Sunday, April 21, 2013

व्रत में सेहत से न करें खेल


मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोगों से पीडि़त लोगों को नवरात्र में व्रत रखने का आस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण फैसला काफी सोच-विचार कर लेना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि खानपान व दिनचर्या में लापरवाही बरतने से ऐसे लोग कई स्वास्थ्य समस्याओं के शिकार हो सकते हैं। इन समस्याओं को कैसे दें शिकस्त..
ऐलोपैथी का दृष्टिकोण
मधुमेह से ग्रस्त रोगियों को नवरात्र में व्रत रखने का महत्वपूर्ण फैसला काफी सोच-विचार कर और अपने डॉक्टर से परामर्श के बाद ही लेना चाहिए। हालाकि व्रत रखने का फैसला निजी स्तर पर आस्था से जुड़ा है, लेकिन इस सदर्भ में मधुमेह पीडि़तों का मामला गैर मधुमेहग्रस्त व्यक्तियों से अलग है। ऐसा इसलिए, क्योंकि लापरवाही बरतने पर व्रत के दौरान मधुमेह रोगियों के समक्ष कई जटिलताएं और जोखिम पैदा हो सकते हैं।
कौन रखें व्रत और कौन नहीं
-ऐसे मधुमेह रोगी, जिनका दवाओं से मधुमेह नियत्रित है, वे कुछ सजगताएं बरतकर व्रत रख सकते हैं।
-ऐसे व्यक्ति जिन्होंने खान-पान व व्यायाम से मधुमेह को नियत्रण में रखा है, वे भी व्रत रख सकते हैं।
-जिन लोगों का ब्लड शुगर लेबल बमुश्किल नियत्रण में रहता है, उन्हें व्रत नहीं रखना चाहिए।
-इंसुलिन लेने वाले मधुमेह रोगियों को व्रत नहीं रखना चाहिए।
ऐसे करें नियत्रित
कुछ सुझावों पर अमल कर व्रत के दौरान मधुमेह का प्रबधन या नियत्रण किया जा सकता है। व्रत के दौरान लापरवाही बरतने से मधुमेह रोगियों को हाइपोग्लाइसीमिया और हाई ब्लड शुगर जैसी कई परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। बावजूद इसके कुछ सुझावों पर अमल कर इन परेशानियों को नियत्रित किया जा सकता है
थोड़ी मात्रा में खाएं
मधुमेह से ग्रस्त रोगियों को थोड़ी-थोड़ी मात्रा में एक निश्चित अंतराल जैसे हर तीन या चार घटे पर कुछ न कुछ स्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थ खाने चाहिए। उन्हें खाने के मामले में लबा अंतराल नहीं रखना चाहिए और भूख से अधिक खाद्य पदार्थ ग्रहण नहींकरने चाहिए। जो लोग मधुमेह से ग्रस्त हैं, उनके लिए महत्वपूर्ण बात यह है कि खानपान के प्रति लापरवाही न बरतें। जो व्यक्ति डाइबिटीज से सबधित दवाएं ले रहे हैं, उन्हें तो खानपान में लबा अंतराल बिल्कुल नहीं रखना चाहिए। अगर इस रोग से ग्रस्त व्यक्ति चद घटों के अंतराल पर स्वास्थ्यप्रद आहार लेते रहें, तो इससे उनके ब्लड शुगर का स्तर तेजी से बढ़ नहींसकेगा।
ऐसा हो खानपान
व्रत में मधुमेह से ग्रस्त व्यक्ति लौकी, कूटू के आटे से निर्मित रोटी कद्दू की सब्जी के साथ खा सकते हैं। कूटू का चीला, सावा का चावल खीरे के रायते के साथ, ताजा पनीर, दूध, मक्खन और नारियल का पानी भी इस रोग से पाीडि़त व्रत रखने वाले लोगों के लिए लाभप्रद है। एक नियमित अंतराल पर फल लें। स्नैक्स में बादाम और रोस्टेड मखाना भी ले सकते हैं।
शुगर की जाच: मधुमेह से ग्रस्त उपवास रखने वाले लोगों को दिन में कई बार रक्त में शुगर के स्तर की जाच करनी चाहिए।
तरल पदार्थ लें
मधुमेह से ग्रस्त लोगों को शरीर में पानी की कमी (डीहाइड्रेशन) होने का खतरा कहीं ज्यादा होता है। ब्लड शुगर के स्तर के बढ़े होने से शरीर में पानी की कमी हो जाती है। इसलिए तरल पदार्थ (जैसे नारियल पानी, नीबू पानी और म_ा) पर्याप्त मात्रा में लें। इन्हें लेने से डीहाइड्रेशन की आशका खत्म हो जाती है।
डीहाइड्रेशन के लक्षण
-बहुत ज्यादा प्यास महसूस करना।
-भूख न लगना, थकान या कमजोरी महसूस करना।
-चिड़चिड़ापन।
-तेज सास चलना या फिर सास लेने में परेशानी महसूस करना।
उपर्युक्त सभी लक्षण शरीर में पानी की कमी (डीहाइड्रेशन) से सबधित हैं। इन लक्षणों के प्रकट होते ही सचेत हो जाएं और पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ लें।
जमकर आहार ग्रहण न करें
एक बार की सिटिंग में जमकर भोजन करने से बचें। अनेक लोग हैं, जो नवरात्र व्रत के दौरान खाने-पीने पर नियत्रण नहीं रख पाते। कुछ लोग तो सामान्य दिनों की तुलना में व्रत के दौरान कुछ ज्यादा ही खाते-पीते हैं। जैसे वे तले हुए आलू, मखाने की खीर, साबूदाना की खिचड़ी व पकौड़ा आदि खाते हैं। कुछ खाद्य पदार्थ जैसे साबूदाना खिचड़ी और आलू टिक्की खाने से परहेज करें, क्योंकि इन खाद्य पदार्र्थो में रेशा या फाइबर कम और वसा अधिक मात्रा में पायी जाती है।
डॉक्टर का परामर्श
जब आप उपवास करने का सकल्प लेती/ लेते हैं, तो अपने डॉक्टर से परामर्श जरूर लें। डॉक्टर व्रत के दौरान ब्लडशुगर को नियत्रित करने के सदर्भ में आपको आवश्यक परामर्श देंगे। इसके अलावा वह आपकी दवा या इंसुलिन की डोज को भी नए सिरे से निर्धारित कर सकते हैं।
आयुर्वेद के आइने में
आध्यात्मिक लाभ के अलावा उपवास रखने से शरीर की शुद्धि भी होती है, लेकिन जो लोग मधुमेह उच्च रक्तचाप (हाई ब्लडप्रेशर), हृदय रोग या खून की कमी (एनीमिया) जैसे रोगों से पीडि़त हैं, उन्हें नवरात्र में व्रत रखते समय खानपान में विशेष सजगताएं बरतने की जरूरत है।
भारी (गरिष्ठ) आहार से बचें
नवरात्र के दौरान उपवास रखने वाले लोग अक्सर तला हुआ आहार ग्रहण करते हैं। जैसे आलू, कूटू या सिघाड़े के आटे के पकौड़े, साबूदाना की कचौड़ी, साबूदाना खीर और टिक्की आदि खाते हैं। लगातार नौ दिनों तक गरिष्ठ भोजन करने से कई प्रकार के रोग होने का खतरा बढ़ जाता है। ज्यादा घटे खाली पेट न रहें
मधुमेह और उच्च रक्तचाप से पीडि़त रोगियों को अधिक समय तक भूखा नहीं रहना चाहिए। यदि वे पेट को खाली रखते हैं, तो प्रत्येक दो से तीन घटे के बाद थोड़ी-थोड़ी मात्रा में सुपाच्य भोजन करते रहना चाहिए। मधुमेह के रोगियों के लिए लौकी, कद्दू, तुरई जैसी सब्जिया या उनका सूप लेना चाहिए। पपीता, सेब, मौसमी या मुसम्मी, नाशपाती व बादाम का सेवन लाभप्रद है। चीनी (शुगर) और इससे निर्मित खाद्य पदार्र्थो और मीठे फलों जैसे केला आदि का सेवन न करें।
नमक के अधिक सेवन से परहेज
उच्च रक्तचाप से पीडि़त लोगों को विभिन्न प्रकार की नमकीन, आलू के चिप्स और अन्य नमकयुक्त खाद्य पदार्र्थो के अधिक सेवन से परहेज करना चाहिए। चाय, कॉफी अचार, मिर्च और तली हुई खाद्य वस्तुएं नहीं खानी चाहिए। खीरा, ककड़ी, केला, लस्सी और ताजा फलों का सेवन उच्च रक्तचाप से पीडि़त व्यक्तियों के लिए लाभप्रद है।
निर्जल उपवास न करें
मधुमेह और उच्च रक्तचाप से पीडि़त व्यक्तियों को निर्जल उपवास कदापि नहीं करना चाहिए। कुछ लोग पूरा दिन भूखा रहकर रात को हाई कैलोरी युक्त भोजन अधिक मात्रा में करते हैं। यह भोजन पूर्ण रूप से जल्दी नहीं पच पाता। इस स्थिति में अपच या बदहजमी की शिकायत पैदा हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप आतों में एक विशेष पदार्थ उत्पन्न होता है। इस पदार्थ को आयुर्वेद में आम(आंव) कहते हैं। अधिक मात्रा में आम बनने से शरीर में अनेक प्रकार के रोगों के पैदा होने की आशकाएं बढ़ जाती हैं। कुछ लोग कम मात्रा में भोजन करके या पूर्ण रूप से भोजन त्यागकर उपवास रखते हैं। ऐसे लोगों के शरीर में धातुओं का क्षय, कमजोरी, थकान व अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न हो सकते हैं।
ये तरीका ठीक नहीं
कुछ लोग नवरात्र का व्रत वजन कम करने के लिए भी करते हैं। इसलिए वे पानी या तरल पदार्थ सूप या जूस पीते हैं या फिर केवल एक बार भोजन करते हैं। ऐसा करने से शरीर का न केवल मेटाबॉलिज्म प्रभावित होता है, बल्कि उनके शरीर में वसा (फैट) की मात्रा भी बढ़ती है। अधिक समय तक भूखा रहने से एसीडिटी की समस्या भी पैदा हो जाती है। इस कारण ब्लडप्रेशर भी अनियत्रित हो जाता है और ब्लडशुगर के कम होने की आशकाएं बढ़ जाती हैं। इसी कारण व्रत के दौरान हर दो-तीन घटे पर फल, सलाद, जूस आदि लेते रहना चाहिए।
इन बातों पर न करें अमल
कुछ लोग नवरात्र में दिन भर कुछ न कुछ खाते रहते हैं। कई प्रकार के पैकेट फूड्स, फास्ट फूड्स, स्पेशल नवरात्र थाली और अनेक प्रकार के स्नैक्स बाजार में उपलब्ध होने के कारण नवरात्र में दिन भर खाने का चलन बढ़ गया है। इसलिए खान-पान पर सयम रखना जरूरी है, तभी उपवास का सही लाभ मिलता है। इसके अतिरिक्त नवरात्र के दौरान सतुलित भोजन करना अत्यत आवश्यक है।
ध्यान दें
-जो लोग किसी गभीर रोग से पीडि़त हैं, उन्हें उपवास नहीं करना चाहिए। जैसे हृदय, किडनी व सास से सबधित रोग और लिवर से सबधित बीमारी आदि।
-गर्भवती महिलाओं और बच्चे को स्तनपान कराने वाली माओं को भी उपवास नहीं रखना चाहिए।
डॉ.प्रताप चौहान आयुर्वेद चिकित्सक फरीदाबाद (हरियाणा)
प्राकृतिक चिकित्सा का नजरिया
प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार रोग का एकमात्र कारण शरीर के किसी अंग में सचित विकार होते हैं। रोग का कारण उस सचित विकार की सड़ान (फर्मेन्टेशन) है। ऋतु या मौसम के परिवर्तन के दौरान फर्मेन्टेशन की यह प्रक्रिया तेज हो जाती है। इसीलिए हमारे ऋषियों ने साल के दो ऋतु परिवर्तनों यानी दशहरे की नवरात्र और रामनवमी की नवरात्र में उपवास करने का नियम बताया ताकि शरीर के विकार दूर हो सकें। इसके अलावा ऋषियों ने नवरात्र के दौरान आत्म-बल बढ़ाने के लिए उपासना का भी विधान बताया।
सच तो यह है कि उपवास को सही ढंग से करने पर शरीर निरोग होता है और गलत ढंग से करने से और भी बीमार होता है। प्रस्तुत हैं इस सदर्भ में कुछ सार्थक सुझाव
-नवरात्र में उपवास के दौरान दिन में तीन या चार बार नीबू-शहद का गुनगुना शर्बत पीना लाभप्रद है।
-उपवास रखने वाले व्यक्तियों को कूटू के आटे की पूडिय़ा, पराठे और पकोड़े आदि तले हुए खाद्य पदार्थ नहीं खाने चाहिए।
-सब्जियों का रस या सूप और फलों का जूस या सूप लेना लाभप्रद है।
-दिन में कम से कम चार से पाच लीटर शुद्ध जल का सेवन आवश्यक है।
-उपवास के दौरान कठोर श्रम या कठोर व्यायाम कदापि न करें।
-कब्ज के रोगी उपवास के दौरान त्रिफला चूर्ण का सेवन कर सकते हैं।
-उपवास तोड़ते वक्त अत्यधिक सावधानी रखें। भारी भोजन से उपवास न तोड़ें।
-उपवास के दौरान वायु के रोगियों (पेट में गैस बनने की समस्या से ग्रस्त व्यक्ति) को कच्ची छोटी हरड़ (जंगहरड़) को सुबह-शाम कम से कम दो बार चूसना चाहिए।
-कफ के रोगियों को कच्ची अदरक चूसनी चाहिए।
-एसीडिटी के रोगियों को गरी का पानी या गरी चूसना चाहिए।

कैसा हो नवदंपती का बेडरूम


1. नवदंपती का बेडरूम सदा दक्षिण-पश्चिम दिशा स्थित नैऋत्य कोण में होना चाहिए। अगर ऐसा संभव न हो तो दक्षिण या पश्चिम दिशा में भी बेडरूम बनाया जा सकता है।
2. इस बात का ध्यान रखें कि नवदंपती का बेडरूम पूर्वोत्तर दिशा में न हो क्योंकि इस दिशा में जल तत्व की प्रमुखता रहती है और जल के समान शीतल गुणों से परिपूर्ण यह दिशा वंश वृद्धि के अनुकूल नहीं है।
3. नवदंपती के बेडरूम में कोई भी एक्वेरियम या फाउंटेन आदि न रखें।
4. इस बात का ध्यान रखें कि सोते समय सिरहाना कभी भी उत्तर दिशा की ओर न हो क्योंकि ऐसा होने पर समान चुंबकीय ध्रुव परस्पर विकर्षण रखते हैं। इससे सोते समय नींद में बाधा आ सकती है।
5. बेडरूम की दीवारों पर सदा मन को प्रफुल्लित करने वाले हलके, उज्ज्वल एवं इस प्रकार के रंगों का प्रयोग करे, जो पति-पत्नी दोनों के मन को भाते हों। यहां कभी भी फीके रंगों का इस्तेमाल न करे।
6. नवविवाहित दंपती के कमरे में काला, गहरा सलेटी व गहरा भूरा रंग नहीं होना चाहिए। बल्कि हलका गुलाबी, हलका पीला, नारंगी, लाल और बैगनी रंगों का प्रयोग नित नई स्फूर्ति प्रदान करने की क्षमता रखता है।
7. बेडरूम में सजावट के लिए उगता हुआ सूरज, बाग-बगीचे, खेलते हुए बच्चे या फूलों आदि के पोस्टर लगाने चाहिए।
8. नवदंपती के बेडरूम में हलके वुडवर्क व फर्नीचरों का प्रयोग करे।
9. पति-पत्नी का फोटोग्राफ कमरे के दक्षिण दिशा की दीवार पर लगाने से उनमें प्रेम, सद्भावना व एक-दूसरे के प्रति उत्तरदायित्व की भावना में वृद्धि होती है।
ृ10. बेड के सामने कभी कोई दर्पण न लगाएं, इससे दांपत्य जीवन में समस्याएं आ सकती है।
11. अगर बेडरूम में शीशा लगाना ही हो तो उसे हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा की दीवार पर लगाना चाहिए। यदि किसी कारण से आपके कमरे की सेटिंग कुछ इस प्रकार से बनती हो, जिसमें ड्रेसिंग टेबल बेड के सामने पड़ता हो तो रात को सोने से पहले उस पर कोई चादर या पर्दा डाल दें।
12. यदि बेडरूम में किसी प्रकार के शो केस, कैबिनेट, कबर्ड आदि की आवश्यकता होती है तो स्टोरेज के लिए बनाई गई हर ऐसी चीज को कमरे की दक्षिण या पश्चिम दिशा की दीवार के साथ रखें।
13. युवा दंपती के कमरे की पूर्व या उत्तर दिशा में एक या इससे अधिक एवं बड़ी से बड़ी खिड़कियां होनी चाहिए। जिससे कि उन्हे पूर्वोत्तर की दिशाओं से भवन में प्रवेश करने वाली सकारात्मक ऊर्जा का लाभ मिल सके। इन खिड़कियों पर बहुत हलके रंग क्रीम, हलका पीला, हलका हरा या सफेद रंग के पर्दे प्रयोग करने चाहिए।
14. आजकल लगभग हर कमरे के साथ अटैच्ड टॉयलेट होता है। ऐसे में यह प्रयास करे कि टॉयलेट का दरवाजा हर समय बंद रहे व सीट या कमोड का ढक्कन हर समय ढंका रहे।
15. अपने बेड को कमरे में कुछ इस तरह व्यवस्थित करे कि जिससे सोते समय आपके पांवों के ठीक सामने या सिर के पीछे कोई दरवाजा न हो। पांवों के सामने या सिर के पीछे टॉयलेट का दरवाजा होने से दंपती के कमरे में नकारात्मक ऊर्जा तरंगों की वृद्धि होती है और इससे आत्मीयता में कमी आती है। साथ ही, संबंधों में कड़वाहट भी आ सकती है।
16. बेड की साइड टेबल पर यदि परस्पर प्रेम के प्रतीक फेंगशुई के लवबर्ड का जोड़ा या स्फटिक की बनी गोल आकृति एक जोड़े के रूप में रखी जाए तो पति-पत्नी में प्रेम का बंधन और भी अधिक मजबूत होगा। उनकी गृहस्थी सुख-समृद्धि, आपसी प्रेम व खुशहाली से परिपूर्ण रहेगी।




डेंगू के इलाज में मददगार होता है विटामिन ई


डेंगू के मरीजों को यदि उपचार के साथ शुरुआत से विटामिन ई दवा भी दी जाए तो उनमें न केवल प्लेटलेट्स तेजी से बढ़ती हैं बल्कि रक्त में प्लेटलेट्स की संख्या में हो रही कमी पर भी काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है।
किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो.एके वैश्य द्वारा किया गया यह शोध हाल में इंग्लैंड के इंटरनेशनल मेडिकल जर्नल द अनॉल्स ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन एंड पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित हुआ है। डॉ. वैश्य बताते हैं कि विटामिन ई में एंटी ऑक्सीडेंट होता है। डेंगू बुखार में प्लेटलेट्स की संख्या तेजी से कम होती है जिससे कई तरह की गंभीर समस्याएं हो जाती हैं। अकसर अंदरूनी रक्तस्राव होने से मरीज की मृत्यु तक हो जाती है। ऐसे में मरीज को प्लेटलेट्स चढ़ाना एकमात्र उपचार रह जाता है।
उन्होंने बताया कि केजीएमयू में डेंगू के 66 मरीजों को दो भाग में विभाजित कर अध्ययन किया गया। 33 मरीजों के एक समूह को उपचार के साथ 400 मिग्रा. की विटामिन ई की एक टैबलेट भी दी गई जबकि दूसरे समूह को केवल जरूरी दवाएं ही दी गई। जिन मरीजों को दवाओं के साथ विटामिन ई की टैबलेट भी दी गई, उनमें 64 फीसद मरीजो में एक हफ्ते में प्लेटलेट्स की संख्या एक लाख तक बढ़ गई। दूसरी तरफ जिन मरीजों को विटामिन ई नहीं दिया गया उनमें मात्र 39.28 फीसद मरीजों में ही प्लेटलेट्स की संख्या में वृद्धि देखी गई। ऐसे मरीज जिन्हें अन्य दवाओं के साथ विटामिन ई भी दिया गया था एक सप्ताह पश्चात उनमें से मात्र 6 फीसद मरीजों को प्लेटलेट्स चढ़ाने की जरूरत पड़ी। इसके विपरीत जिन मरीजों को विटामिन ई नहीं दिया गया उनमें से 15.15 फीसद मरीजों को प्लेटलेट्स चढ़ाना पड़ा।
डॉ. वैश्य बताते हैं कि मरीजों के दोनों समूहों में शुरुआत में प्लेटलेट्स की संख्या लगभग बराबर थी लेकिन देखा गया जिन मरीजों को विटामिन ई दिया जा रहा था उनमें प्लेटलेट्स की संख्या काफी तेजी से बढ़ी। इस शोध अध्ययन से साफ है कि डेंगू मरीजों में यदि प्लेटलेट्स की संख्या कम हो रही हो तो विटामिन ई देने से न केवल इसकी गिरावट को कम किया जा सकता है बल्कि प्लेटलेट्स की संख्या में तेज वृद्धि भी होती है।



परिवार की ख़ुशहाली के लिए अपनाएं वास्तु


यदि हम वास्तुशास्त्र के नज़रिये से देखने का प्रयास करे तो हम यह पाएंगे कि वास्तु के सिद्धांतों को बनाने एवं समाज द्वारा उनके पालन के पीछे जितने भी उद्देश्य रहे है, उनमें एक अहम बात होती थी कि परिवार के बीच आपसी प्रेम, सद्भावना, अपनापन एवं सम्मान बना रहे।
आज हम चाहे कितने भी आधुनिक क्यों न हो जाएं परंतु निश्चित रूप से एक बात तो कभी न कभी हर किसी के मन में आती होगी कि पुराने ज़माने में परिवार में ़ज्यादा लोग होते थे और आर्थिक साधन बहुत सीमित होते थे। फिर भी परिवार के सभी सदस्यों के बीच बेहद अपनत्व और स्नेह होता था। यदि हम वास्तुशास्त्र के नज़रिये से देखने का प्रयास करे तो हम यह पाएंगे कि वास्तु के सिद्धांतों को बनाने एवं समाज द्वारा उनके पालन के पीछे जितने भी उद्देश्य रहे है, उनमें एक अहम बात होती थी कि परिवार के बीच आपसी प्रेम, सद्भावना, अपनापन एवं सम्मान बना रहे। पहले लोग मकान बनवाते समय वास्तु के सिद्धांतों का ध्यान ज़रूर रखते थे। हालांकि आज के संदर्भ में उन सभी प्राचीन सिद्धांतों को व्यवहार में लाना पूरी तरह संभव नहीं, फिर भी उनमें से ़ज्यादातर बातें तो आज भी प्रासंगिक है। अत: जहां तक संभव हो आप परिवार की खुशहाली के लिए वास्तु सिद्धांतों का पालन करें।
1. यदि आपका भवन केवल एक ही तल वाला हो या फिर अगर किसी मल्टीस्टोरी बिल्डिंग में आपका फ़्लैट हो तो उसके पश्चिमी या फिर दक्षिणी भाग में बुज़ुर्गो एवं हमारे वरिष्ठतम सदस्यों जैसे दादा-दादी या फिर माता-पिता का कमरा होना चाहिए।
2. इसके विपरीत बच्चों के रहने के लिए बाकी सभी दिशाएं उपयुक्त है।
3. यह ध्यान रखें कि परिवार के सभी सदस्यों के बेडरूम में प्राकृतिक प्रकाश की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। ऐसे स्थान केवल तभी मिल सकते है, जब प्रत्येक कमरा आगे-पीछे या खुले स्थान से मिलता हो। यदि प्रकाश की ़ज्यादा व्यवस्था न हो पाए तो खिड़की के साथ रोशनदान ज़रूर बनाएं।
4. प्राकृतिक प्रकाश से सोचने का तरीका सकारात्मक बनता है व किसी के प्रति वैमनस्य की भावना नहीं पनपती।
5. पूजा-पाठ, जप, कथा, प्रवचन एवं ऐसे ही अन्य धार्मिक कृत्यों के लिए यों तो संपूर्ण पूर्व दिशा उत्तम है, फिर भी ऐसे सभी शुद्ध कार्यो के लिए पूर्वोत्तर दिशा सर्वोत्तम है।
6. परिवार के सभी बड़े सदस्यों को चाहिए कि वे सभी बच्चों व अन्य सदस्यों में ऐसी परंपरा विकसित करे कि चाहे थोड़े ही क्षणों के लिए सही, परंतु सभी लोग भगवान के समक्ष नतमस्तक होना सीखें। इससे सभी के मन को शांति मिलती है और अहंकार की भावना से ऊपर उठकर सभी लोग परस्पर एक-दूसरे के प्रति सम्मान की भावना रखते है।
7. सुबह बिस्तर से उठकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बड़ों के चरण स्पर्श करना एक ऐसी शक्ति रखता है कि इससे परिवार में एकता की भावना मजबूत होती है।
8. इसी प्रकार रात को सोने से पहले बड़ों का आशीर्वाद लेने से आयु, विद्या एवं वंश बढ़ता है। परंतु ऐसे संस्कारों को यदि हम अपने परिवार के संदर्भ में पूर्णत: चरितार्थ होते देखना चाहते है तो सबसे पहले बड़े सदस्यों को भी इसकी शुरुआत करनी होगी। तभी यह परंपरा हम भावी पीढ़ी को हस्तांतरित कर सकेंगे।
9. यदि आपका मकान एक से अधिक तल वाला है तो आयु में बड़े सदस्यों को ऊपर के तल पर एवं कम उम्र के सदस्यों को नीचे वाले तल पर रहना चाहिए। अर्थात बड़ों के पांव के नीचे के भाग में छोटे सदस्य रहें तो उत्तम है। अगर परिवार के बुज़ुर्ग सीढिय़ां चढऩे-उतरने में असमर्थ हों तो उन्हे नीचे वाले तल में में रहना चाहिए।
10. पूरे परिवार की एकजुटता के लिए यह भी ध्यान रखें कि आपका डाइनिंग रूम घर के पूर्व, उत्तर या दक्षिण-पूर्व दिशा में हो।
11. इसके साथ ही यह आवश्यक है कि परिवार के सभी सदस्य 24 घंटे में से किसी एक समय का भोजन एकसाथ बैठकर करे। इस समय बुज़ुर्ग व्यक्तियों को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए।
12. भोजन करते समय परिवार के सभी सदस्य टीवी आदि न देख कर परस्पर बातें करे व अपनी दिनचर्या, उपलब्धियों व ऐसे ही अन्य क्रियाकलाप के विषय में सामान्य या फिर प्रसन्नतापूर्ण बातों की चर्चा करे। ध्यान रहे कि कोई भी अप्रिय विषय न उठाया जाए। इस तरह वास्तु सिद्धांतों को अपनाना वास्तव में परिवार को एक सूत्र में पिरोए रखने में सहयोगी होगा।





आजकल खान-पान का रखें खास ध्यान


यह त्योहारों का मौसम है। नवरात्र मना रहे अधिकतर लोग उपवास कर रहे हैं, लेकिन यह जानना बहुत जरूरी है कि सेहत को ध्यान में रखते हुए उपवास कौन करे और कौन नहीं।
मौसम त्योहारों का है। आप नवरात्र की नियमित पूजा कर रहे होंगे और रोज व्रत भी रख रहे होंगे। उपवास करना वैसे तो तन और मन दोनों के लिए फायदेमंद होता है, पर कुछ स्थितियों में इसे न रखा जाए तो बेहतर।
आपको उपवास नहीं करना चाहिए
बालक, वृद्ध, निर्बल, रोगी, दूध पिलाने वाली माताओं और गर्भवती महिलाओं को उपवास बिल्कुल नहीं करना चाहिए। बहुत से माता-पिता बच्चों को उपवास करने के लिए अनेक उदाहरण देते हैं और व्रत रखवाते हैं। कोई किसी की देखा-देखी व्रत करने को तैयार हो जाता है। ऐसा नहीं करना चाहिए।
उपवास के पहले यह जरूर सोचें
यह किसी की बराबरी करने का नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा और आस्था का मामला है, इसलिए पहले अपने शरीर की शक्ति का आकलन करें। फिर उपवास करने की सोचें। कमजोर शरीर वाली महिला अथवा पुरुष व्रत रखने की न सोचें। ऐसे लोग अगर व्रत रखते हैं तो संभव है उनके रक्तचाप (ब्लडप्रेशर) में कमी आ जाए, जिससे शरीर में और कमजोरी या थकान आ जाए। इसलिए सेहत का खयाल पहले रखें। यदि आप स्वस्थ हैं, निरोग हैं तो ही धर्म का भली-भांति पालन कर पाएंगे।
हमारे उपवास बहुत होते हैं। सातों वारों (रविवार से सोमवार तक) और प्रतिपदा से अमावस्या, पूर्णिमा तक सभी त्योहार और उपवास ही हैं। इनमें जन्माष्टमी, चतुर्थी, शिवरात्रि, नवरात्र सभी शामिल हैं। इनमें से किसी में एक समय का भोजन लेने की तो किसी में केवल फल आदि से व्रत खोलने की परम्परा है। ऐसे में शरीर की क्षमता को देखना बहुत जरूरी है कि वह उस त्योहार को करने योग्य है या नहीं।
ऐसा न करें
व्रत करने वालों में बहुत से लोग ऐसे होते हैं, जो पूरे दिन उपवास रखते हैं। शाम को व्रत खोलने के समय तला-भुना या गरिष्ठ भोजन इतना अधिक कर लेते हैं, मानो दोनों समय के भोजन की पूर्ति करनी हो। यह खाना खाते ही नींद काफी तेज आती है और यह सेहत के लिए काफी नुकसानदेह होता है।
शांतिपूर्वक सात्विक भोजन करें
ध्यान रखें, व्रत में केवल सात्विक भोजन शान्ति से बैठ कर पालथी मार कर इष्टदेव को अर्पण कर किया जाना चाहिए।
गप-शप करते हुए किसी के साथ एक थाली में तथा झूठा भोजन करना वजिर्त है। उपवास के दौरान ऐसा करना उचित नहीं।
सावधानी बरतें
उपवास खोलते समय अपने इष्ट देव का ध्यान करें और जो प्राप्त भोजन है, उसे अर्पण कर एक ग्रास अलग निकाल कर भोजन करें।
भोजन धीरे-धीरे शान्त चित्त से करें। उतना ही खाएं कि भूखे भी न रहें और पेट भी भारी न हो।