Wednesday, March 20, 2013

गौरैया की कहानी


बचपन की सबसे सुखद स्मृतियों में गौरैया जरूर आती है, क्योंकि सबसे पहले बच्चा इसी चिड़िया को पहचानना सीखता था। पड़ोस के लगभग हर घर में इनका घोंसला होता था। आंगन में या छत की मुंडेर पर वे दाना चुगती थीं। बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर ये झुंड के झुंड फुदकती रहती थीं। प्राचीन काल से ही हमारे उल्लास, स्वतंत्रता, परंपरा और संस्कृति की संवाहक वही गौरैया अब संकट में है। संख्या में लगातार गिरावट से उसके विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। इसको बचाने के लिए दिल्ली सरकार ने पिछले साल इसे राजकीय पक्षी घोषित किया है :

सहचरी:

-घरों में धार्मिक कार्यक्रम और समारोहों में दीवारों पर चित्रकारी करने में फूल-पत्ती, पेड़ के साथ गौरैया चिड़िया के चित्र उकेरे जाते हैं।

-कई आदिवासियों की लोक कथाओं में गौरैया चिड़िया का वर्णन मिलता है। महाराष्ट्र की वर्ली व उड़ीसा की सौरा आदिवासी (रामायण और महाभारत में इसका उल्लेख सावरा के नाम से मिलता है) की लोक कलाओं में गौरैया चिड़िया के चित्र बनाने की परंपरा मिलती है।

-उत्तर भारत की संस्कृति में यह चिड़िया इस तरह रची बसी है कि प्रसिद्ध लेखिका महादेवी वर्मा ने कहानी गौरैया में कामना की है कि हमारे शहरी जीवन को समृद्ध करने के लिए गौरैया चिड़िया फिर लौटेगी।

Sparrow Chick


संकट:

-बगीचों से लेकर खेतों तक हर जगह इनकी संख्या में गिरावट को देखते हुए इनको पक्षियों की संकटग्रस्त प्रजाति की रेड सूची में शामिल किया गया है।

-आधुनिक घरों का निर्माण इस तरह किया जा रहा है कि उनमें पुराने घरों की तरह छज्जों, टाइलों और कोनों के लिए जगह ही नहीं है। जबकि यही स्थान गौरैयों के घोंसलों के लिए सबसे उपयुक्त होते हैं।

-शहरीकरण के नए दौर में घरों में बगीचों के लिए स्थान नहीं है।

-पेट्रोल के दहन से निकलने वाला मेथिल नाइट्रेट छोटे कीटों के लिए विनाशकारी होता है, जबकि यही कीट चूजों के खाद्य पदार्थ होते हैं।

-मोबाइल फोन टावरों से निकलने वाली तरंगों में इतनी क्षमता होती है, जो इनके अंडों को नष्ट कर सकती है।

चिड़िया एक, नाम अनेक :

-अलग-अलग बोलियों, भाषाओं, क्षेत्रों में गौरैया को विभिन्न नामों से जाना जाता है।

-वैज्ञानिक नाम-पेसर डोमिस्टिकस।

उर्दू: चिरया

सिंधी: झिरकी

पंजाब: चिरी

जम्मू और कश्मीर: चेर

पश्चिम बंगाल: चराई पाखी

उड़ीसा: घराछतिया

गुजरात: चकली

महाराष्ट्र: चिमनी

तेलुगु: पिछुका

कन्नड़: गुबाच्ची

तमिलनाडु और केरल: कुरूवी

बचाव के उपाय:

-घर की छत या टेरेस पर अनाज के दानों को डालें।

-यदि घर में स्थान है, तो बागवानी करें।

-साफ जल रखें।

-घोंसले के स्थान पर पात्र में कुछ खाद्य पदार्थ रखें।

-स्वस्थ पर्यावरण में रहें, जिससे चिड़िया भी रह सकें।

-घर में कीटनाशक का छिड़काव न करें।


Tuesday, March 19, 2013

अब राजधानी में होगा पान की प्रजातियों का संरक्षण


पान किसानों के लिए अच्छी खबर है। राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआइ) न केवल पान किसानों को प्रशिक्षण देगा बल्कि पान की लुप्त हो रहीं प्रजातियों का संरक्षण भी करेगा। यही नहीं वह पान की नई प्रजातियों के लिए शोध भी करने की तैयारी कर रहा है। ताकि पान का स्वाद भी बना रहे और पान का पत्ता शीघ्र खराब भी न हो और देश-विदेश भेजने पर किसी पान में कोई कमी न निकले। महोबा में एनबीआरआइ का पान शोध केंद्र था। मगर राज्य सरकार से फंड न मिलने से बंद पड़े इस केंद्र को शुरू करने के लिए पान किसानों ने कई बार धरना-प्रदर्शन भी किया, लेकिन शुरू नहीं हो सका। अन्य फसलों की भांति पान किसानों को भी आपदा क्षतिपूर्ति देने के लिए कई बार किसानों की ओर से केंद्र व राज्य सरकार को पत्र भी लिखा गया। पान किसानों ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पीएल पुनिया सहित उद्यान विभाग के अधिकारियों से पान किसानों की समस्याएं दूर करने और पान की प्रजातियों को बचाने की मांग की थी। पान किसान यूनियन के महासचिव छोटेलाल चौरसिया का कहना है कि इसकी शुरुआत होने से प्रदेश भर के पान किसानों को फायदा होगा। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष डॉ.पीएल पुनिया 28 मार्च को शुरुआत करेंगे। राजधानी सहित महोबा, इलाहाबाद, जौनपुर, प्रतापगढ़, आजमगढ़, सुल्तानपुर, गाजीपुर, बलिया, हरदोई, कानपुर, सीतापुर, सोनभद्र, मिर्जापुर, अमेठी, वाराणसी, रायबरेली, उन्नाव, बांदा व बाराबंकी जिलों में पान की खेती होती है। देश में 30 हजार हेक्टेयर और प्रदेश में वर्तमान में 450 हेक्टेयर क्षेत्र में पान की खेती होती है। प्रदेश में दो लाख किसान खेती से जुड़े हैं जबकि 30 लाख लोग पान के व्यवसाय से जुड़े हैं। पान के निर्यात से हर वर्ष देश को 1.55 लाख अमेरिकी डॉलर की प्राप्ति होती है।



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