Sunday, May 12, 2013

फूड, फैट और फिटनेस



बच्चों को कोई खा- पदार्थ खाने से मना नहीं करना चाहिए। इसके बजाय उन्हें यह समझा सकती है कि अमुक वस्तु तुम्हारी सेहत के लिए अच्छी रहेगी और अमुक नहीं..
 बाल्यावस्था के दिन बेफिक्री के होते है। मौजमस्ती और नटखटपन इस अवस्था के प्रमुख गुण होते है। इस अवस्था में शरीर का विकास भी होता है। इसलिए बाल्यावस्था में खानपान पर समुचित ध्यान देना जरूरी है। इससे बच्चों का सही तरह से शारीरिक व मानसिक विकास हो सकता है। खानपान के अलावा उन्हे व्यायाम की भी जरूरत होती है। यह अभिभावकों का फर्ज है कि वे अपने बच्चों में अच्छी सेहत के प्रति सजगता की आदत बचपन से ही डालें।
 परीक्षण करे 
 आपका बच्चा (6-12 साल) शारारिक-मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ है या नहीं, इस बात का परीक्षण करने के लिए इस चेकलिस्ट पर गौर फरमाएं
 - क्या आपका बच्चा सुस्त रहता है
 - क्या वह तुनुक-मिजाज है
 - रोजमर्रा में उसे भूलने की आदत है
 - पढऩे-लिखने में मन कम लगता है
 - वह बेचैन रहता है
 - उसका शैक्षिक प्रदर्शन अच्छा नहीं है
 यदि आपके बच्चे में उपर्युक्त लक्षणों में से दो से अधिक लक्षण है तो यह समझें कि उसे पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व प्राप्त नहीं हो रहे है।
 सामान्य समस्याएं 
 बाल्यावस्था में मोटापा, वजन कम होना, एनीमिया और दांतों संबंधी समस्याएं पैदा होती है। कुछ बच्चों में अपनी उम्र के बच्चों या अन्य लोगों के साथ घुलने-मिलने में दिक्कत होती है।
 मोटापा 
 देश में बाल्यावस्था में होने वाले मोटापे की समस्याएं बढ़त पर हैं। आप बच्चे में खानपान से संबंधित अच्छी आदतें डालकर उन्हे मोटापे से ग्रस्त होने से बचा सकती है। जैसे उन्हे शुगर युक्त खाद्य पदार्थो से दूर रखना और आहार में पर्याप्त मात्रा में फाइबर बढ़ाना। एक अभिभावक होने के नाते आपको बच्चे को यह बताना चाहिए कि उसे मिठाइयों व उन पेयों से दूर रहना चाहिए, जिनमें शुगर ज्यादा रहती है। बच्चे को फल व कच्ची सब्जियां खाने के लिए प्रेरित करना चाहिए। यदि पहले से ही आपका बच्चा मोटा है तो उसे खेलों व अन्य शारीरिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
 वजन कम होना 
 कुछ बच्चों का वजन लंबाई के अनुपात में काफी कम होता है। कुछ बच्चों की आदत कम खाने की होती है। उनकी यह प्रवृलि अभिभावकों के लिए परेशानी का कारण बन जाती है। ऐसे बच्चों के बारे में अभिभावकों को यह बात मालूम करनी चाहिए कि उन्हे कौन से खाद्य पदार्थ पसंद है। संभव है कि पसंदीदा वस्तु न होने के कारण वे कम खाते हों। उन्हे प्यार से फुसलाकर विविधतापूर्ण हेल्दी भोजन दें। अगर बच्चे का वजन कम है तो इसका मतलब यह नहीं कि आप उसे शुगरयुक्त खाद्य पदार्थो व पेयों को पीने की अनुमति प्रदान करे। कारण, हेल्दी आहार ग्रहण करने की बात मोटे और पतले दोनों पर ही लागू होती है।
 दांतों की समस्या 
 दांतों में कीड़ा लगना एक आम समस्या है। इस समस्या से बचने के लिए बच्चों में यह आदत डालें कि वे रात में भी सोने से पहले टूथब्रश करें। साथ ही उन्हे शुगरयुक्त खाद्य पदार्थो को कम से कम खाने की सलाह दें।
 एनीमिया 
 शरीर में आयरन की कमी से रक्त में हीमोग्लोबिन का स्तर काफी कम हो जाता है। एनीमिया से ग्रस्त बच्चे थोड़ा सा काम करने पर थकान महसूस करने लगते है। उनके शरीर में चुस्ती-फुर्ती नहीं रहती। इसके चलते बच्चों की मानसिक क्षमता भी कम होने लगती है। एनीमिया की कमी दूर करने के लिए बच्चों को हरी पलेदार सब्जियां दें। इसके अलावा ड्राई फ्रूट्स भी दें। इनमें आयरन पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है।
 नाश्ता बहुत जरूरी है 
 सुबह का नाश्ता करने के लिए बच्चों को प्रोत्साहित करे। ज्यादातर बच्चे स्कूल जाने से पहले अच्छी तरह नाश्ता नहीं करते। बच्चों को संतुलित-पौष्टिक नाश्ता करवाकर ही स्कूल भेजें। बच्चे को दिन में तीन मुख्य आहार और दो से तीन बार स्नैक्स जरूर देने चाहिए।
 स्नैक्स 
 इसका सबसे अच्छा विकल्प फल है। साथ ही उन्हें ड्राई फ्रूट्स और दही भी दे सकती है।
 स्कूल में 
 ज्यादातर स्कूल की कैंटीन में खानपान की हेल्दी वस्तुएं उपलब्ध नहीं होतीं। समोसा, बर्गर आदि वस्तुएं ही उपलब्ध होती है। ये वस्तुएं कभी-कभी खाई जाएं तो अच्छा है। बेहतर रहेगा कि बच्चे को टिफिन देकर ही स्कूल भेजें।
 हेल्दी हैबिट्स 
 - खाना खाते समय बच्चे को टीवी न देखने दें। इससे खाने की ओर से उनका ध्यान बंटता है। उन्हे समझाएं कि खाना खाते समय पूरा ध्यान खाने पर ही लगाएं।
 - हेल्दी फूड ग्रहण करने की आदत बच्चा घर से ही सीखता है। इस संदर्भ में अभिभावकों को हेल्दी फूड ग्रहण कर बच्चों के समक्ष खुद को रोल मॉडल के तौर पर पेश करना चाहिए।
 - खानपान के संदर्भ में बच्चे के समक्ष कई विकल्प पेश करने चाहिए। मसलन यदि बच्चा केला नहीं खाना चाहता तो उसे सेब दें। पपीता नहीं खाना चाहता तो गाजर दें।

ओट्स से पाएं सेहत और सौंदर्य


गर्मियों के लिए ओट्स (जई) एक बेहतरीन सीरियल है। इसकी तासीर ठंडी होती है। यह त्वचा की जलन को दूर करता है और असमय झुर्रियों से बचाता है। तो क्यों न इसे अपने जीवन में शामिल करें। डाइटीशियन ईशी खोसला व सौंदर्य विशेषज्ञा डॉली कपूर बता रही हैं इसके अन्य गुणों के बारे में..
 ओट्स में इनोजिटॉल पाया जाता है, जो ब्लड कोलेस्ट्रॉल लेवल को बरकरार रखने का एक बेहतरीन स्रोत है। ओटमील और ओट के चोकर में पर्याप्त डाइटरी फाइबर होता है। इसमें पाया जाने वाला सॉल्युबल फाइबर डाइजेस्टिव ट्रैक्ट को दुरुस्त रखने में मदद करता है। दरअसल, गर्मियों में अक्सर लोगों को तमाम तरह पेट की समस्याएं मसलन एसिडिटी, जलन और डाइजेशन की प्रॉब्लम होती है। बावल मूवमेंट्स को नियमित करने के लिए फाइबर की जरूरत होती है।
 सेहत के लिए जरूरी 
 - आपने सुना होगा कि दिन अच्छी शुरुआत करने के लिए ब्रेकफास्ट बहुत जरूरी होता है। यह जान लें कि दिन की शुरुआत के लिए एक बाउल ओटमील से अच्छा कोई मील नहीं है।
 - ओट्स में पर्याप्त फाइबर होने के कारण इसे अपने आहार में शामिल करना अच्छा होता है। इसमें सॉल्युबल और अनसॉल्युबल दोनों प्रकार के फाइबर होते हैं। अनसॉल्युबल पानी में नहीं घुल पाता। यह स्पॉन्जी होता है, जो कब्ज को दूर करने में मदद करता है। साथ ही पेट खराब होने से भी बचा पाता है।
 - इसमें कैल्शियम, पोटैशियम, विटामिन बी-काम्प्लेक्स और मैग्नीशियम होता है, जो नर्वस सिस्टम के लिए बहुत जरूरी होता है। गर्मी के कारण चक्कर, दिल घबराने जैसी आम समस्याओं में यह बहुत लाभदायक होता है।
 - पके हुए ओट्स शरीर से अतिरिक्त फैट कम करते हैं, वहीं अनरिफाइन्ड ओटमील स्ट्रेस को कम करता है।
 - हाई फाइबर होने के कारण यह बावल कैंसर से बचाता है। साथ ही हृदय रोग के खतरों से दूर रखता है।
 - अगर आप डाइबिटीज और ब्लड शुगर की समस्या से ग्रस्त हैं तो ओट्स का सेवन करें, क्योंकि यह शरीर में ब्लड शुगर और इंसुलिन को नियंत्रित रखता है।
 - एक शोध से यह पता चला है कि 2-18 साल के बीच के बच्चे, जो नियमित रूप से ओटमील लेते हैं, उनमें ओबेसिटी होने का खतरा बहुत कम होता है। शोध से यह भी पता चला है कि जिन बच्चों की डाइट में ओटमील शामिल होता है उनमें 50 प्रतिशत कम वजन बढऩे की संभावना होती है।
 सौंदर्य बढ़ाए 
 - ओटमील फेसपैक त्वचा को कोमल और कांतिमय बनाता है। यह एक बेहतरीन ब्यूटी एन्हेंसर है। यह त्वचा को चमकदार बनाता है।
 - अत्यधिक रूखी त्वचा और एग्जीमा को दूर करने के लिए ओटमील बाथ लेना अच्छा उपाय है। यह त्वचा की जलन को दूर करता है। इसके लिए 500 ग्राम ओट्स की भूसी को एक लीटर पानी में 20 मिनट तक उबालें। फिर छानकर ठंडा करें और उस पानी से नहाएं।
 - खोई हुई रंगत और कोमलता पाने के लिए ओट्स स्क्रब लगाएं। इसके लिए दो टेबलस्पून ओटमील, दो टीस्पून ब्राउन शुगर, दो टेबलस्पून एवोकैडो और पांच-छह बूंद रोज एसेंशियल ऑयल मिलाकर पेस्ट बनाएं और गीली त्वचा पर इससे हल्का मसाज करें। गुनगुने पानी से चेहरा साफ कर लें। पूरे शरीर पर लगाने के लिए इसकी मात्रा बढ़ा सकते हैं।
 ओट्स ऐंड हनी मिल्क बाथ 
 आधा टी-कप ओटमील, एक चौथाई टी-कप आमंड मिल्क , पांच-छह बूंद लैवेंडर ऑयल को एक छोटे फैब्रिक बैग में भरकर बाथटब में डालें, फिर नहाएं।





Wednesday, May 8, 2013

हल्के में न लें सिरदर्द को


आए दिन लोग सिरदर्द की समस्या से ग्रस्त होते हैं। सिरदर्द की ये शिकायतें कुछ साधारण होती हैं तो कुछ असाधारण बीमारी का सकेत देती हैं। इसलिए महत्वपूर्ण बात यह है कि साधारण सिरदर्द को बीमारी में तब्दील होने से पहले ही उसका इलाज करा लिया जाए ताकि हम सेहत पर होने वाले किसी भी हमले से बचे रहें। खास बात तो यह है कि यह साधारण सिरदर्द ब्रेन ट्यूमर जैसी खतरनाक बीमारी भी हो सकती है। गौरतलब है कि ब्रेन ट्यूमर का उपचार आज रेडियो सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडिएशन थेरेपी के अलावा कंप्यूटर आधारित स्टीरियोटैक्सी व रोबोटिक सर्जरी जैसी नवीनतम तकनीकों की बदौलत अत्यत कारगर, सुरक्षित और काफी हद तक कष्टरहित हो गया है। ब्रेन ट्यूमर की पहचान जितनी पहले हो जाए, इसका इलाज उतना ही आसान हो जाता है।
 ब्रेन सर्जरी में आजकल सबसे ज्यादा इंडोस्कोपिक सर्जरी का इस्तेमाल किया जाता है।
 लक्षण 
 ब्रेन ट्यूमर के लक्षण सीधे उस भाग से सबधित होते हैं, जहा दिमाग के अंदर ट्यूमर होता है। उदाहरण के तौर पर मस्तिष्क के पीछे ट्यूमर के स्थित होने के कारण दृष्टि सबधी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। मस्तिष्क के बाहरी भाग में होने वाले ट्यूमर के कारण बोलते समय रुकावट आने जैसी समस्या पैदा हो सकती है। ट्यूमर का आकार बढऩे के परिणास्वरूप मस्तिष्क पर बहुत दबाव पड़ता है। इस कारण सिरदर्द, उल्टी आना, जी मिचलाना, दृष्टि सबधी समस्याएं या चलने में समस्या आदि लक्षण प्रकट हो सकते हैं।
 ट्यूमर के प्रकार 
 सामान्यत: मस्तिष्क के किसी भी भाग में वृद्घि होना बहुत खतरनाक माना जाता है। यह बात ब्रेन ट्यूमर के मामले में भी लागू होती है। ब्रेन ट्यूमर कई प्रकार के होते हैं। हालाकि इसे कैंसर के आधार पर मुख्य रूप से दो वर्र्गो कैंसरजन्य और कैंसररहित ट्यूमर में विभाजित किया जा सकता है। आम तौर पर बीस से चालीस साल के लोगों को ज्यादातर कैंसर रहित और 50 साल से अधिक उम्र के लोगों को ज्यादातर कैंसर वाले ट्यूमर होने की सभावना कहीं ज्यादा रहती है। कैंसर रहित ट्यूमर, कैंसर वाले ट्यूमर की तुलना में धीमी गति से बढ़ता है.
 कोलॉयड सिस्ट मस्तिष्क के सवेदनशील क्षेत्र में स्थित होते हैं और जैसे-जैसे उनके आकार में वृद्धि होती जाती है, वे जीवन के लिए खतरा बनते चले जाते हैं। परंपरागत सर्जरी के लिए क्रैनियोटॅमी यानी खोपड़ी के एक हिस्से को हटाए जाने और कोलॉयड सिस्ट को हटाने के लिए मस्तिष्क के प्रत्याकर्षण की प्रक्रिया अपनायी जाती है। इसके अंतर्गत खोपड़ी में एक महीन सा छिद्र (6 एमएम) किया जाता है ताकि इंडोस्कोप और उसके साथ काम करने वाले अधिकतम 6 एमएम की परिधि के आवरण को अंदर डाला जा सके। कोलॉयड सिस्ट को सपूर्ण रूप से हटाने के लिए बहुत छोटे (3-6 एमएम) के इंडोस्कोपिक उपकरण का इस्तेमाल किया जाता है।
 सर्जरी की प्रक्रिया 
 इंडोस्कोपिक सर्जरी के माध्यम से मस्तिष्क के रिट्रैक्शन से बचा जा सकता है। इंडोस्कोप को प्रविष्ट कराए जाने के लिए परंपरागत सर्जरी की तुलना में छोटा छेद करना होता है और इससे अपेक्षाकृत मस्तिष्क में कम रिट्रैक्शन होता है। इस प्रक्रिया में ऊतकों(टिश्यूज) को देखना आसान होता है। इस कारण सर्जरी अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित रूप से की जा सकती है। सर्जरी के प्रभाव से मुक्त होने में कम समय लगता है और अस्पताल में भी कम समय तक ठहरना होता है। इंडोस्कोपी सर्जरी में सफलता की दर बहुत ऊंची है। यही कारण है कि दुनिया भर में मस्तिष्क की सर्जरी के लिए इस सुरक्षित तकनीक को अपनाया जा रहा है।





मौसमी मर्जो को दें मात


गर्मिया दस्तक दे चुकी है। आखें शरीर का बेहद सवेदनशील अंग है। इसलिए गर्मियों के मौसम का दुष्प्रभाव आखों पर भी पड़ता है। आखों की कई बीमारिया जैसे फ्लू, सूजी हुई और थकी-थकी लाल आखें व ड्राई आई आदि के मामले मौजूदा मौसम में कहींज्यादा सामने आते हैं। इसके अलावा इस मौसम में पाचन तत्र से सबधित सक्रमण व गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल इंफेक्शन आदि के मामले कहीं ज्यादा सामने आते हैं, लेकिन कुछ सजगताएं बरतकर इन रोगों से राहत पायी जा सकती है..
 नयनों की सेहत को न करें नजरअंदाज
 आई फ्लू: आखों पर वाइरस के सक्रमण को आई फ्लू कहते हैं, जो आखों में सफेद दिखने वाले भाग पर चढ़ी झिल्ली को नुकसान पहुचाता है। इस फ्लू का वाइरस गदी उगलियों, गदे पानी, मक्खियों, धूल-धुआ और गदगी के माध्यम से तेजी से फैलता है। इस समस्या के दौरान आखों से निरतर पानी सरीखा द्रव निकलता है। आखों में दर्द और जलन भी बनी रहती है और पलकें सूजकर लाल हो जाती है।
 फोटो-फोबिया: यह भी आई फ्लू का ही एक रूप है। पीडि़त को धूप में जाते समय दिक्कत होती है। आखों को धूप और तेज रोशनी चुभती है। इससे पीडि़त आखों को पूरी तरह से नहीं खोल पाता । आखों में दर्द व थकान भी महसूस होती है.
 ड्राई आई: गर्मियों में बढ़ते हुए प्रदूषण और कंप्यूटर पर लबे समय तक काम करने की वजह से शुष्क आखों की परेशानी बढ़ सकती है। इस समस्या के दौरान आखों में खुजली या जलन होने लगती है। आखों से कभी-कभी कीचड़ निकलता है। इसी तरह अपने काम के सिलसिले में प्रदूषित क्षेत्रों से प्रतिदिन गुजरने वालों को भी एलर्जी की समस्या और ड्राई आई के लक्षण प्रकट हो सकते हैं।
 इन बातों पर दें ध्यान 
 -आखों के किसी भी सक्रमण से ग्रस्त होने के बाद साफ-सफाई का खास ख्याल रखें।
 -आखों को बार-बार हाथ से न छुएं और न ही रगड़ें। इन्हें छूने से पहले साबुन से हाथ धो लें।
 -पीडि़त द्वारा इस्तेमाल की हुई किसी भी वस्तु को अपने सपर्क में न लाएं।
 -कड़कड़ाती धूप में अल्ट्रावायलेट किरणें आप की आखों पर सीधे तौर से प्रहार करती है। इसीलिए धूप में जाते समय छतरी का उपयोग करे और आखों पर धूप का चश्मा लगाएं जिससे आप की आखों का बचाव हो सके। अपना चश्मा किसी अन्य व्यक्ति को पहनने के लिए न दें।
 -अगर आप पॉवर लेंस लगाते है तो भी आप को धूप का चश्मा पहनना चाहिए ताकि अल्ट्रावायलेट किरणें आखों को नुकसान न पहुचा सकें।...
 -आखों पर दिन में कई बार ठडे पानी के छींटे मारे। आखों पर खीरे के टुकड़े या रुई के फाहे में गुलाबजल डालकर आखों पर रखें। आखों को ताजगी मिलेगी।
 -आखों के लिए स्वस्थ भोजन और अच्छी नींद से कभी भी समझौता न करे। खाने में हरी सब्जिया, अंकुरित अनाज आदि का अधिकाधिक प्रयोग करें।
 -दिन में पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं, ताकि आप के शरीर की गदगी बाहर निकले और शरीर के अंगों में नमी बनी रहे। यह नमी आंखों के लिए भी जरूरी है।
 -डॉक्टर के परामर्श से आखों में ऐसी दवाएं डालें, जो आखों को शुष्क होने से रोकें और सक्रमण न पैदा होने दें। आखों के आसपास सनस्क्रीन न लगाएं। इनसे आखों को नुकसान हो सकता है।
 -कंप्यूटर पर काम करते समय बीच-बीच में ब्रेक लें और पलकें झपकाते रहे।
 इन रोगों की न करें अनदेखी 
 जब कभी मौसम बदलता है, तब कुछ खास बीमारिया सिर उठाती हैं। इसका कारण यह है कि मौसम के बदलने के कारण पर्यावरण और उसके तापक्रम में भी बदलाव आ जाता है। हवा में विभिन्न प्रकार के तत्व या कण (एलर्जेन) फैल जाते हैं। जैसे सर्दियों में तापमान के अत्यधिक कम होने के कारण हाईब्लड प्रेशर और मस्तिष्क आघात(स्ट्रोक) होने के मामले बढ़ जाते हैं। मौजूदा मौसम (बसत या स्प्रिंग) में दमा, स्किन एलर्जी, त्वचा सबधी सक्रमण और हाजमे से सबधित सक्रमण व बीमारिया (गैस्ट्रोइंटेस्टाइल इंफेक्शन) जैसे डायरिया व डीसेन्ट्री आदि की शिकायतें बढ़ जाती हैं।
 कुछ सुझाव 
 -इस मौसम में धूल भरी तेज हवा चलने से और पराग कणों(पॉलेन) के हवा के जरिये प्रसारित होने पर दमा सबधी शिकायत होने का जोखिम बढ़ जाता है। दमा की शिकायत होने पर डॉक्टर के परामर्श से इनहेलर व अन्य दवाएं ले। खुले स्थानों पर न जाएं, धूल आदि प्रदूषण से बचने के लिए मास्क लगा सकते हैं।
 -तेज हवा के कारण धूल व पराग कणों के कारण त्वचा में एलर्जी से सबधित शिकायतें बढ़ जाती हैं। इनसे राहत पाने के लिए डॉक्टर के परामर्श से एंटी एलर्जिक दवा ले सकते हैं।
 -मौजूदा मौसम में जीवाणुओं और फंगस के दुष्प्रभाव से त्वचा सबधी सक्रमण के मामले बढ़ जाते हैं। जीवाणु और फंगस गदगी के कारण बहुत तेजी से फैलते हैं। इसलिए शरीर को स्वच्छ रखें। कीटाणुनाशक साबुन से नहाएं।
 -इस मौसम में पेट और आतों में सक्रमण (गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल इंफेक्शन) से सबधित शिकायतें होने की आशका बढ़ जाती है। डायरिया व डीसेन्ट्री और पेट सबधी शिकायतों से बचने के लिए घर में स्वच्छता से तैयार किया भोजन ही ग्रहण करें। सड़क किनारे लगे ठेलों पर बिकने वाले खाद्य पदार्र्थो से परहेज करें। कच्चे खाद्य पदार्थ व कच्ची सब्जिया न खाएं। जिन कटे-खुले फलों व सब्जियों पर मक्खिया व अन्य कीट बैठे हुए हों, उनके खाने से वाइरल हेपेटाइटिस होने की आशका काफी बढ़ जाती है। जिन फलों या सब्जियों की सिचाई गदे प्रदूषित पानी से की जाती है, वे शरीर व खासकर पेट के लिए अत्यत नुकसानदेह होती हैं।


अब अभिशाप नहीं है बांझपन


बांझपन के ज्यादातार मामलों में फैलोपियन ट्यूब के बद हो जाने के कारण गर्भधारण करने में मुश्किल होती है, लेकिन आसान इलाज से इसे दूर भी किया जा सकता है। हालाकि ऐसी दशा में कई बार डॉक्टर टेस्ट ट्यूब बेबी का विकल्प अपनाते हैं, लेकिन इस विकल्प की कुछ सीमाएं हैं। यह तकनीक अपेक्षाकृत महंगी भी है। ऐसी स्थिति में हम ऐसी तकनीक को क्यों न अपनाएं जो न सिर्फ किफायती हो बल्कि भविष्य में सामान्य तरीके से गर्भधारण करने में मददगार भी हो। तो चलिए जानते हैं, उन तकनीकों के बारे में जो बाझपन से छुटकारा दिलाएंगी
 हिस्टेरोस्कोपिक सर्जरी 
 बच्चेदानी के भीतर फैलोपियन ट्यूब दो तरह से खुलती है। इसका एक सिरा सीधे बच्चेदानी के भीतर खुलता है जबकि दूसरा अंडेदानी (ओवरी) के पास खुलता है। कई बार बच्चेदानी के भीतर खुलने वाला भाग बद होता है, इसलिए गर्भधारण नहीं हो पाता है। इस तकनीक में इंडोस्कोपी और गाइड वायर के जरिए बद सिरे को खोल दिया जाता है और समस्या खत्म हो जाती है। फिर बाझपन की समस्या से पीडि़त महिलाएं आसानी से गर्भधारण कर सकती हैं।
 फिमब्रियोप्लास्टी 
 दूसरी तकनीक को हम फिमब्रियोप्लास्टी के नाम से जानते हैं। अंडेदानी(ओवरी) के पास खुलने वाला फैलोपियन ट्यूब का सिरा अपेक्षाकृत चौड़ा होता है। इसे फिम्ब्रियो बोलते हैं। कई बार जाच में पाया जाता है कि फैलोपियन ट्यूब का यह चौड़ा सिरा बद है। आमतौर पर सक्रमण की वजह से यह सिरा बद हो जाता है। लैप्रोस्कोपी की मदद से ही इस बद सिरे को खोल दिया जाता है जिसे फिमब्रियोप्लास्टी कहते हैं। इस मामूली सर्जरी के बाद बाझपन से छुटकारा मिल जाता है।
 ट्यूबोप्लास्टी 
 अक्सर ऐसा होता है कि एक-दो या फिर तीन बच्चों के बाद तमाम दंपति फैमिली प्लानिग के बारे में सोचने लगते हैं। वे तमाम सोच-विचार के बाद डॉक्टर के पास जाते हैं और झट से फैमिली प्लानिग प्रोसीजर अपना लेते हैं। इस प्रक्रिया में फैलोपियन ट्यूब का वह हिस्सा निकाल दिया जाता है जिसकी मदद से गर्भधारण होता है। दूसरी प्रक्रिया में फैलोपियन ट्यूब को बद कर दिया जाता है और गर्भधारण नहीं होता। यह परिवार नियोजन का एक तरीका है, लेकिन कई बार ऐसा होता है कि बच्चे पैदा होने के बाद वे जिंदा नहीं रह पाते और ऐसी स्थिति में दंपति पहले ही फैमिली प्लानिग प्रोसीजर करवा लेते हैं। ऐसे में जब दोबारा बच्चे की चाहत होती है तो फैलोपियन ट्यूब के बद हिस्से को दोबारा खोल दिया जाता है या फिर खुले हिस्से को जोड़ दिया जाता है। इस प्रक्रिया को ट्यूबोप्लास्टी कहते हैं।