिवार्य नहीं है, लेकिन बिना रजिस्ट्रेशन के कोई पार्टनर अपने राइट्स क्लेम नहीं कर सकता। पार्टनरशिप डीड होती है, जिसकी जरूरत आपको हर कदम पर पड़ेगी। राज्य के उद्योग विभाग में इसे जमा कर स्थानीय रजिस्ट्रेशन लेना पड़ता है। वैट से लेकर दूसरे डिपार्टमेंट में भी पार्टनरशिप फर्मों के लिए नॉर्म्स अलग हैं और उसके मुताबिक खुद को रजिस्टर कराना पड़ता है।

रजिस्टर्ड हैं तो बंद रास्ते भी खुलेंगे

अगर आपने अपने कारोबार के लिए जरूरी सभी रजिस्ट्रेशन और लाइसेंस ले लिए हैं, लेकिन आपकी राह में विभागीय अड़ंगे लग रहे हैं या आपको लगता है कि कोई नोटिस या चालान जबरन थोपा गया है तो उसी विभाग में ऐसे सेल हैं, जहां आप अपील या ऑब्जेशन दायर कर सकते हैं। नगम निगम, विकास प्राधिकरण, पर्यावरण विभाग के अपने-अपने अपीलेट या न्यायाधिकरण हैं, जहां कोई भी पक्ष किसी भी फैसले के खिलाफ अपील कर सकता है। वैट या सेल्स टैक्स में तो आप कमिश्नर तक के फैसले को उसी की ऑब्जेक्शन हियरिंग अथॉरिटी में चुनौती दे सकते हैं। उससे असंतुष्ट हैं तो अपीलेट या फिर बाहर कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं। दिल्ली सेल्स टैक्स बार असोसिएशन के पूर्व सेक्रेट्री संजय शर्मा कहते हैं कि अगर आप तय नॉर्म्स का अनुपालन करते हैं तो आपके कारोबार में कोई बाधा नहीं आएगी और आएगी तो आप उसका डटकर मुकाबला करने की स्थिति में होंगे। हर स्टेज पर कानूनी सुनवाई, निपटारे और यहां तक की बेवजह हुई परेशानी के लिए मुआवजे की व्यवस्था भी है।

नियम कुछ बदलने वाले हैं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्रमेव जयते के नारे के साथ श्रम सुधारों का ऐलान किया है, इससे लेबर डिपार्टमेंट से जुड़े कई रजिस्ट्रेशन, लाइसेंस और प्रक्रियाओं में बदलाव आ सकता है। इसी तरह देश में जीएसटी और डीटीसी के रूप में नई कर प्रणालियां आने वाली हैं, तब एक्साइज, वैट, सर्विस टैक्स के एकीकरण के बाद कारोबारियों के लिए रजिस्ट्रेशन और लाइसेंसिंग की व्यवस्था में भी काफी बदलाव होंगे। ऐसे में आपको इन सुधारों के लागू होने पर कड़ी नजर रखनी होगी और उनके अनुसार ही अपनी योजनाएं बनानी होंगी।

साइबर वर्ल्ड हो फ्री... फ्री... फ्री...



हाल ही में दुनिया भर में फ्री कंटेंट डाउनलोड करवाने वाली साइट पाइरेट बे (Pirate Bay) के को-फाउंडर हांस फ्रेडरिक लेनार्ट नेज को थाईलैंड बॉर्डर पर गिरफ्तार कर लिया गया। वह उन लोगों में से एक हैं, जो इंटरनेट पर मौजूद हर चीज को फ्री उपलब्ध करने की मुहिम का हिस्सा हैं। नई तरह की इस साइबर क्रांति के बारे में बता रहे हैं अमित मिश्रा :

इंटरनेट पर सब कुछ सबका

गूगल और विकीपीडिया जैसे टूल्स के आने के बाद इंटरनेट के बिना जिंदगी की कल्पना करना ही मुमकिन नहीं है। कभी सोच कर देखिए कि अगर ये दोनों ही साइट्स अपनी सर्विस और कंटेंट के लिए पैसे वसूलने लगें तो क्या हाल हो? इस संभावना से ही नई साइबर क्रांति का जन्म होता है। दुनिया के चंद कंप्यूटर इंजीनियरों का मानना है कि इंटरनेट चूंकि सहूलियतों के दरवाजे खोलने का जरिया बन चुका है इसलिए इस पर मौजूद हर चीज फ्री होनी चाहिए। ऐसा कुछ भी रोकने के लिए दुनिया भर के कानूनों का सहारा लिया जा रहा है। लोगों को गिरफ्तार भी किया जा रहा है लेकिन यह मुहिम साल-दर-साल जंगल की आग की तरह फैलती जा रही है। इस क्रांति का हिस्सा बनने वालों में भी दो तरह के लोग हैं - एक वे, जो नियम-कायदों में रह कर इस तरह की छूट देने की मांग कर रहे हैं और दूसरे वे, जो हर हाल में ऐसा कर गुजरने पर आमादा हैं।

टॉरेंट की टक्कर

दुनिया भर में इंटरनेट पर सबकुछ फ्री पाने के जिस ठिकाने पर लोग सबसे ज्यादा जाते हैं, उसका नाम है 'टॉरेंट' (torrent)। इंटरनेट के अजब-गजब क्रांतिकारियों का यह एक ऐसा कारनामा है, जिसे बंद करवाने के लिए दुनियाभर की सरकारें लामबंद हो चुकी हैं लेकिन यह फिर भी बदस्तूर जारी है। यह इंटरनेट का एक ऐसा करिश्मा है, जिसे किसने बनाया यह किसी को पता नहीं। इसे कौन चला रहा है, यह भी किसी को पता नहीं। पता है तो बस इतना कि इस साइट को खुद को सबसे तेजी से अपडेट करना आता है। मूवी हो, सॉफ्टवेयर हो या कोई पॉपुलर किताब, यहां सबकुछ फ्री है।

कैसे काम करता है टॉरेंट का जादू

असल में टॉरेंट एक ऐसा प्लैटफॉर्म है, जहां पर फ्री में कंटेट उपलब्ध कराने वाले और उसे इस्तेमाल करने वाले एक जगह पर आ जाते हैं। टॉरेंट पर फ्री कंटेंट उपलब्ध कराने वाले गुमनाम क्रांतिकारियों ने इंटरनेट पर एक ऐसा जाल बुना है, जो दुनिया के किसी भी कंप्यूटर को होस्ट में तब्दील करके मनचाही जगह पर फाइल को डाउनलोड करने लायक बना देता है। मिसाल के तौर पर अगर आपको कोई हॉलिवुड की फिल्म डाउनलोड करनी है तो टॉरेंट आपको ऐसे किसी कंप्यूटर से कनेक्ट करा देगा, जिस पर यह फिल्म मौजूद होगी और वहां से सीधे ही यह फाइल डाउनलोड हो जाएगी। इतना ही नहीं, इस पूरे साइबर आदान-प्रदान में उस कंप्यूटर की लोकेशन को खास कोडिंग के जरिए छुपा दिया जाता है, जिसमें फिल्म मौजूद है। अगर जांच होती भी है तो वही पकड़ा जा सकता है, जो फिल्म डाउनलोड कर रहा है।

पाइरेट बे के लुटेरे

2003 में स्वीडन के तीन कंप्यूटर एक्सपर्ट्स पीटर सुंडे, गॉटफ्राइड स्वॉथहोम और फ्रैडरिक नेज ने मिल कर ऐसे फाइल शेयरिंग प्लैटफॉर्म को खड़ा किया, जिसने इंटरनेट की दुनिया को बदल कर रख दिया। 'द पाइरेट बे' जिसे साइबर दुनिया के दीवाने टीपीबी के नाम से भी जानते हैं, देखते-देखते फ्री फाइल शेयरिंग के सबसे बड़े प्लैटफॉर्म की तरह उभरा। दुनिया भर में कॉपीराइट और कंटेंट को बेंच कर ज्यादा-से-ज्यादा पैसा कमाने वालों की नींद उड़ गई। पाइरेट बे पर केस दायर किया गया और 2009 में तीनों फाउंडर्स को 1 साल की सजा के साथ हर्जाने के तौर पर 3.6 मिलियन डॉलर (करीब 22 करोड़ रु.) की रकम भरने के लिए कहा गया। रकम भरने से उन्होंने साफ इनकार कर दिया और जेल जाने के लिए तैयार हो गए। इस बीच फेडरिक नेज स्वीडन से भाग निकले और बाकी दोनों को कॉपीराइट से लेकर हैकिंग तक के केस लगाकर जेल भेज दिया गया। वह अब भी अपनी कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन साइबर आजादी की लड़ाई से उन्होंने फिलहाल तौबा नहीं किया है।

लॉरेंस लेसिग : साइबर गांधी

जिस तरह से दुनिया भर में अहिंसक तरीके से अन्याय के खिलाफ लड़ाई का चेहरा महात्मा गांधी हैं, कुछ वैसा ही चेहरा साइबर दुनिया को फ्री करने की मुहिम में प्रफेसर लॉरेंस लेसिग का है। प्रफेसर लेसिग वार्टन स्कूल अमेरिका से मैनेजमेंट, यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज इंग्लैंड से फिलॉसफी में मास्टर्स और येल लॉ स्कूल से रिसर्च करने के बाद क्रिएटिव कॉमन्स मूवमेंट का चेहरा बने। 53 साल के प्रफेसर फिलहाल हॉवर्स यूनिवर्सिटी लॉ के प्रफेसर हैं। वह बदलती दुनिया में कॉपीराइट, ट्रेडमार्क और रेडियो फ्रीक्वेंसी स्पेक्ट्रम के कानूनों को फिर से गढ़ने की वकालत करते हैं। उनका मानना है कि इंटरनेट के युग में इनमें भारी फेरबदल करने की जरूरत है, जिससे इंटरनेट पर मौजूद ज्ञान का खजाना दुनिया में हर इंसान तक पहुंच सके।

क्रिएटिव कॉमन्स

2001 में प्रपेसर लेसिग ने क्रिएटिव कॉमन्स नाम के एक ऐसे प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया, जो कॉपीराइट के कानून के उलट 'कॉपीलेफ्ट' मूवमेंट की बात करता था। इस प्रोजेक्ट से कई होनहार कंप्यूटर एक्सपर्ट्स भी जुड़े और सबने इंटरनेट पर सबके लिए सबकुछ की लड़ाई को आगे बढ़ाया। उनका तरीका किसी कॉपीराइट कानून को तोड़ने का नहीं, बल्कि ऐसे लोगों को एक प्लैटफॉर्म पर लाना था, जो किसी भी तरह के कॉपीराइट या परमिशन लेने की व्यवस्था में विश्वास नहीं रखते थे। लेसिग इसे इंटरनेट पर मौजूद ज्ञान के बड़े खजाने को ऐसे लोगों से आजाद कराने के मूवमेंट का हिस्सा मानते हैं, जो पैसों की दम पर इंटरनेट पर कंटेंट को कंट्रोल कर रहे हैं। क्रिएटिव कॉमन्स साइट पर जाकर कोई भी खुद की रचना को अपलोड कर सकता है और उसे इस्तेमाल करने के लिए फ्री कर सकता है। इस्तेमाल करने वाले को बस कंट्रीब्यूट करने वाले को क्रेडिट भर देना होता है।

ऐरॉन श्वार्ट्ज : एक सपने की मौत

दुनिया का कोई भी मूवमेंट बिना युवा ताकत के चला पाना मुश्किल है। ऐसे ही एक जोशीले और टैलेंटेड युवा का नाम है ऐरॉन श्वार्ट्ज। बचपन से ही इंटरनेट की दुनिया को जुनून की हद तक चाहने वाले ऐरॉन भले ही कंप्यूटर साइंस की कोई बड़ी डिग्री नहीं ले पाए लेकिन प्रोग्रामिंग का टैलंट जैसे उनके खून में ही था। 10 साल की उम्र से ही उन्होंने प्रोग्रामिंग फील्ड के बड़े अवॉर्ड्स जीतने शुरू कर दिए थे। जवानी की दहलीज तक पहुंचते-पहुंचते उनकी मुलाकात प्रफेसर लेसिग से हो गई। वह भी इंटरनेट पर मौजूद कंटेंट को सबके लिए फ्री करने की मुहिम का हिस्सा बने। इस दौरान उन्होंने अमेरिकन फेडरल कोर्ट की साइट को हैक करके लाखों डॉक्यूमेंट्स को फ्री में डाउनलोड करने के लिए उपलब्ध करा दिया। गौरतलब है कि इसके लिए पहले सरकार पैसे लेती थी। उनके ऊपर कोई चार्ज तो नहीं लगाया गया लेकिन वह एजेंसियों के राडार पर आ चुके थे।

विकीलीक्स में उनकी भूमिका को लेकर उन्हें 6 जनवरी 2011 में गिरफ्तार किया गया। कोर्ट में सुरक्षा एजेंसियों ने उन पर ऐसे कानूनों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया, जिसके लिए ऐरॉन को 50 साल तक की कैद और 1 मिलियन डॉलर तक हर्जाना भरना पड़ सकता था। तकरीबन 2 साल तक केस लड़ने के बाद 11 जनवरी 2013 को ऐरॉन ने हॉस्टल के अपने कमरे में खुदकुशी कर ली। ऐरॉन की याद में बनाई गई वेबसाइट पर लिखा है, ' ऐरॉन ने अपनी प्रोग्रामिंग और टेक्नॉलॉजिस्ट की विलक्षण प्रतिभा को खुद का इस्तेमाल खुद को आगे बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि इंटरनेट और दुनिया को एक बेहतर और न्यायपूर्ण जगह बनाने के लिए किया।'

भारत और कंटेंट की आजादी

एक तरफ दुनिया इंटरनेट पर आजादी की लड़ाई लड़ रही है, वहीं भारत में फिलहाल इस तरह की मुहिम पर ज्यादा बात नहीं हो रही है। इसकी एक वजह तो इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट और कॉपीराइट जैसे मुश्किल कानूनों का लोगों की समझ से बाहर होना है और दूसरा साइबर कानूनों को सख्ती से लागू न करवा पाने की लाचारी है। साइबर एक्सपर्ट पवन दुग्गल का कहना है कि बड़े ग्रुप तो कॉपीराइट आदि की लड़ाई लड़ सकते हैं लेकिन आम आदमी के लिए यह मुश्किल है। जहां तक बात कंटेंट को फ्री करने की है तो दुनिया भर में यह लड़ाई जोरों से जारी है लेकिन इसके खिलाफ खड़ी मजबूत बिजनस लॉबी के चलते जल्दी आजादी के आसार कम ही नजर आते हैं।

इन्होंने जला रखी है आजादी की अलख

Free Software Foundation : 1985 में रिचर्ड स्टॉलमैन ने इस फाउंडेशन का गठन फ्री सॉफ्टवेयर को जरूरतमंदों तक पहुंचाने के लिए किया था। यहां पर इंडिपेंडेंट सॉफ्टवेयर डिवेलपर ऐसे जरूरतमंदों को अपने सॉफ्टवेयर उपलब्ध करा सकते हैं, जो इसे खरीद नहीं सकते। यह पूरी तरह से नॉन प्रॉफिटेबल फाउंडेशन है।

Software Freedom Law Center : 2004 में बने इस सेंटर को ईबेन मॉग्लेन ने इस सपने के साथ बनाया कि जब भी दुनिया के लिए फ्री में सॉफ्टवेयर बनाने वालों को लीगल मदद की जरूरत पड़े तो लोग उनके साथ खड़े हों। यह संस्था दुनिया भर के इस्तेमाल के लिए फ्री में सॉफ्टवेयर बनाने वालों को फ्री में कानूनी सलाह और मदद देती है।

Electronic Frontier Foundation (EFF) : 1090 में जॉन गिलमोर, जॉन पेरी बारलो और मिच कापर को खुद पर चल रहे एक केस के दौरान अहसास हुआ कि दुनिया को अब इंटरनेट सिविल लिबर्टी की भी जरूरत है। मतलब साफ था कि सरकार भी इस बात को समझ पाने में असमर्थ थी कि कब कानूनों का उल्लंघन हुआ है और कब यह गलती से हुआ है। ऐसे में EFF ने कई साइबर क्रांतिकारियों का केस लड़ा। मशहूर राइटर डैन ब्राउन की टेक्नो थ्रिलर नॉवल 'डिजिटल फोर्टेस' में भी इस फाउंडेशन का जिक्र आता है।