Wednesday, November 19, 2014

खाएं हमेशा हरी-भरी


तकनीक ने खाने-पीने की आदतों को लेकर हमारी मुश्किलों को काफी आसान कर दिया है। बात अगर फल-सब्जी की हो तो उसे हम उसे सीधे फ्रिज का रास्ता दिखा देते हैं। यह सोचने की फुर्सत किसी के पास नहीं है कि इससे फल-सब्जियों की सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है। एक्सपर्ट्स की मदद से नेहा जैन बता रही हैं कि कैसे स्टोर करें फल और सब्जियां, जिससे वह रहें हमेशा हरी-भरी :

फल :
अब लगभग साल भर हर फल खाने को मिल सकता है, लेकिन हर फल को स्टोर करने का तरीका जुदा है। बेहतर होगा कि सीजन के फलों को ही खाने के लिए चुनें।

केला
सीजन : 12 महीने
लाइफ : 4-5 दिन
कैसे स्टोर करें - केले को रूम टेंप्रेचर पर ही रखना चाहिए। इसे अगर आपने फ्रिज में रख दिया तो यह काले और पिलपिले हो जाएंगे।

अंगूर
सीजन : जनवरी से अप्रैल
लाइफ : 15-20 दिन
कैसे स्टोर करें : फ्रिज में

अमरूद
सीजन : अक्टूबर से जनवरी
लाइफ : अधिकतम 10 दिन
कैसे स्टोर करें : इसे रूम टेंप्रेचर या फ्रिज, किसी भी तरीके से स्टोर किया जा सकता है। अमरूद को धूप से बचाना चाहिए, क्योंकि धूप में यह काले पड़ जाते हैं। रूम टेंप्रेचर पर यह 1-2 दिन और फ्रिज में 10 दिन तक चल सकते हैं। रूम टेंप्रेचर में रखने से यह कुछ नरम भी हो जाते हैं।

आम
सीजन : मार्च से अगस्त
लाइफ : 5 से 6 दिन
कैसे स्टोर करें : आम को पानी में एक घंटे तक भिगो कर फ्रिज में स्टोर किया जा सकता है। अगर आम को कार्बाइड से पकाया गया है तो पानी में भिगोने से इसका बुरा असर कुछ कम हो जाता है।

खुबानी
सीजन : मई-जून
लाइफ : 3 से 4 दिन
कैसे स्टोर करें : इन्हें फ्रिज में स्टोर किया जा सकता है।

खरबूजा
सीजन : अप्रैल-जुलाई
लाइफ : 2 से 3 दिन
कैसे स्टोर करें : खरबूजे को फ्रिज में स्टोर करना चाहिए। आमतौर पर लोगों का मानना है कि इससे फ्रिज में खरबूजे की गंध फैल जाती है लेकिन ऐसा तब ही होता है जब खरबूजा खराब होने लगता है। जब खरबूजा खराब होने लगता है तो उसकी गंध फ्रिज में फैल जाती है।

पपीता
सीजन : 12 महीने
लाइफ : 2 से 3 दिन
कैसे स्टोर करें : फ्रिज में स्टोर कर सकते हैं लेकिन इसे काट कर रखने से यह नरम पड़ जाता है।

अनार
सीजन : 12 महीने
लाइफ : 1 महीना
कैसे स्टोर करें : अनार को रूम टेंप्रेचर पर ही रखना चाहिए। अगर इसे फ्रिज में रख देंगे तो यह जल्दी गल जाएगा और ठण्डा होने पर खराब भी हो जाएगा। रूम टेंप्रेचर पर भले ही यह सूख जाए लेकिन इसका स्वाद और मिठास बना रहता है। अनार को काटने से पहले इसे 10-15 मिनट पानी में भिगो कर रख देना चाहिए। इससे छिलके नरम हो जाएंगे और इसे काटना आसान हो जाएगा।

तरबूज
सीजन : अप्रैल- अगस्त
लाइफ : 10 से 15 दिन (साबुत)
कैसे स्टोर करें : पानी में भिगोकर या फ्रिज में स्टोर करें।

सेब
सीजन : सितम्बर-दिसम्बर
लाइफ : 10 से 15 दिन
कैसे स्टोर करें - फ्रिज में स्टोर कर सकते हैं।

खजूर
सीजन : खजूर का मौसम 12 महीने रहता है, किन्तु इसकी तासीर गर्म होने के कारण इसे अधिकतर सर्दियों में खाया जाता है।
लाइफ : 6 महीने
कैसे स्टोर करें : खजूर दो तरह के होते हैं, सूखे खजूर और गीले खजूर। सूखे खजूर को रूम टेंप्रेचर पर और गीले खजूर को फ्रिज में स्टोर करना चाहिए।

नारियल
सीजन : 12 महीने
लाइफ : पानी वाला नारियल - 1 महीना सूखा नारियल- 6 महीना
कैसे स्टोर करें : पानी वाले नारियल को रूम टेंप्रेचर पर और सूखे नारियल को पॉलिथिन में या सील पैक डब्बे में रूम टेंप्रेचर पर रखना चाहिए।

नींबू
सीजन : मई से जुलाई
लाइफ : 7 से 8 दिन
कैसे स्टोर करें : फ्रिज

लीची
सीजन : मई से जून
लाइफ : 2 से 3 दिन
कैसे स्टोर करें : लीची को फ्रिज में स्टोर करना चाहिए। बारिश के बाद लीची नहीं खानी चाहिए क्योंकि बारिश से उसमें कीड़े हो जाते हैं जो बीमारियों का कारण बन सकते हैं।

संतरा
सीजन : अगस्त से नवम्बर
लाइफ- 2 से 3 दिन
कैसे स्टोर करें : फ्रिज

मौसमी
सीजन : मार्च से अगस्त
लाइफ : 7 से 8 दिन
कैसे स्टोर करें : फ्रिज या रूम टेंप्रेचर, कहीं पर भी स्टोर कर सकते हैं।

चीकू
सीजन : अगस्त से जनवरी
लाइफ : 3 से 4 दिन
कैसे स्टोर करें : फ्रिज में स्टोर कर सकते हैं।

स्ट्रॉबेरी
सीजन : अप्रैल से जून
लाइफ : 24 घंटे
कैसे स्टोर करें : फ्रिज में स्टोर करें।

चेरी
सीजन : मई से जुलाई
लाइफ : 2 से 3 दिन
कैसे स्टोर करें : फ्रिज में स्टोर करें।

सब्जियां : सब्जियों से हमारा रोज का लेना-देना है और इन्हें स्टोर करते वक्त भी सही जानकारी बहुत जरूरी है।

आलू
सीजन : जुलाई से अगस्त
लाइफ : 1 महीना
कैसे स्टोर करें : रूम टेंप्रेचर

प्याज व लहसून
सीजन : मार्च से जून
लाइफ : 1 महीना
कैसे स्टोर करें : रूम टेंप्रेचर पर किसी सूखी जगह पर रखने चाहिए।

लौकी/घीया
सीजन : सितम्बर से नवंबर
लाइफ : 4 से 5 दिन
कैसे स्टोर करें : फ्रिज

पत्ता एवं फूल गोभी
सीजन : सितम्बर-दिसम्बर
लाइफ : 3 से 4 दिन
कैसे स्टोर करें : पत्ता और फूल गोभी को फ्रिज या रूम टेंप्रेचर, कहीं पर भी स्टोर कर सकते हैं।

शिमला मिर्च 
सीजन : अगस्त से नवंबर
लाइफ- 4 से 5 दिन
कैसे स्टोर करें : फ्रिज में स्टोर करें।

गाजर 
सीजन : सितम्बर से दिसम्बर
लाइफ- 4 से 5 दिन
कैसे स्टोर करें : फ्रिज में स्टोर करें।

टिंडा
सीजन : अक्टूबर से फरवरी
लाइफ : 3 से 4 दिन
कैसे स्टोर करें : फ्रिज में रखें।

तोरी
सीजन : अक्टूबर से दिसंबर
लाइफ : 2 से 3 दिन
कैसे स्टोर करें : फ्रिज या रूम टेंप्रेचर दोनों पर ही यह सही-सलामत बनी रहती है।

बैंगन
सीजन : अक्टूबर से जनवरी
लाइफ : 4 से 5 दिन
कैसे स्टोर करें- फ्रिज और रूम टेंप्रेचर दोनों पर स्टोर कर सकते हैं।

अदरक
सीजन : नवंबर से मार्च
लाइफ : 15 से 20 दिन
कैसे स्टोर करें : फ्रिज में रखें। रूम टेंप्रेचर पर यह अंदर से सड़ जाती है।

कटहल
सीजन : मई से जुलाई
लाइफ- कटा हुआ 1 दिन साबुत 15 दिन
कैसे स्टोर करें : कटे हुए कटहल को तेल या नींबू का रस लगाकर फ्रिज में रख देना चाहिए। इससे यह काला नहीं पड़ेगा और इसका चिपचिपापन हट जाएगा। साबुत कटहल को रूम टेंप्रेचर पर स्टोर किया जा सकता है।

शलजम
सीजन : अगस्त से दिसम्बर
लाइफ : 3 से 4 दिन
कैसे स्टोर करें : फ्रिज में आराम से स्टोर किया जा सकता है।

भिंडी
सीजन : सितम्बर से दिसंबर
लाइफ : 1 से 2 दिन
कैसे स्टोर करें : फ्रिज में स्टोर करें।

टमाटर
सीजन : सितंबर-जनवरी
लाइफ : 4-5 दिन
कैसे स्टोर करें : फ्रिज में स्टोर करने से यह जल्दी पकते भी नहीं है।

मटर
सीजन : अप्रैल से जुलाई
लाइफ : 3 से 4 दिन
कैसे स्टोर करें : रूम टेंप्रेचर और फ्रिज दोनों में यह सही-सलामत रहती है।

मेथी, सरसों और बथुआ
सीजन : अक्टूबर से दिसंबर
लाइफ : 1 से 2 दिन
कैसे स्टोर करें : फ्रिज में पैकिंग से बाहर निकाल कर स्टोर करें।

पालक
सीजन : अक्टूबर से दिसंबर और मार्च से अप्रैल
लाइफ : 1 से 2 दिन
कैसे स्टोर करें : फ्रिज में गड़्डी खोल कर।

धनिया
सीजन : अक्टूबर से दिसंबर
लाइफ : 3 से 4 दिन
कैसे स्टोर करें : धनिया को गीले कपड़े में लपेटकर रूम टेंप्रेचर पर स्टोर करना चाहिए। फ्रिज में यह काला पड़ सकता है।

अरबी
सीजन : जनवरी से मार्च
लाइफ : 10 से 12 दिन
कैसे स्टोर करें : रूम टेंप्रेचर पर भी यह सही बनी रहती है।

पेठा/सीताफल
सीजन : दिसंबर से अप्रैल
लाइफ : 12-15 दिन (साबुत)1-2 दिन (कटा हुआ)
कैसे स्टोर करें : फ्रिज में स्टोर करें।

मूली
सीजन : सितंबर से दिसंबर
लाइफ : 3-4 दिन
कैसे स्टोर करें : फ्रिज में पैकिंग से बाहर निकाल कर स्टोर करें।

परमल
सीजन : सितंबर से दिसंबर
लाइफ : 3 से 4 दिन
कैसे स्टोर करें : फ्रिज में स्टोर करें।

कचालू
सीजन : मार्च से मई
लाइफ : 10 से 12 दिन
कैसे स्टोर करें : रूम टेंप्रेचर पर किसी सूखी जगह।

जमींकंद
सीजन : अगस्त से नवंबर
लाइफ : 10 से 12 दिन
कैसे स्टोर करें : रूम टेंप्रेचर पर किसी सूखी जगह।

खीरा
सीजन : अप्रैल से जुलाई
लाइफ : 2 से 3 दिन
कैसे स्टोर करें : फ्रिज

कटे फल-सब्जियां कैसे करें स्टोर : इस मसले पर एक्सपर्ट्स की मुख्य सलाह यह है कि कि फल और सब्जियां उतने ही काटें जितने इस्तेमाल हो सकें। कटे हुए फल एवं सब्जियां जल्दी खराब होने लगते हैं। उन पर बैक्टीरिया पनपने लगते हैं, जो सेहत को नुकसान पहुंचा सकते हैं। हालांकि आप चाहे न चाहें, कटे हुए फल-सब्जियां रखने ही पड़ते हैं। ऐसी हालत में कुछ टिप्स काम आ सकते हैं लेकिन इन्हें 12 से 24 घंटे के अंदर इस्तेमाल कर लें।

कटे प्याज और लहसून को एयर टाइट डब्बे में रूम टेंप्रेचर पर रख सकते हैं। कटे हुए पपीते को फ्रिज में रखना चाहिए। हालांकि 7-8 घंटे में ही यह नरम पड़ने लगता है, इसलिए इसे जल्दी ही इस्तेमाल कर लेना चाहिए। कटे हुए अनार को एयर टाइट डब्बे में रखकर फ्रिज में रखना चाहिए। तरबूज ज्यादातर लोग कटवाकर लेते हैं। इसीलिए इसे घर लाते ही तुरंत फ्रिज में स्टोर कर लेना चाहिए। कटे हुए नींबू को फ्रिज में रखना चाहिए।

फलों को घर पर ही पकाएं
कभी-कभी बाजार से कच्चे फल आ जाते हैं और उसे खाना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में कुछ फलों जैसे आम, पपीता आदि को आप कुछ हद तक पका सकते हैं। इसके लिए आप उसे न्यूजपेपर या पॉलिथिन में लपेटकर आटा या चावल के बीच 1-2 दिन के लिए रख दें। इससे वह पक जाएंगे। नाशपाती एवं बब्बू गोशे को पेपर में लपेटकर 2-3 दिन रूम टेंप्रेचर में रखने से यह अच्छी तरह पक जाते हैं।

ये देसी सब्जी क्या है?
आपने सब्जी वालों से अक्सर देसी सब्जियों के बारे में सुना होगा। देसी सब्जियां सब्जियों की वह प्रकार होती है, जिनको लैब में क्रॉस करने नहीं, बल्कि नैचरल परागण से उगाया जाता है। दूसरी ओर लैब में क्रॉस ब्रीडिंग से तैयार सब्जियों को हाइब्रिड कहा जाता है। देखने में भले ही हाइब्रिड सब्जियां सुंदर हों, लेकिन सेहत के लिए ये देसी सब्जियां ही फायदेमंद होती हैं। मार्केट में देसी सब्जियों की पहचान में आप धोखा खा सकते हैं। इसीलिए सब्जियां लेते वक्त अतिरिक्त सावधानी की जरूरत होती है।

इनकी प्रमुख पहचान है कि देसी सब्जियां जहां साइज में छोटी और खुददरी होती हैं, वहीं हाइब्रिड सब्जियां बड़ी और अधिक चमकदार होती हैं। यही बातें फलों पर भी लागू होती हैं। ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी फल या सब्जी को इस्तेमाल करने से पहले धो लेना चाहिए ताकि उस पर लगा केमिकल और गंदगी हट जाए।

गैर मौसमी सब्जियों एवं फलों से बचें
अब ज्यादातर सब्जियां और फल 12 महीने बाजार में मिलते हैं। ऐसे में फल और सब्जियों के सही सीजन का पता लगाना मुश्किल हो जाता है। गैर मौसमी फलों और सब्जियों को खाकर आपको संतुष्टि भले मिल जाए, लेकिन वह आपकी सेहत के लिए अच्छे नहीं साबित होते। सीजन नहीं होने पर सब्जियां और फल या तो आर्टिफिशल तरीके से उगाए जाते हैं या फिर पूरे साल स्टोर करके रखे जाते हैं, जिसके कारण इनमें प्रिजरवेटिव यूज किया जाता है। कई तरह के केमिकल के इस्तेमाल से इनका न्यूट्रिशन खत्म हो जाता है। लंबे इस्तेमाल से यह केमिकल्स गंभीर रोगों का कारण भी बन सकते हैं। इसलिए सीजन की फल-सब्जी ही आपकी सेहत में चार चांद लगा सकती है।

पैक्ड फूड कितना फिट?
घर में कामकाजियों की संख्या बढ़ने से बाजार में पैक्ड फूड की भरमार है। इन्हें इंस्टेंट फूड भी कहा जाता है। ये पहले से ही तैयार होते हैं, बस पानी मिलाकर गर्म करने की देर होती है। पैक्ड फूड से भले ही आपका वक्त और मेहनत बचता है लेकिन इसमें मौजूद प्रिजरवेटिव्स सेहत को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। महीनों तक स्टोर करने के कारण पैक्ड फूड अपने पोषक तत्व खो देते हैं। उनमें इस्तेमाल होने वाली सब्जियां अपनी लाइफ पूरी होने के बाद पोषक तत्व खो देती हैं। इसलिए पैक्ड फूड से बच कर ताजे सीजनल खाने का दामन थामना चाहिए।

एक्सपाइरी डेट पर कितना एक्सपायर
बाजार में फ्रूट जूस और दही जैसी खाने की चीजें तो बड़े-बड़े स्टोर्स में डिस्काउंट पर मिलती दिख जाती है। कस्टमर इसे फायदे का सौदा समझ कर फौरन झपट लेते हैं। किसी भी ऑफर पर टूट पड़ने से पहले प्रॉडक्ट्स की मैन्युफैक्चरिंग यानी उसके बनाने की तारीख और एक्सपाइरी डेट यानी उसके खराब होने की तारीख पर जरूर गौर करें। जो खाने का सामान एक्सपाइरी डेट के नजदीक है, उसे खरीदने से बचना चाहिए, चाहे वह कितना ही सस्ता क्यों न हो। खाने-पीने का सामान मैन्युफैक्चरिंग डेट के जितना नजदीक होगा, उतना ही हेल्थी होगा।

जानिए पेटेंट की A B C...


आंत्रप्रनरशिप की सीढ़ियां चढ़ते वक्त कहीं ये न भूल जाइएगा कि आइडिया का बल्ब किसी के भी दिमाग में जल सकता है लेकिन आइडिया माना उसी का जाता है जो उसे ऑफिशली रजिस्टर करवा दे। आइडिया को दर्ज कराने के इस प्रॉसेस को पेटेंट का नाम दिया गया है। किसी आइडिया का पेटेंट ही उससे होने वाली कमाई को आपकी जेब तक पहुंचाएगा। पेटेंट के प्रॉसेस को एक्सपर्ट्स की मदद से बता रहे हैं नीतू सिंह और अमित मिश्रा :

केस स्टडी 1- टेट्रा पैक ने बदली दुनिया 
दूध हो चाहें जूस या टमैटो प्यूरी हर चीज टेट्रा पैक में मिलती है। ये टेट्रा पैक इतने आम हो गए हैं कि शायद ही कभी हम इसमें छिपे आइडिया को महसूस कर पाते हों। इन्हें देखकर हमें हैरत नहीं होती, क्योंकि इनकी आदत-सी हो गई है, लेकिन अगर टेट्रा पैक को बाजार से हटा दिया जाए तो क्या होगा? या यूं कहें कि टेट्रा पैक कभी आया ही न होता तो? बेशक तब नजारा कुछ और होता। आज भी ये चीजें कांच या प्लास्टिक की बोतलों में बिकतीं, जिनका रेट महंगी पैकेजिंग के चलते डेढ़ से दो गुना ज्यादा होता। आप और हम बोतलें ढोते-संभालते परेशान होते। दरअसल टेट्रा पैक एक ऐसे अविष्कार का नमूना है, जिसके पेटेंट ने दुनिया भर में बिजनेस का एक नया नेटवर्क खड़ा कर दिया। इसके आविष्कारक इरिक वॉलेनबर्ग ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उनका एक छोटा-सा आविष्कार उनकी कंपनी के मालिक रूबेन रॉजिंग को एक दिन अरबपति बना देगा। स्वीडिश इंजीनियर इरिक वॉलेनबर्ग ने अपने करियर की शुरूआत टेट्रा पैक बनाने वाली कंपनी में लैब असिस्टेंट की तरह की थी। एक दिन उनके बॉस ने उन्हें दूध की सस्ती और टिकाऊ पैकेजिंग तैयार करने की चुनौती दी। इसे इरिक ने सस्ते कागज के इस्तेमाल से कर दिखाया और 1963 में टेट्रा ब्रिक के नाम से कंपनी ने इसका पेटेंट कराया। जो मौजूदा वक्त में टेट्रा पैक के रूप में हमारे खाने की टेबल और फ्रिज में दिखता है। सचमुच, इसे कहते हैं आइडिया और पेटेंट की ताकत।

एक आइडिया बदल सकता है जिंदगी 
असल बात ये है कि आपका एक मामूली-सा आइडिया भी अगर यूनिक है, तो दुनिया भर में धमाल मचा सकता है। ये रातोंरात आपको फेमस और अमीर बना सकता है। जरूरत है तो बस इस पर थोड़ी मेहनत करने की और उसका पेटेंट अपने नाम करने की। जैसा कि पश्चिमी देशों के लोग करते हैं। अमेरिका और यूके जैसे देशों में लोग खिलौने रखने के बैग, लिपस्टिक लगाने के तरीकों और यहां तक कि किचन में इस्तेमाल होने वाली मल्टीपरपस छुरी के डिजाइन तक को पेटेंट कराते हैं और उसका लाइसेंस किसी कंपनी को बेचकर पैसा कमाते हैं। दूसरी ओर भारत में पेटेंट प्रोसेस को लेकर अब भी जागरूकता की काफी कमी है। यही वजह है कि आइडिया और आविष्कार होते हुए भी पहचान नहीं मिल पाती है।

समझें इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट 
पेटेंट, ट्रेडमार्क, कॉपीराइट और ट्रेड सीक्रेट, ये सब 'इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी' यानी बौद्धिक संपदा के तहत आते हैं। यानी एक ऐसा प्रॉडक्ट, जो क्रिएटिव दिमाग की उपज है। दरअसल इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी कल्पना को हकीकत में तब्दील करता है। इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी भी वैसे ही एक संपत्ति है, जैसे कि आपका घर, गाड़ी और यहां तक कि आपका बैंक अकाउंट। दूसरी संपत्तियों की तरह ही इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी को भी चोरी या गलत इस्तेमाल से बचाने की जरूरत होती है, तब ही आप इससे फायदा उठा सकते हैं। कुछ लोग पेटेंट, कॉपीराइट और ट्रेडमार्क में कन्फ्यूज हो जाते हैं। हालांकि इन सबमें कुछ समानता हो सकती है, लेकिन ये अलग-अलग हैं और इनका उद्देश्य भी अलग होता है।

ट्रेडमार्क 
ट्रेडमार्क किसी भी प्रॉडक्ट या सर्विस की अलग पहचान बताने वाले शब्दों, नाम, सिंबल, आवाज या रंग को प्रोटेक्ट करता है। पेटेंट से अलग, ट्रेडमार्क को हमेशा के लिए रजिस्टर कराया जा सकता। यह तब तक वैलिड रहता है, जब तक कि इनका इस्तेमाल बिजनेस के लिए होता रहे। मिसाल के तौर पर कोका कोला की बोतल की शेप ट्रेडमार्क के तहत प्रोटेक्ट किया गया है। ट्रेडमार्क एक ब्रैंड नेम और पहचान होता है, जो प्रॉडक्ट या सर्विस की मार्केटिंग में बड़ी भूमिका निभाता है। ट्रेडमार्क का अधिकार किसी दूसरे द्वारा समान सिंबल (शब्द, आवाज, कलर आदि) बनाकर कन्फ्यूज करने से रोकने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन ये किसी दूसरे को वैसा ही प्रॉडक्ट बनाकर अलग मार्क के साथ बेचने से रोकने का अधिकार नहीं देता है।

कॉपीराइट 
कॉपीराइट राइटिंग, म्यूजिक और आर्ट संबंधी ऐसे कामों को प्रोटेक्ट करता है, जो स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त किया गया हो। कॉपीराइट का अधिकार रचनाकार का जीवन रहने तक और इसके बाद के 70 सालों तक सुरक्षित रहता है। किताबें, फिल्में, रिकॉर्डिंग और विडियो गेम जैसे कामों का कॉपीराइट होता है। सिर्फ कॉपीराइट होल्डर ही अपनी रचना को दोबारा प्रकाशित कर प्रॉफिट कमा सकता है। अगर वो चाहे तो इसके अधिकार दूसरे को ट्रांसफर भी कर सकता है।

पेटेंट का फंडा
पेटेंट किसी इनवेंटर यानी आविष्कारक को ये अधिकार देता है कि कोई भी दूसरा इंसान उसकी सहमति के बिना उस आविष्कार को अगले 20 वर्षों तक न बना सकता है, न इस्तेमाल कर सकता है और न ही बेच सकता है। पेटेंट, इनवेंटर को ये अधिकार देता है कि वो अपने आइडिया के आधार पर प्रॉडक्ट को बाजार में ला सके या किसी दूसरे को ऐसा करने का लाइसेंस देकर पैसे कमा सके। पेटेंट 3 तरह के होते हैं :

यूटिलिटी पेटेंट: ये यूजफुल प्रॉसेस, मशीन, प्रॉडक्ट का कच्चा माल, किसी चीज का कंपोजिशन या इनमें से किसी में भी सुधार को सुरक्षित करता है। मिसाल के तौर पर : फाइबर ऑप्टिक्स, कंप्यूटर हार्डवेयर, दवाइयां आदि।

डिजाइन पेटेंट : ये प्रॉडक्ट के नए, ओरिजिनल और डिजाइन के गैर कानूनी इस्तेमाल को रोकता है। जैसे कि किसी एथलेटिक शूज का डिजाइन, बाइक का हेलमेट या कोई कार्टून कैरेक्टर, सभी डिजाइन पेटेंट से प्रोटेक्ट किए जाते हैं।

पेटेंट : इसके जरिए नए तरीकों से तैयार की गई पेड़-पौधों की वैराइटी को प्रोटेक्ट किया जाता है। हाइब्रिड गुलाब, सिल्वर क्वीन भुट्टा और बेटर बॉय टमाटर आदि प्लांट पेटेंट के उदाहरण हैं। यहां गौर करने वाली बात ये है कि आप किसी आविष्कार के अलग-अलग पहलुओं के लिए यूटिलिटी और डिजाइन दोनों तरह के पेटेंट फाइल कर सकते हैं।

इनका नहीं होता पेटेंट - 
प्रकृति के नियम (हवा और गुरुत्वाकर्षण)
नेचरल चीजें (मिट्टी, पानी)
भाववाचक (एब्स्ट्रैक्ट) आइडिया (मैथमेटिक्स, कोई फिलॉसफी )
लिट्रेचर, नाटक, म्यूजिक जैसे क्रिएटिव काम को कॉपीराइट के जरिए प्रोटेक्ट किया जाता है।

इनका हो सकता है पेटेंट -
ऐसे आविष्कार जोः 1.अनोखा या नया हो 2. सबसे अलग : इसका मतलब है कि आविष्कार पूरी तरह से अलग होना चाहिए। उदाहरण के तौर पर, किसी दवा के किसी तत्व या आकार में बदलाव करके पेटेंट नहीं कराया जा सकता। पेटेंट हासिल करने के लिए आपका आष्किार पूरी तरह से नया होना चाहिए, जो पहले कभी नहीं बना। 3. ऐसे आविष्कार, जो यूजफुल हों। आपका गैजट काम का होना चाहिए और कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा करता हो और जो दावे किए गए हों उन पर यह प्रैक्टिकली खरा उतरता हो।

ऐसे फाइल करें पेटेंट ऐप्लिकेशन -

पेटेंट ऐप्लिकेशन में शामिल होते हैं : - एक लिखित डॉक्युमेंट, जिसमें आपके इनवेंशन की खासियतें लिखी होती हैं और घोषणापत्र होता है। अगर जरूरी हो तो ड्रॉइंग भी देना होता है।
-10 क्लेम और 30 पेजों में अगर कोई शख्स पेटेंट फाइल करता है तो 1000 रुपये लगते हैं लेकिन अगर ऑर्गनाइजेशन फाइल करता है तो 4000 रुपये लगते हैं। अगर क्लेम 10 से ज्यादा हैं तो किसी शख्स को हर एक्स्ट्रा क्लेम पर 200 रुपये और ऑर्गनाइजेशन को 800 रुपये भरने होंगे। इसी तरह पेजों की संख्या बढ़ने पर हर शख्स से 100 रुपये प्रति एक्स्ट्रा पेज और ऑर्गनाइजेशन को 400 रुपये प्रति एक्सट्रा पेज देने होंगे।
- ऐप्लीकेशन फाइल करने से पहले आविष्कार को लेकर पूरी तरह से निश्चिंत हो लें। हर डॉक्युमेंट को तैयार रखें, जरा-सी चूक आपके इंतजार को और बढ़ा सकती है।
- पेटेंट जारी होने में 3 साल तक का वक्त लग सकता है। अगर आप पेटेंट एक्सपर्ट नहीं हैं तो पहली बार में पेटेंट ऐप्लिकेशन रिजेक्ट होने की आशंका ज्यादा रहती है, हालांकि इसमें जरूरी सुधार करके आप दोबारा कोशिश कर सकते हैं।

ऐसे मिलता है पेटेंट -
आविष्कार करने वाला या उसकी तरफ से नियुक्त कोई भी पेटेंट के लिए ऐप्लिकेशन दे सकता है। अपने ऐप्लीकेशन में अपने इनवेंशन के बारे में पूरी और स्पष्ट जानकारी दें। यह बताएं कि यह किस प्रकार से नया, अनोखा और यूजफुल है।

- अगर दो या इससे अधिक लोगों ने मिलकर कोई आविष्कार किया है तो पेटेंट ऐप्लिकेशन पर सभी इनवेंटर्स का नाम लिखा होना चाहिए।
- पेटेंट के लिए फाइल किए गए इनवेंटर के ऐप्लिकेशन की पूरी जांच की जाती है। पेटेंट एग्जामिनर यह सुनिश्चित करता है कि ऐप्लिकेशन सभी योग्यताएं पूरी करता हो।
- जांच के 18 महीने के भीतर इसे पेटेंट अथॉरिटी अपने वीकली जर्नल और वेबसाइट पर आम लोगों के लिए पब्लिश करके ऑब्जेक्शन का इंतजार करती है।
- जिसने पेटेंट का ऐप्लीकेशन दिया है, उसे ऐप्लीकेशन के 48 महीने के भीतर पेटेंट एग्जामिनेशन के लिए रिक्वेस्ट करनी होती है।
- संबंधित अधिकारी सभी ऑब्जेक्शन और सवालों को फिर एप्लिकेंट के पास भेज कर जवाब मांगता है।
- इसके लिए डॉक्यूमेंट दाखिल करने के लिए 12 महीने का वक्त मिलता है। अगर आप अथॉरिटी को संतुष्ट नहीं कर सके तो ऐप्लीकेशन रिजेक्ट कर दी जाएगी।
- यह बात भी याद रखें कि एग्जामिनर द्वारा कोई पहलू छूट जाने की हालत में बाद में भी आपका ऐप्लिकेशन वापस हो सकता है।
- खास बात यह है कि पेटेंट रजिस्ट्रेशन के लिए आप एजेंट की मदद भी ले सकते हैं। ध्यान रहे कि ऐसे पेटेंट एजेंट को ही चुनें, जो कंट्रोलर जनरल ऑफ पेटेंट्स डिजाइन और ट्रेडमार्क से सर्टिफाइड हो।
- आप ऑनलाइन ऐप्लीकेशन भी फाइल कर सकते हैं। इसके लिए www.ipindia.nic.in पर जाकर Patent सेक्शन में जाकर Comprehensive eFiling Services for Patents पर जाएं।
- गौरतलब है कि भारत में कराया हुआ पेटेंट दुनिया भर में मान्य नहीं होता। दुनिया के दूसरे देशों में आपको अलग से पेटेंट फाइल करना पड़ेगा।
- कुछ देशों के साथ भारत की पेटेंट ट्रीटी है। जिसके तहत आप यहां दी गई पेटेंट ऐप्लीकेशन के साथ ही कोलकाता, चेन्नै, मुंबई और दिल्ली के पेटेंट ऑफिसों में दे सकते हैं। इनकी डिटेल जानकारी www.ipindia.nic.in पर मिल सकती है।
- अक्सर देखने को मिलता है कि पेटेंट मिलने की प्रक्रिया के दौरान लोग 'Patent Pending' या 'Patent Applied For' लिख कर काम करते रहते हैं। लेकिन इसकी कोई कानूनी वैधता नहीं होती है। इस पीरियड के दौरान पेटेंट वॉयलेशन को लेकर कोई कानूनी कदम नहीं उठाया जा सकता।

हम क्यों हैं पीछे? 
- लोगों में जागरूकता की कमी है। पेटेंट या इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट को लेकर किसी भी तरह की जानकारी आम कॉलेजों से नहीं मिल पाती।
- सरकारी विभाग भी इसको लेकर ज्यादा सक्रिय नही हैं।
- भारत में ज्यादातर लोग बिना पता किए ही अपने आविष्कार को यूनीक मान बैठते हैं। इंटरनेट के इस युग में सब कुछ सर्च करना आसान हो गया है लेकिन दिक्कत यह है कि आज भी यूनिफाइड पेटेंट सर्च जैसी कोई चीज नहीं है, जो दुनिया भर में पेटेंट हो चुकी चीजों के बारे में बता सके। अगर पेटेंट है भी तो उसमें क्या अलग फीचर जोड़कर उसे एडवांस और नया रूप दिया जा सकता है यह नहीं पता होता।
- भारत का पेटेंट ऑफिस तो पेटेंट ग्रांट कर देता है, मगर जब यूएस, यूके या यूरोप में पेटेंट के लिए अप्लाई किया जाता है तो ऐप्लीकेशन रिजेक्ट हो जाता है।
- आम लोगों को पेटेंट ऐप्लीकेशन की टेक्निकल राइटिंग नहीं आती है और पेटेंट अटॉर्नी सर्च और राइटिंग आदि के बदले काफी फीस लेते हैं, जो कि यहां के अधिकतर इंडिविजुअल इंवेंटर के लिए दे पाना संभव नहीं होता।

यहां मिलेगी जानकारी
इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी से जुड़े मामलों के भारत सरकार के कंट्रोलर जनरल ऑफ पेटेंट, डिजाइन और ट्रेडमार्क देखता है। इसकी वेबसाइट ipindia.nic.in पर जा कर पूरी जानकारी ली जा सकती है।

ऑफिस से करें संपर्क 
Office of the Controller General of Patents, Designs & Trade Marks Bhoudhik Sampada Bhavan, Antop Hill, S. M. Road, Mumbai - 400 037
Head of the Office: Dr. Ruchi Tiwari Joint Controller of Patents & Designs Phone: 022-24123311, Fax: 022-24172288 E-mail: cgoffice-mh@nic.in
Intellectual Property Office Boudhik Sampada Bhawan, Antop Hill, S. M. Road, MumbaiI - 400 037. Phone: 24101144, 24148165
Dr. Rakesh Kumar Deputy Controller of Patents & Designs Phone: 022-24153651, Fax: 022-24130387 E-mail: mumbai-patent@nic.in
Shri S. M. Togrikar Senior Examiner of Trade Marks & G.I. Phone: 022-24137701, Fax: 022-24140808 E-mail: mumbai.tmr@nic.in
Intellectual Property Office Intellectual Property Office Building, Plot No. 32, Sector 14, Dwarka, New Delhi-110075 Phone: 011-28034304-05
Dr. K. S. Kardam Senior Joint Controller of Patents & Designs Phone: 011-28034317, Fax:011-28034315 E-mail: delhi-patent@nic.in
Geographical Indications Registry Intellectual Property Office Building, G.S.T. Road, Guindy,Chennai-600032 Phone: 044-22502092
Shri Chinnaraja G Naidu Assistant Registrar of Trade Marks & G.I. Phone: 044-22502091,Fax: 044-22502090, E-mail: gir-ipo@nic.in

जागरूक रहने में ही होशियारी 
इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार की कॉमर्स और इंडस्ट्री मिनिस्ट्री ट्रेनिंग और जागरूकता अभियान भी चलाती है। यहां पर एक दिन के ट्रेनिंग प्रोग्राम से लेकर साल भर तक का ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाया जाता है। पूरी जानकारी www.ipindia.nic.in/niipm पर मिल सकती है। आप यहां भी संपर्क कर सकते हैं : Rajiv Gandhi National Institute for Intellectual Property Management Government of India Ministry of Commerce and Industry Department of Industrial Policy & Promotion Office of the Controller General of Patents, Designs, Trademarks 03, Hislop College Road, Civil lines, Nagpur, Maharashtra - 440001 Tel. Nos. 0712 - 2540913,920, 922/2542961,979 Fax Nos. 0712 -2542955 /2540916/ 2053836 Email - ipti-mh@nic.in, niipm.ipo@nic.in Smt. C. D. Satpute, Senior Documentation Officer Tel: 0712- 2540913,922/2542961,979 (Ext. No. 214) E mail - chhaya.satpute@nic.in , ipti-mh@nic.in , niipm.ipo@nic.in,

बिजनेस का फॉरन कनेक्शन : इंपोर्ट-एक्सपोर्ट


एक्सपोर्ट या इंपोर्ट अच्छा बिजनस हो सकता है क्योंकि इसमें अच्छी कमाई के साथ-साथ दूसरे देशों में घूमने और उन्हें जानने का मौका भी मिलता है। अच्छे एक्सपोर्टर या इंपोर्टर बनने के लिए इस फील्ड से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जानकारी होना जरूरी है, वरना फायदे के बजाय नुकसान हो सकता है। एक्सपर्ट्स की मदद से एक्सपोर्ट-इंपोर्ट से जुड़ी अहम जानकारियां और सावधानियां दे रही हैं प्रियंका सिंह :

शुरुआत से पहले होमवर्क
- सबसे पहले तय करें कि आप किस फील्ड में बिजनस करना चाहते हैं। उसके बारे में पूरी स्टडी करें, जानकारी जमा करें। इसके लिए इंटरनेट के अलावा उस फील्ड से जुड़े लोगों से मिलें और उनसे सीखें।
- एक्सपोर्ट के लिए प्रॉडक्ट की डिमांड के बारे में जानकारी जमा करें और देखें कि कौन-से देशों में उसकी मांग ज्यादा है और वहां इसका इस्तेमाल कैसे होता है। अच्छे मार्केट तलाशें।
- सप्लाई चेन और मटीरियल फ्लो के बारे में अच्छी जानकारी लें। मैन्युफैक्चरिंग हब से लेकर लीड टाइम (प्रॉडक्ट तैयार होने में लगने वाला वक्त), शेल्फ टाइम (जितने वक्त के लिए मटीरियल स्टोर में रहेगा) के बारे में जानें।
- एक्सपोर्ट में प्रॉडक्ट का सेलेक्शन सबसे अहम है। कम कीमत से शुरू करना चाहते हैं तो ऐसा प्रॉडक्ट चुनें, जिसमें आइडिया अहम हो।
- जिस भी देश में काम शुरू करना हो, वहां की स्टडी करें। देखें कि वहां उस प्रोडक्ट का कॉम्पिटिशन कैसा है। हर बाजार के नियम-कायदे अलग हैं। उनका ध्यान रखें।
- इसके बाद पता लगाएं कि आपकी मदद के लिए कौन-सी सरकारी स्कीम या संस्थाएं हैं। मसलन, क्लस्टर एक अच्छी सरकारी स्कीम है, लेकिन लोग दूसरों को पता न लग जाए, इस डर से इसका फायदा नहीं उठाते। इसमें एक ही तरह के प्रॉडक्ट बनाने वाले लोग मिलकर सरकार को अप्रोच करते हैं और फिर सरकार उसे एक इंडस्ट्री की तरह मानकर मदद करती है। इस स्कीम में 80 फीसदी फंडिंग बिना ब्याज होती है। देखें : msmedinewdelhi.gov.in
- एक्सपोर्ट प्रमोशन कैपिटल गुड्स स्कीम, विशेष कृषि एंड ग्राम उद्योग योजना (सीकेजीयूवाई), फोकस प्रोडक्ट स्कीम (एफपीएस), मार्केट लिंक्ड फोकस प्रोडक्ट स्कीम (एमएलएफपीएस), स्पेशल बोनस बेनेफिट स्कीम, साथ ही ड्यूटी वापस लेने की स्कीम भी है। 

स्कीमों की और जानकारी के लिए आप eximguru.com, eximbankindia.com, commerce.nic.in, indiatradefair.com आदि की मदद ले सकते हैं।
ऐसे करें शुरुआत
- आप अपने बिजनस की शुरुआत घर में बैठकर एक फोन के साथ कर सकते हैं। हाई स्पीड इंटरनेट कनेक्शन के साथ एक कंप्यूटर या लैपटॉप जरूरी है। अगर बहुत बड़ा ऑर्डर मिलता है तो बैंक से सपोर्ट की जरूरत पड़ सकती है। हालांकि अडवांस पेमेंट वाले कस्मटर भी मिलते हैं।
- अट्रैक्टिव कैटलॉग बनवाएं, जिसमें आपके प्रॉडक्ट की पूरी जानकारी होनी चाहिए। इसकी हार्ड और सॉफ्ट, दोनों कॉपी हों। साथ में सारे जरूरी सर्टिफिकेट भी होने चाहिए।
- आपका बिजनस कार्ड, लेटर हेड इंटरनैशनल कॉरपोरेट इमेज वाला हो। कंपनी का लोगो तैयार कराएं और कंपनी के नाम के आगे देश का नाम जोड़कर लिखें मसलन इंडियन ट्रेडिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड और कॉन्टैक्ट नंबर में इंटरनैशनल कोड यानी +91 जोड़ें।
- इसके बाद अलग-अलग ग्रुप और फोरम से मिलें। फ्री साइट्स को भी देखें, जोकि खरीदनेवालों की अच्छी जानकारी देती हैं। इन साइटस पर पेड लिस्टिंग कराने पर आपको बेहतर रिजल्ट मिलते हैं। ऐसी साइट्स पर लिस्टिंग के लिए कंपनियां 12-15 हजार रुपये सालाना तक चार्ज करती हैं। आप बाइंग हाउस से भी कॉन्टैक्ट कर सकते हैं। ये एक्सपोर्टर को खरीदार से कनेक्ट करने में मदद करते हैं। कुछ प्रमुख साइट्स हैं : www.indiamart.com, www.alibaba.com, www.thomasnet.com, www.exportersindia.com, www.tradeindia.com
- होमवर्क पूरा करने के बाद खुद जाकर मार्केट का जायजा लें। टारगेट मार्केट, कंस्यूमर और उनकी जरूरतों को निजी तौर पर जानने के लिए वहां जाना बेहतर है। वहां आप अपने संभावित खरीदारों या सप्लायर्स के साथ मीटिंग करें और प्रॉडक्ट बेचने व खरीदनेवाले स्टोर्स में घूमें। अपने कॉम्पिटीटर की कीमतों का जायजा लें। उसी के मुताबिक कीमत तय करें। अपने एक्सपोर्ट या इम्पोर्ट मार्केट की जियोग्रफी और भाषा को भी थोड़ा जान लें तो बेहतर है।
- विदेशों में अपना प्रॉडक्ट बेचने के इच्छुक लोकल सप्लायर्स से संपर्क करें और उन्हें भरोसा दिलाएं कि आपके विदेशों में कॉन्टैक्ट हैं और आप उनके एक्सपोर्ट एजेंट हो सकते हैं। आप उनके तमाम पेपरवर्क, शिपिंग, कस्टम और फॉरेन डिस्ट्रिब्यूशन की जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं।
नोट : अपनी ताकत और कमजोरियों को पहचानें। मौके और खतरों पर भी गौर करें।
कॉन्टैक्ट्स और कागजात जरूरी
- अपने टारगेट मुल्क के कानूनों को ध्यान में रखते हुए लाइसेंस, एक्सपोर्ट परमिट आदि की जरूरत होती है। इंडस्ट्री से जुड़े लोगों के अलावा संबंधित एक्सपोर्ट अथॉरिटी इस बारे में जानकारी दे सकते हैं।
- आपको ट्रेडिंग और डिलिवरी की शर्तों, इंटरनैशनल पेमेंट के तरीकों, अंतरराष्ट्रीय व्यापार मूल्यों को समझना चाहिए और ऐसी शर्तें चुननी चाहिए, जो फायदेमंद हों। इसके बाद आप कंपनी का माल एक्सपोर्ट या इम्पोर्ट करने के लिए लीगल अग्रीमेंट करेंगे।
- अब आपके निर्माता और खरीदार दोनों के साथ कॉन्ट्रैक्ट हैं और आप काम शुरू करने के लिए तैयार हैं।
- इस बिजनेस में कॉन्टैक्ट्स बहुत अहम हैं। कॉन्टैक्ट्स पाने के लिए दूसरे देशों के कॉन्स्युलेट्स होते हैं, जिनमें कमर्शल अटैची होते हैं। इनका काम यहां अपने देशों के कमर्शल इंस्टिट्यूशंस के आउटलेट्स स्थापित करना है। ये अटैची अपने देशों के इंपोर्ट-एक्सपोर्ट एंटरप्राइज ढूंढने में मदद कर सकते हैं। ज्यादा जानकारी के लिए देखें : india. gov.in/overseas/embassies
- दूसरे देशों में मौजूद भारतीय दूतावास भी कॉन्टैक्ट्स हासिल करने और उनकी जांच का जरिया हो सकते हैं। यहां से आप किसी विदेशी कंपनी की साख और माली हालत का जायजा ले सकते हैं।
- जिन शहरों से बिजनस शुरू करना चाहते हैं, वहां के कॉन्स्युलेट्स, दूतावासों और चैंबर्स ऑफ कॉमर्स से अनुरोध करें कि वे अपने मासिक बुलेटिन में आपका नोटिस छापें। जिन कंपनियों के नाम आपको मिलें, उन्हें मेल करें।
- जब आप विदेशी कंपनियों के साथ बातचीत शुरू करें तो उनके सेल्स रिप्रजेंटेटिव्स से भी बेहतर संबंध बनाने पर ध्यान दें।
- एक्सपोर्ट क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया कई तरह की सेवाएं देती है, जैसे : गुड्स और सर्विसेज के एक्सपोर्ट में नुकसान होने पर क्रेडिट रिस्क इंश्योरेंस को मुहैया कराना। बैंकों और फाइनैंशल इंस्टिट्यूशंस को गारंटी मुहैया कराना ताकि वे एक्सपोर्टर्स को बेहतर सेवाएं दे सकें। विदेश में लोन के हिस्सेदार के तौर पर जॉइंट वेंचर बनाने वाली भारतीय कंपनियों को ओवरसीज इनवेस्टमेंट इंश्योरेंस मुहैया कराना।
यह है सबसे खास : इंपोर्टर-एक्सपोर्टर कोड का मतलब है एक्सपोर्टर या इंपोर्टर के तौर पर केंद्र सरकार से मान्यता लेने के लिए आईईसी लेना। इसे विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी), नई दिल्ली से 1,000 रुपये की ऐप्लिकेशन फीस देकर हासिल किया जा सकता है। यह फीस पेऑर्डर या डिमांड ड्राफ्ट के जरिए जमा की जानी चाहिए, जोकि जोनल जॉइंट डीजीएफटी के फेवर में बना होना चाहिए। यह फॉर्म www.dgft.gov.in पर ऑनलाइन भी भर सकते हैं। यह फॉर्म भरने के लिए पैन कार्ड होना अनिवार्य है। ध्यान रखें कि आईईसी कोड तीन तरह के होते हैं : मर्चेंट एक्सपोर्टर, मैन्युफैक्चर एक्सपोर्टर और मर्चेंट एक्सपोर्टर/मैन्युफैक्चर एक्सपोर्टर। आप ध्यान से अपना कोड चुनें क्योंकि उसी के मुताबिक आप सरकार की अलग-अलग स्कीम का फायदा उठा सकते हैं।
नोट : कुछ खास सेंसिटिव प्रॉडक्ट्स, जैसे दवाएं, शराब, केमिकल, हथियारों के अलावा कुछ खास फूड आइटम और कपड़ों के एक्सपोर्ट या इंपोर्ट में आपको लाइसेंस की जरूरत पड़ सकती है। इसके लिए डीजीएफटी से पूरी जानकारी जरूर हासिल कर लें। अलग-अलग देशों के बहुत सारे एक्सपोर्ट सर्टिफिकेट की भी जरूरत होती है जैसे कि यूएस के लिए एएसटीएम और यूरोप के लिए ईएन सर्टिफिकेट की जरूरत होती है। हमारे देश में एनएबीएल एक्रेडिट लैब्स हैं, जो ये सर्टिफिकेट मुहैया कराती हैं।
मिलना-जुलना है बहुत जरूरी
- मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स के तहत स्पेशल काउंसिल्स होती हैं, जोकि खासतौर पर एक्सपोर्ट पर ही फोकस करती हैं। ये काउंसिल अलग-अलग देशों में बायर-सेलर मीट्स कराती हैं। ये एक्सपोर्ट्स को इंटरनैशनल लेवल के ट्रेड फेयर्स में हिस्सा लेने का मौका देती हैं। ये ट्रांसलेटर्स, रहने और खाने का इंतजाम, लोकल ट्रैवल आदि का बेहद कम खर्चे पर इंतजाम कराते हैं। इसके लिए काउंसिल का मेंबर बनना जरूरी है, जिसके लिए सालाना फीस ली जाती है, जोकि काफी कम है। ज्यादा जानकारी के लिए देखें : commerce.nic.in
- इसी तरह, दूसरे देशों में लगने वाली एग्जीबिशन की भी जानकारी इंटरनेट से लें। मसलन चीन और साउथ कोरिया में लगनेवाली इलेक्ट्रॉनिक गुड्स की एग्जबीनिशन की जानकारी hktdc.com, globalsources.com से ले सकते हैं।
बैंक चुनें, सावधानी से
- आपको ऐसे बैंक का चुनाव करना है, जो आपका इंटरनैशनल कारोबार हैंडल कर सके। एक फॉरन करंसी अकाउंट खोलें। हमारे देश में यूएसडी यानी अमेरिकी डॉलर अकाउंट खोलना होता है क्योंकि अमेरिकी डॉलर दुनिया भर में चलते हैं। बैंक कैश मुहैया कराने के अलावा क्रेडिट मैनेजर का भी काम करेगा। बैंक जरूरत पड़ने पर आपके सौदों के सिलसिले में अहम सलाह और रेफरेंस भी देगा।
- बैंक से लेटर ऑफ क्रेडिट इश्यू कराएं। यह एक अहम दस्तावेज है, जो तय करता है कि जिसे आप सामान एक्सपोर्ट कर रहे हैं वह इसकी कीमत अदा कर सकेगा। ऐसा तब ही होता है जब पूरा माल बिना किसी अडवांस लिए एक्सपोर्ट किया जाता है। इसे रद्द नहीं किया जा सकता। इससे यह भी तय हो जाता है कि खरीदने वाला आपका ऑर्डर किसी भी समय कैंसल नहीं कर सकता।
- नए एक्सपोर्टस के लिए खासतौर पर क्रेडिट इंश्योरेंस एक अहम इंस्ट्रूमेंट है, जो आपको खरीदार के डिफॉल्ट या दिवालियेपन से पैदा होने वाले जोखिम से बचाता हैं। यह इंश्योरेंस तीन तरह की सेवाएं देता है : जोखिम से बचाव, कर्ज की वसूली और दावों का भुगतान।
- क्लाइंट की डिटेल्स जांचने के लिए आप डीएनबी जैसी रेटिंग एजेंसी से भी रेटिंग सर्टिफिकेट ले सकते हैं। इस रेटिंग आधार पर ही इंश्योरेंस का प्रीमियम तय होता है।
ऑर्डर को कराएं अप्रूव
- एक्सपोर्ट में मार्केट के ट्रेंड और मिजाज को समझना बहुत जरूरी है। जो पैकेजिंग एक देश में कामयाब हो, वह दूसरे देश में नाकाम हो सकती है। अगर आप कोई एक प्रॉडक्ट 3-4 मार्केट में एक्सपोर्ट कर रहे हैं, तो आपको उन सभी के ट्रेंड को अलग-अलग समझना होगा। उन मार्केट में प्रतिबंधित इंग्रेडिएंट्स और लोकल ग्रेड्स के हिसाब से अपने प्रॉडक्ट में बदलाव भी करना होगा।
- एक बार ऑर्डर फाइनल होने के बाद आपको खरीदार को प्रोफॉर्मा इनवॉयस भेजना होता है। इसमें खरीदार की पूरी डिटेल्स, डिलिवरी की डेट, गुड्स की डिटेल्स, कीमत और नियम लिखे होते हैं। यह बेहद बेसिक पर अहम डॉक्युमेंट है। आप इसमें पेमेंट के नियमों का भी चुनाव कर सकते हैं। आमतौर पर 30 एडवांस और 70 फीसदी डिलिवरी के वक्त पेमेंट का नियम सही रहता है।
- इंपोर्ट में हो सके तो पहले सैंपल मंगवाएं और बाद में बल्क ऑर्डर दें। एक्सपोर्ट में आपको टाइम पर डिलिवर करना है, इसलिए अपने खरीदार से प्रॉडक्ट को अप्रूव करा लें। अगर खरीदार बड़ा है तो उसकी एजेंसी होगी, जो आपकी फैक्टरी या प्रॉडक्शन हाउस आकर सामान देखेगी। अगर खरीदार बड़ा नहीं है तो आप ईमेल से फोटो भेज सकते हैं या कूरियर से सैंपल भेजकर अप्रूव करा सकते हैं।
- अप्रूव होने के बाद आप खरीदार के नॉमिनेटिड शिपर को कॉन्टैक्ट करें ताकि वह शिपमेंट के लिए कंटेनर मुहैया कराए। अगर खरीदार का शिपर नहीं है तो आप शिपर तलाश कर खरीदार से अप्रूवल ले लें।
ट्रांसपोर्टेशन का इंतजाम
- एक्सपोर्ट-इंपोर्ट में ट्रांसपोर्ट बहुत अहम भूमिका निभाता है। आपको एफओबी (फ्रेट ऑन बोर्ड) यानी गोदाम से लेकर माल के लोड होने तक की कीमत कोट करनी होगी क्योंकि इंडिया में बहुत सारे कस्टमर को वेट (समुद्री) पोर्ट की जरूरत होती है। कीमत कोट करते वक्त सावधानी बरतें क्योंकि आमतौर पर लोग वेट पोर्ट की कीमत नहीं लिखते। कंटेनर को लोड कराने के लिए आईसीडी (तुगलकाबाद, लोनी, दादरी) के साथ रजिस्ट्रेशन करना होगा। ध्यान रखें कि कंटेनेर आपके नाम पर बुक होता है इसलिए आपको एक सिक्युरिटी अमाउंट डिपॉजिट करना होगा और जब तक कंटेनर तय जगह पर नहीं पहुंचकर वहां से रिलीज़ नहीं होगा, जिम्मेदारी आप पर होगी। अगर सारी चीजें सही हैं तो कंटेनर खरीदार की ओर निकल जाएगा। अलग-अलग देशों के लिए सेलिंग टाइम अलग है जैसे कि यूएस के लिए 30 दिन, साउथ अफ्रीका के लिए 20-25 दिन, यूरोप के लिए 20-25 दिन लगते हैं।
- अगर प्लेन से माल भेजना है तो अलग-अलग फ्लाइट के रेट कंपेयर करें। फॉरवर्डिंग एजेंट की मदद लें। ये एजेंट सामान को भेजने में आने वाली मुश्किलों को आसान करते हैं और इसके बदले चार्ज करते हैं।
- ध्यान रखें कि यह पूरी प्लानिंग से होता है। आपको अपना शिपमेंट टाइम पर देना है, इसलिए आपको कंटेनर की बुकिंग पहले से करके रखनी होगी। शिपिंग की डेट भी फिक्स होती है, जिसे आप मिस नहीं कर सकते क्योंकि इसका पूरा एक साइकल होता है।
विवाद होने पर
- माल रिजेक्ट होने पर सबसे पहले आपको अपने खरीदार से बात करके रकम कुछ कम करके मामला हल करने की कोशिश करनी चाहिए।
- विवाद चाहें कैसा भी हो उसे हल करने के लिए हर एंबेसी में एक अलग कमर्शल रिड्रेसल विंग होता है।
- वह ऐसे मामले को सुलझाने में मदद करता है।
- विवाद से होने वाले नुकसान से बचने के लिए सामान का इंश्योरेंस कराना चाहिए। सरकार भी अलग-अलग स्कीमों के जरिए इंश्योरेंस कराती है।

क्या खासियतें जरूरी
- मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेडिंग से जुड़ी बेसिक जानकारी
- पूरे प्रॉसेस को अच्छी तरह मैनेज करने की आर्ट
- अपनी बातों और बर्ताव से दूसरों का भरोसा जीतने की क्वॉलिटी
- अपना माल बेचने का हुनर होना
- प्रॉडक्ट की क्वॉलिटी से समझौता न करना
- वक्त पर डिलिवरी सुनिश्चित कराना
क्या करें
- अपने टारगेट मुल्क के कायदों को फॉलो करें।
- डिलिवरी शेड्यूल और पेमेंट शेड्यूल को लेकर साफ अग्रीमेंट बनाएं।
- अपने प्रॉडक्ट का इंश्योरेंस कराएं।
- अपने प्रॉडक्शन और क्वॉलिटी को लेकर बढ़ चढ़ कर कमिटमेंट न करें।
- एक साथ कई के बजाय किसी एक प्रोडक्ट पर फोकस करें।
क्या न करें
1. मार्केट में घुसने से पहले उसकी अच्छी तरह जानकारी न लेना
2. अधूरे या सही कागजात न होना
3. सरकारी स्कीमों की जानकारी न होना
4. सरकारी महकमों में सही ढंग से रजिस्ट्रेशन न कराना
5. इंस्पेक्शन प्रोसेस को फॉलो न करना
6. किसी एक ही खरीदार या सप्लायर पर डिपेंड रहना


पहले 5-7 साल जमकर किया स्ट्रगल


आज से 12 साल पीछे देखती हूं तो लगता है कि पहले के मुकाबले एक्सपोर्ट अब बहुत आसान हो गया है। फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने के बाद करीब 6 साल नौकरी की और उसके बाद मैंने कुछ अपना करने की सोची। पहले साड़ी और सूट्स के लोकल मार्केट में काम किया लेकिन वहां पेमेंट का बहुत पंगा था। फिर मैंने एक्सपोर्ट में आने की सोची। मैंने इंटरनेट की मदद ली और मिडल ईस्ट के देशों के फैशन पर फोकस किया। कुल 4.5 लाख रुपये से शुरुआत की। अपने कुछ सैंपल तैयार कराए और फिर उन्हें लेकर कुवैत और दुबई गई। वहां की एग्जीबिशन में हिस्सा लिया। पहला ऑर्डर बहुत छोटा-सा था, सिर्फ 70-80 पीस का। पर लगा कि चलो शुरूआत तो हुई। उस वक्त कपड़ा लाने से लेकर डिजाइनिंग तक का काम मैं खुद करती थी। फिर धीरे-धीरे और बायर्स आने लगे। इसी तरह एक देश से दूसरे देश तक के खरीदार अप्रोच करने लगे। आज एक ठीक-ठीक टीम और कारीगरों की बड़ी संख्या मेरे साथ काम कर रही है। शुरूआत में सबसे ज्यादा दिक्कत आई डॉक्युमेंट्स पूरे करने की। मेरा शिपमेंट तैयार था और मैं डीएम के ऑफिस में बैठी थी अपना पैनकार्ड लेने के लिए। उस वक्त यह इतनी आसानी से नहीं मिलता था। इसी तरह मैंने अपना आईईसी कोड भी खुद ऑफिस में बैठकर निकलवाया। फिर पेमेंट की दिक्कत आई। मिडिएटर पैसा लेकर भाग गए तो कुछ माल लेकर गायब हो गए। शुरुआती 5-7 साल काफी स्ट्रगल किया। फिर धीरे-धीरे 10 मशीनों से शुरू किया गया काम आज ठीक लेवल पर पहुंच गया है। एक्सपोर्ट में आने के इच्छुक लोगों को मेरी सलाह है कि डॉक्युमेंट्स, अकाउंट्स और पेमेंट के नियम व शर्तों पर खास तौर पर गौर करें। 

- शालिनी बत्रा, गारमेंट एक्सपोर्टर