Tuesday, May 7, 2013

बरसता पानी हैं शनि के छल्ले


अंतरिक्ष में बरसात की परिकल्पना अब तक किसी ने नहीं की थी। लेकिन शनि ग्रह के लिए ये बहुत ही स्वाभाविक प्रक्त्रिया है। दरअसल अब ये साबित हो चुका है कि शनि ग्रह अपने लिए बरसात भी खुद ही बनाता है। और उसके छल्लों से ये बारिश ग्रह के ऊपर होती है। शनि के वलय से होने वाली ये बारिश खुद शनि ग्रह के वातावरण को भी खासा प्रभावित करती है।
 एक ताजा शोध के अनुसार आवेशित जल कणों की बरसात शनि ग्रह के वातावरण पर उसके छल्ले से होती है। इतना ही नहीं ये बरसात शनि ग्रह के अधिकाश हिस्से में होती है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की तस्वीरों के आधार पर इंग्लैंड की लेस्सेस्टर यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने इस विषय पर किए अध्ययन में पाया कि शनि ग्रह के ऊपरी हिस्से के वातावरण को ये बारिश खासा प्रभावित करती है। इससे वातावरण की सामग्री से लेकर ग्रह के तापमान तक पर असर पड़ता है।
 प्रमुख शोधकर्ता जेम्स ओ डोनाघ के अनुसार शनि अब तक का पहला ऐसा ग्रह है जहा वातावरण और वलय प्रणाली में सीधे कोई संबंध है। और उनके बीच किसी अहम प्रक्त्रिया का सक्त्रिय रूप से आदान-प्रदान होता है। इस बारिश का सबसे बड़ा प्रभाव यही है कि आयन से भरे शनि ग्रह को शात किया जाता है। दूसरे शब्दों में ये बारिश जिधर भी होती है शनि ग्रह के आवेशित इलेक्ट्रानों के घनत्व में खासी कमी आ जाती है।




भूकंप को एक दिन पहले भाप लेती हैं चीटिया


अभी तक भूकंप की भविष्यवाणी करना असंभव है लेकिन नन्हीं सी चींटी को इसका आभास हो जाता है और वह भी भूकंप आने के एक दिन पहले।
 शोधकर्ताओं की मानें तो चीटियों को एक दिन पहले ही भूकंप आने का अहसास हो जाता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि रेडवुड चीटिया भूकंप के दौरान पड़ी दरारों में अपनी बस्तिया बसाती हैं। अध्ययन में उन्होंने देखा कि भूकंप आने से एक दिन पहले चीटियों के व्यवहार में काफी बदलाव आ जाता है और भूकंप के एक दिन बाद वे पहले की तरह सामान्य हो जाती हैं।
 लाइव साइंस की रिपोर्ट के मुताबिक चीटियों की इस विशेषता को जानने के लिए जर्मनी स्थित यूनिवर्सिटी डिसबर्ग एसेन के गैब्रियल बरबेरिक ने चीटियों के 15 हजार से भी ज्यादा टीलों का अध्ययन किया। बरबेरिक और उनके सहयोगियों ने करीब तीन साल तक वीडियो कैमरे की मदद से चीटियों पर नजर बनाए रखी और एक विशेष सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल से उनकी गतिविधियों का अध्ययन किया गया।
 शोधकर्ताओं का कहना है भूकंप की तीव्रता दो से अधिक होने पर ही चीटिया अपना व्यवहार बदलती हैं। बरबेरिक कहते हैं कि भूकंप आने से एक दिन पहले चीटिया रातभर अपने टीले के बाहर जागती रहती हैं जबकि आम दिनों में वह दिनभर काम करने के बाद रात को सो जाती हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि चीटियों को उस दौरान जमीन से उठने वाली गैसों और हलचलों से भूकंप का अंदाजा हो जाता है। इस अध्ययन को विएना में वार्षिक कार्यक्त्रम यूरोपियन जियोसाइंसेज यूनियन में भी पेश किया जा चुका है।






अंटार्कटिक में दस गुना तेजी से पिघल रही बर्फ


अंटार्कटिक में अब से 600 साल पहले के मुकाबले अब गर्मियों के मौसम में दस गुना अधिक रफ्तार से बर्फ पिघल रही है। बीसवीं सदी की मध्य से अंटार्कटिक ने अपने बर्फ का बड़ा हिस्सा खोना शुरू कर दिया है। एक ताजा अध्ययन में चेताया गया है कि अब गर्मियों के मौसम में बर्फ पिघलने की प्रक्त्रिया इतनी अधिक और घातक हो गई है कि वह अंटार्कटिक की बर्फ की परत और ग्लेशियरों के अस्तित्व को ही प्रभावित करने लगी है। हर एक हजार साल में अंटार्कटिक प्रायद्वीप के मौसम के पुनर्निर्माण पर पत्रिका नेचर जीयोसाइंस के अनुसार गर्मियों में दस परतों तक की बर्फ पिघलने लगी है।
 वर्ष 2008 में ब्रिटेन-फ्रेंच साइंस टीम ने जेम्स रास द्वीप के मुख्य स्थान पर 364 मीटर की गहराई तक बर्फ काट करके ये जानने की कोशिश की थी कि अंटार्कटिक प्रायद्वीप के उलरी क्षेत्र में बर्फ की हालत और तापमान कैसा है। उन्होंने पाया कि आइस कोर में की गई खुदाई से बर्फ के भविष्य का सटीक अनुमान लगाया जा सकता है। आइस कोर पर दिखने वाली परतें बताती हैं कि कितनी गर्मियों में बर्फ पिघलने के बाद सर्दियों में वापस जम गई। इन पिघली हुई परतों की मोटाई नापकर बर्फ के पिघलने की रफ्तार का खाका तैयार हो जाता है। इसी आधार पर वैज्ञानिकों ने पिछले एक हजार साल की परतों की नाप और तबके तापमान का तुलनात्मक अध्ययन किया है। इसी हिसाब से भविष्य के हालात का भी अनुमान निकाला गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर हालात ऐसे ही रहे तो खामियाजा पूरी धरती को भुगतना होगा।






किचन वेस्ट से बनेगी बिजली


रसोई में बचे खाने एवं सब्जियों-फलों के छिलकों से अब बायोगैस एवं बिजली बन सकेगी। पंजाब सरकार और नई दिल्ली की द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (टेरी) के बीच तीन माह पूर्व मेमोरंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) साइन होने के बाद पंजाब एग्रीकल्चरल यूनीवर्सिटी (पीएयू) अपने कैंपस में बने हॉस्टल में पहली यूनिट लगाने की तैयारी कर रही हैं।
 इसकी पूरी योजना तैयार हो चुकी है तथा यूनीवर्सिटी प्रबंधक इसको लगाने पर खर्च होने वाले 36 लाख के फंड का इंतजार कर रहे हैं। उन्होंने पंजाब सरकार के साथ लुधियाना के सासद मनीष तिवारी को पत्र भेजकर एमपीलैड्स फंड से यह रुपया मागा है।
 सेमी गवर्नमेंट एजेंसी टेरी की टीम ने कुछ दिन पहले यूनीवर्सिटी का दौरा किया था। यहा पर वेस्ट टू एनर्जी गैसीफायर प्रोजेक्ट के संदर्भ में उन्होंने यूनीवर्सिटी के अधिकारियों से बातचीत की। इसमें पता चला कि पीएयू के हॉस्टल से रोजाना एक टन किचन की वेस्टेज निकलती है। अगर उपरोक्त प्लाट लगता है तो इसके जरिए यूनीवर्सिटी खाना पकाने के लिए बायोगैस का उत्पादन कर सकती है। अगर किचन वेस्ट ज्यादा हुई तो फिर बिजली भी पैदा की जा सकती है। पीएयू की योजना है कि अगर प्रोजेक्ट का यह ट्रायल सफल रहा तो फिर वह घरों से निकलने वाले किचन वेस्ट को जमाकर प्लाट के जरिए गैस और बिजली पैदा करने पर विचार करेंगे। लगभग 35 लाख रुपये के इस प्रोजेक्ट में पीएयू प्लाट के लिए जगह व दूसरे सपोर्ट देगी, जबकि बाकी का काम टेरी करेगी। प्लाट लगने के बाद इसका स्वामित्व पीएयू के पास हो जाएगा।
 ट्रायल सफल होने के बाद पीएयू शहरों, गावों व कस्बों में लोगों को इसी तरह के छोटे-छोटे यूनिट लगाने के लिए प्रेरित करेगी। सूत्रों के मुताबिक, बाजार में कई कंपनिया इस तरह का प्लाट बनाती हैं, जिसकी कीमत महज 35 हजार तक है। टेरी के सहयोग से लगने वाले प्लाट के ट्रायल सफल होने के बाद पीएयू छोटे यूनिटों का भी ट्रायल करेगी तथा फिर उनके संदर्भ में आगे सिफारिश करेगी।
 पीएयू के स्कूल आफ एनर्जी स्टडीज के डायरेक्टर डॉ. सर्बजीत सूद ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि पूरी योजना तैयार हो चुकी है तथा फंड मिलते ही इस पर काम शुरू कर दिया जाएगा। इस प्लाट के साथ पीएयू कई दूसरी छोटी यूनिटों का भी परीक्षण कर रही है, जो आसानी से घरों में किचन वेस्ट के जरिए बायोगैस बनाने के इस्तेमाल में आ सकेंगी।





भूखा तो नहीं है आपका छोटू


बच्चों की यह मूल प्रवृलि होती है कि जब उन्हें भूख लगती है, तब वे प्राय: रोने लगते हैं। यही नहीं मांएं भी उन्हें तभी दूध पिलाती या कुछ खिलाती हैं, जब बच्चे रोना शुरू कर देते हैं। आपके लिए कुछ टिप्स जिनके जरिए आप अपने नन्हें-मुन्ने की भूख के बारे में जान सकती हैं।
 -आमतौर पर यही धारणा है कि शिशु अगर भूखा नहीं है तो वह आराम से खेलता रहेगा। अगर शिशु आराम से खेल रहा है तो समझ लें कि उसे भूख नहीं लगी है। यह धारणा पुरानी है, कई शोधों और अध्ययनों से यह बात साबित हुई है कि खेलते समय ही बच्चे को खाने की सामग्री दे देना बेहतर रहता है। इससे वह आराम से खा लेगा।
 - बच्चे के लिए खाने या पीने को कुछ देते समय थोड़ी मात्रा में ही सामग्री लें। अगर वह इसे खा-पी लेता है तो तुरंत ही उसे और सामग्री न देकर थोड़ी देर बाद ही दें।
 - यदि घर-परिवार में कई बच्चे हैं तो कोशिश करें कि उन्हें आपस में नजदीक लाकर ही खिलाएं-पिलाएं। आपका शिशु अन्य बच्चों को देखकर खाने-पीने के लिए अपने आप प्रेरित होगा।
 - मौसम बदल रहा है, बदलते मौसम में बच्चे को लिक्विड की अधिक मात्रा की जरूरत पड़ती है। उसे दूध के साथ ही घर में निकाला हुआ जूस, सूप आदि दें। अगर बच्चा छह माह से अधिक का है तो उसे दाल का पानी, पतला दलिया आदि दे सकती हैं।
 - अगर बच्चा खाने-पीने में आनाकानी कर रहा है तो उसके सामने ऐसा प्रदर्शित करें जैसे कि उसके खाने की चीजें आप भी खा रही हैं। इससे बच्चा खाने-पीने के लिए अधिक प्रेरित होगा।
 - याद रखें कभी भी खाना बच्चे के मुंह में जबरदस्ती न ठूंसें।
 - बच्चे को हमेशा पौष्टिक चीजें ही खाने के लिए दें। उसे बाजार की वस्तुओं से दूर रखें।
 - तमाम प्रयासों के बावजूद यदि आपका नन्हा-मुन्ना कुछ खाता-पीता नहीं है तो उसे किसी अच्छे चिकित्सक को ही दिखाएं। हो सकता है बच्चे को अंदरूनी कोई समस्या हो।