Tuesday, April 16, 2013
थैलीसीमिया: जागरूकता ही बचाव है
थैलीसीमिया एक अनुवांशिक रोग है। जागरूकता के अभाव के कारण पूरी दुनिया में इस रोग से पीडित बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है। कम गंभीर मामलों में सही उपचार अपना कर सामान्य जीवन जिया जा सकता है। इसके लिए इसके प्रति जागरूक बहुत जरूरी है। यह रोग क्या है, इसका इलाज क्या है और कैसे इससे अपने बच्चों को बचाया जा सकता है, बता रही हैं शमीम खान
थैलीसीमिया एक रक्त संबंधी विकार है। इसमें हीमोग्लोबिन, जो शरीर में ऑक्सीजन को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाता है, में खराबी आ जाती है। इसके कारण लाल रक्त कणिकाएं नष्ट हो जाती हैं, जिससे गंभीर एनीमिया हो जाता है। हमारे देश में थैलीसीमिया के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। भारत में करीब 6 करोड़ लोग थैलेसीमिया माइनर से पीडित हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर वर्ष 7-10 हजार थैलीसीमिया से ग्रस्त बच्चों का जन्म होता है।
क्या होता है थैलीसीमिया
यह अनुवांशिक रोग है, जो बच्चों को माता-पिता से विरासत में मिलता है। थैलीसीमिया के दो प्रकार होते हैं:
थैलीसीमिया मेजर
थैलीसीमिया माइनर
थैलीसीमिया माइनर तब होता है, जब बच्चे को क्षतिग्रस्त जीन एक ही पैरेंट यानी माता या पिता में से किसी एक से मिलता है। लेकिन जब माता और पिता दोनों से ही उसे क्षतिग्रस्त जीन मिलेंगे तो मेजर थैलीसीमिया की पूरी आशंका होती है। यदि माता-पिता दोनों सामान्य हैं तो उनके बच्चे थैलीसीमिया से पीडित नहीं होंगे। माता-पिता में से किसी एक को यदि माइनर थैलीसीमिया है तो बच्चों को यह हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है। यदि माता-पिता दोनों को माइनर थैलीसीमिया हो तो बच्चे को थैलीसीमिया होने का खतरा ज्यादा रहता है। इसमें 25 प्रतिशत बच्चे सामान्य हो सकते हैं, 50 प्रतिशत को माइनर थैलीसिमिया व 25 प्रतिशत को मेजर थैलीसीमिया होने की आशंका अधिक होती है।,
लक्षण
थैलीसीमिया मेजर के सबसे गंभीर रूप में मृत बच्चे का जन्म हो सकता है या गर्भावस्था के आखिरी समय में बच्चे की मृत्यु हो जाती है।
बच्चे जो थैलीसीमिया मेजर (कूले एनीमिया) के साथ जन्म लेते हैं, वे जन्म के समय सामान्य होते हैं, लेकिन जन्म के पहले वर्ष में उन्हें गंभीर एनीमिया हो जाता है।
अन्य लक्षण
चेहरे की हड्डियां का विकृत होना।
थकान।
असामान्य विकास।
त्वचा का पीला हो जाना (पीलिया)।
चेहरा सूख जाना और मुरझाया हुआ लगना।
लगातार कमजोरी और बीमारी की स्थिति बनी रहना, वजन नहीं बढम्ना।
उपचार
थैलीसीमिया मेजर के उपचार में नियमित अंतराल पर रक्त चढ़ाने की आवश्यकता होती है। जो लोग रक्ताधान (ब्लड ट्रांसफ्यूजन) ले रहे हैं, वे आयरन के सप्लीमेंट न लें, क्योंकि ऐसा करने से रक्त में आयरन की मात्रा बहुत बढ़ जाती है। इससे हृदय, लीवर और एंडोक्राइन सिस्टम क्षतिग्रस्त हो जाता है।
शरीर में आयरन का स्तर बढ़ जाने पर चिलेशन थेरेपी की आवश्यकता पड़ती है, जिसमें अतिरिक्त आयरन को शरीर से बाहर निकाला जाता है। बच्चों में इस रोग के उपचार के लिए अस्थि-मज्जा प्रत्यारोपण (बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन) सबसे कारगर होता है, जो सगे भाई या बहन द्वारा दिया जा सकता है।
बचाव
गंभीर थैलीसीमिया में 20 से 30 साल की उम्र में ही हार्ट फेल होने से मृत्यु हो जाती है। थैलीसीमिया के कम गंभीर रूप में आयु कम नहीं होती है। नियमित रूप से रक्त चढ़ाने और चिलेशन थेरेपी से सामान्य जीवन जीने में मदद मिलती है। सबसे कारगर उपाय है कि शादी से पहले लड़का-लड़की अपना चेकअप करा लें। थैलीसीमिया से पीडित दो लोगों को कभी आपस में शादी नहीं करनी चाहिए।
संभव है थैलीसीमिया की रोकथाम
गर्भवती महिला को गर्भावस्था के पहले तीन महीनों में ही थैलीसीमिया की जांच करा लेनी चाहिए और अगर वह थैलीसीमिया की कैरियर है, तब पति की भी जांच करानी चाहिए। अगर दोनों पॉजीटिव हैं, तब एंटी-नेटल डायग्नोसिस कराना चाहिए कि कहीं बच्चे को थैलीसीमिया होने का खतरा तो नहीं है। अगर बच्चा इससे पीडित है तो गर्भपात करा लेना चाहिए। अगर थैलीसीमिया से पीडित दो लोग शादी कर लेते हैं तो जन्म लेने वाले बच्चे के थैलीसीमिया मेजर से पीडित होने का खतरा 25 प्रतिशत बढ़ जाता है। इसका इलाज बहुत मंहगा है, क्योंकि पूरे जीवन भर उसे रक्ताधान कराना होता है। लगातार रक्ताधान और आयरन की मात्रा बढऩे से जीवन पर खतरा और बढ़ जाता है।
प्री-इम्प्लांटेशन जेनेटिक डायग्नोसिस क्या है?
प्री-इम्प्लांटेशन जेनेटिक डायग्नोसिस एक प्रभावकारी तकनीक है, जिससे जैविक विकारों को माता-पिता से बच्चों में स्थानांतरित होने से रोका जा सकता है। इस डायग्नोसिस में मां को स्टीम्युलेशन देकर अंडे प्रोडय़ूस कराए जाते हैं, जिन्हें इक_ा कर निषेचित कराया जाता है। फिर इन भ्रूणों को विभिन्न बीमारियों के लिए टेस्ट किया जाता है (जैसे- थैलीसीमिया, डाउन सिंड्रोम इत्यादि) और केवल सामान्य भ्रूणों को गर्भाशय में स्थानांतरित किया जाता है।
इस तरह से जन्म लेने वाला बच्चा सामान्य होता है। यह बच्चा थैलीसीमिया से पीडित भाई-बहन के लिए स्टेम सेल डोनर का काम कर सकता है। अगर पुरुष साथी को थैलीसीमिया है तो प्री-इम्प्लांटेशन जेनेटिक डायग्नोसिस कराने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि इस मामले में बच्चा थैलीसीमिया माइनर होगा।
यह महिलाओं के लिए जरूरी है कि वे गर्भावस्था के दौरान थैलीसीमिया टेस्ट कराएं, ताकि बच्चे में इस रोग के स्थानांतरित होने से रोका जा सके। इससे ऐसे बच्चे को मुश्किलों से भरी जिंदगी जीने से मुक्ति मिलेगी।
सरल नाड़ीशोधन प्राणायाम बनाए नाड़ी को मजबूत
नाडियां कमजोर हों तो अनेक बीमारियां परेशान कर सकती हैं। थकावट, कमजोरी, चिड़चिड़ापन जैसी समस्याओं के लिए नाड़ी दुर्बलता काफी हद तक जिम्मेदार होती है। कुछ आसन और प्रायाणम आपकी नाडियों को मजबूती दे सकते हैं।
आज की इस भागदौड़, तनावग्रस्त तथा आरामतलब जिन्दगी में नाड़ी दुर्बलता जैसी बीमारियां बहुत लोगों को अपनी चपेट में ले रही हैं। थकावट, कमजोरी, चिड़चिड़ापन, हताशा, निराशा, भय, असुरक्षा तथा किसी काम में मन न लगने आदि जैसी समस्याएं इसका प्रमुख लक्षण हैं। आज अधिकांश लोग इस समस्या से पीडित हैं। वस्तुत: यह समस्या मनोकायिक है, जिसका योग के अतिरिक्त कहीं अन्यत्र स्थायी समाधान नहीं है। इस समस्या के निदान हेतु यहां बताई गई यौगिक क्रियाएं बहुत लाभदायक हैं-
आसन
नाड़ी दुर्बलता की समस्या को दूर करने के लिए सर्वागासन तथा शीर्षासन बहुत प्रभावकारी हैं। किन्तु प्रारम्भ में अन्य सरल आसनों जैसे-सूर्य नमस्कार, जानु शिरासन, पश्चिमोत्तानासन, मेरुवक्रासन, राजकपोतासन, उष्ट्रासन तथा उत्तानासन आदि में दक्षता प्राप्त कर ही सिर के बल खड़े होने वाले आसनों का अभ्यास करना चाहिए।
उष्ट्रासन की अभ्यास विधि
घुटने के बल जमीन पर खड़े हो जाएं। दोनों घुटनों के मध्य आपस में एक फुट तथा दोनों पंजों के बीच भी एक से डेढ़ फुट का अंतर रखें। अब दाएं हाथ को पीछे ले जाकर दाएं पैर की एड़ी पर रखं। इसी प्रकार बाएं हाथ को बाएं पैर की एड़ी पर रखें। नितम्ब तथा कमर को आगे की ओर इस प्रकार धकेलें कि रीढ़ की आकृति ऊंट की रीढ़ जैसी बन जाए। इस स्थिति में श्वास-सामान्य रखते हुए आरामदायक स्थिति तक रुकें। इसके पश्चात वापस पूर्व स्थिति में आएं।
प्राणायाम
नसों-नाडियों को सशक्त करने हेतु सरल कपालभाति, नाड़ी शोधन तथा उज्जायी प्राणायाम का अभ्यास बहुत लाभकारी सिद्ध होता है। यदि नियमित रूप से नाड़ीशोधन का अभ्यास किया जाए तो उस समस्या को बहुत कम समय में जड़ से हटाया जा सकता है।
सरल नाड़ी शोधन की अभ्यास विधि
ध्यान के किसी आसन जैसे-पद्मासन, सिद्धासन, सुखासन या कुर्सी पर रीढ़, गला व सिर को सीधा कर बैठ जाएं। दाएं हाथ के अंगूठे से दांयी नासिका को बन्द कर बायीं नासिका से एक गहरी तथा धीमी श्वास अन्दर लें। अब बायीं नासिका को बंद कर दायीं नसिका से एक गहरी तथा धीमी श्वास बाहर निकालें। पुन: दायीं नासिका से श्वास अन्दर कर बायीं नासिका से श्वास बाहर निकालें। यह नाड़ी शोधन प्राणायाम की एक आवृत्ति है। प्रारंभ में इसकी 12 आवृतियों का अभ्यास करें। धीरे-धीरे इसकी आवृति अपनी क्षमतानुसार बढ़ाते जाना चाहिए।
आहार
सुपाच्य तथा संतुलित भोजन खूब चबा-चबाकर खायें। दूध, दही, म_ा, लस्सी, अंगूर, संतरे तथा मौसमी का रस पियें। हरी सब्जियों तथा सलाद पर्याप्त मात्रा में लें।
हमेशा सलामत रहेंगे आपके बाल
पूरे व्यक्तित्व की खूबसूरती में बालों की काफी भागीदारी होती है। बाल खूबसूरत हैं, चेहरे के अनुकूल कटे हैं तो व्यक्तित्व निखर जाता है।
उम्र के साथ बाल में कई परिवर्तन आते हैं। खासकर 45 की उम्र के बाद बाल सफेद होना, घनापन कम होना, बाल पतला होना, बाल गिरना आदि सामान्य बात है। जब ये सारी समस्याएं 20 से 30 वर्ष की उम्र में ही सामने आने लगें तो किसी भी व्यक्ति के लिए चिंतित हो उठना स्वाभाविक है।
गंजेपन की समस्या
सिर से जब सामान्य से ज्यादा बाल गिरने लगें और एक समय बाद बाल साफ ही हो जाएं तो इसे 'गंजापनÓ कहते हैं। लक्षण के आधार पर गंजेपन को कई नामों से जानते हैं। पुरुषों में आमतौर पर होने वाले सामान्य गंजेपन को 'एंड्रोजेनेटिक एलोपीसियाÓ कहते हैं। महिलाओं में आगे के बालों का उडऩा 'फीमेल पैटर्न बाल्डनेसÓ कहलाता है। जब बाल गोलाकार में झड़ते हैं तो उसे 'एलोपीसिया एरेटाÓ कहते हैं। कई बार बाल कसकर बांधने से भी निकल आते हैं, इसे ट्रैक्शन एलोपीसिया कहते हैं। शरीर में आयरन और पोषक तत्वों की कमी की वजह से या अत्यधिक दवाओं का सेवन करने की वजह से भी बाल गिरने लगते हैं।
क्या हो सकते हैं कारण
बाल गिरने या गंजेपन के कई कारण हो सकते हैं। कुछ लोगों में गंजापन अनुवांशिक आ जाता है तो कुछ लोग संक्रमण के शिकार हो जाते हैं। बालों पर अत्यधिक रसायन का इस्तेमाल भी कभी-कभी गंजेपन का कारण बनता है। इसके अलावा हार्मोनल बदलाव व शरीर में पोषक तत्वों की कमी भी इसकी वजह हो सकती है।
अनुवांशिक: घर में पहले भी किसी को गंजेपन की शिकायत रही है या एक उम्र के बाद दादा, पिता या घर के दूसरे पुरुषों में गंजापन आ जाता है तो आपमें भी गंजापन आ सकता है।
संक्रमण: सिर में फंगल संक्रमण की वजह से भी बाल उडऩे लगते हैं। लेकिन यह अनुवांशिक गंजेपन से अलग होता है। संक्रमण की वजह से जगह-जगह से काफी संख्या में बाल निकलने लगते हैं। इलाज के बाद इसे ठीक किया जा सकता है।
रसायनों का इस्तेमाल: फैशन के साथ कदमताल करने की फिराक में कई लोग अपने बालों के साथ बार-बार प्रयोग करते हैं। बाल सीधे करने या घुंघराले करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले रसायन बाल को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं। बाल पर अत्यधिक रसायन का इस्तेमाल उनके गिरने का कारण बन जाता है।
हार्मोन में बदलाव: शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव भी गंजेपन का कारण बन सकते हैं। महिलाओं में एंड्रोजेन की मात्रा बढ़ जाए तो उनमें भी गंजापन देखने को मिल सकता है। हाइपरथायरॉयड व हाइपोथॉयरॉयड की स्थिति में भी गंजापन हो सकता है।
पोषक तत्वों की कमी या अधिकता:
शरीर में महत्वपूर्ण पोषक तत्व जैसे आयरन और प्रोटीन की कमी के कारण भी गंजापन हो सकता है। अत्यधिक कमजोरी की वजह से भी गंजापन आता है। डॉक्टरों के मुताबिक शरीर में विटामिन ए की अत्यधिक मात्रा की वजह से भी बाल गिरने लगते हैं और गंजापन आ जाता है।
दवाएं: कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव से भी गंजापन आता है। कीमोथेरेपी, एनाबोलिक स्टेरॉयड, गर्भ निरोधक दवाओं की वजह से भी गंजापन होता है।
बाल ऐसे रहेंगे स्वस्थ और घने
खानपान पर ध्यान दें
बालों की सेहत सुधारने में शाकाहारी भोजन ज्यादा मदद करते हैं। खासकर हरी सब्जियां बालों को जड़ से मजबूत करती हैं और उनकी मोटाई भी बढ़ाती हैं। किसी को भी यदि बाल गिरने की समस्या है तो उसे अपनी डायट में सबसे पहले बदलाव करना चाहिए। बाहरी चीजों जैसे कि फास्टफूड और तली-भूनी चीजों की जगह अपनी डायट में हरी सब्जियों को शामिल करना चाहिए। हरी सब्जियां, सोया, मशरूम, पनीर आदि में विटामिन एच की प्रचुर मात्रा पाई जाती है, जो कि हमारे बालों के लिए वरदान है।
शैम्पू का इस्तेमाल
बाजार में आने वाला हर नया ब्रांड अच्छा ही होगा, यह कहना मुश्किल है। इसलिए किसी भी शैम्पू पर आंख मूंद कर भरोसा न करें। बेहतर होगा कि माइल्ड शैम्पू का चुनाव किया जाए। आमतौर पर लोगों के दिमाग में यह धारणा बनी हुई है कि शैम्पू में बार-बार बदलाव नहीं किया जाना चाहिए, जबकि डॉक्टर किसी भी शैम्पू को लगातार तीन महीने से ज्यादा इस्तेमाल करने की सलाह नहीं देते। यदि आप सप्ताह में तीन बार शैम्पू करते हैं तो दो बार एक शैम्पू से बाल धोएं, जबकि तीसरी बार के लिए शैम्पू बदल दें। इसके अलावा हर तीन महीने पर अपना शैम्पू बदल देना चाहिए, क्योंकि एक समय के बाद त्वचा उसकी आदी हो जाती है और नई तरह की समस्या आने लगती है।
स्वास्थ्य जांच कराएं
मधुमेह के रोगियों को फंगल संक्रमण का डर बना रहता है। संक्रमण की शुरुआत में ही डॉक्टर से संपर्क करें, क्योंकि संक्रमण का जितनी जल्दी इलाज होगा, उतना ही कम नुकसान होगा। बाल ज्यादा गिरने या फंगल संक्रमण की स्थिति में लोग डॉक्टर के पास जाने की बजाय पार्लर जाते हैं। ये गलत है। इससे आपकी समस्या और गंभीर हो सकती है। यदि किसी व्यक्ति को अचानक फंगल इंफेक्शन हो जाए तो उसे सबसे पहले अपने मधुमेह के स्तर की जांच करानी चाहिए।
बालों के साथ ज्यादा छेड़छाड़ ठीक नहीं
युवाओं में यह ज्यादा देखा जाता है। बालों को रंगना, रसायन का इस्तेमाल करना, बालों की बार-बार स्ट्रेटनिंग कराना, घर में ड्रायर का हर दिन इस्तेमाल आदि कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जो बालों को नुकसान पहुंचाते हैं। बालों पर अत्यधिक स्टाइलिंग और रसायन का इस्तेमाल इन्हें कमजोर बना देता है और नतीजा कमजोर और पतले बालों के रूप में सामने आता है।
चर्म रोग, मधुमेह में फायदेमंद मिट्टी चिकित्सा
मिट्टी कीटाणुनाशक है। यह हमारे शरीर के विषों, विकारों को निकाल बाहर करती है। इस कारण इसे बेहतरीन औषधि कहा गया है।
मिट्टी चिकित्सा का प्रयोग करते समय सबसे पहले मिट्टी को आठ घंटे के लिये भिगोना होता है। इसके लिए उसे रात में ही भिगो दें। सुबह-सुबह मिट्टी को एक घंटे के लिए धूप में रख दें उसके बाद भीगी हुई मिट्टी का बहुत बारीक लेप बनाएं और रोगी के सारे कपड़े उतार कर, पूरे शरीर पर इस लेप को लगा दें। शरीर को धूप में खुला रखें और 30 से 40 मिनट तक लेप को सूखने दें। इसके बाद मिट्टी को छुड़ा कर ठंडे पानी से
नहा लें।
लाभ: इससे चर्म रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, अनिद्रा आदि समस्या में काफी लाभ होता है।
सावधानियां: ध्यान रखें कि मिट्टी में कंकड़-पत्थर न हो। इसका इस्तेमाल करते समय आंखों को बंद कर लें। एक बार प्रयोग के बाद मिट्टी का दुबारा प्रयोग न करें। मिट्टी को साफ करते समय स्वच्छ पानी का प्रयोग करें।
एड़ी के दर्द में फायदेमंद
रोगी दो बाल्टी में पानी भर कर रखें। एक बाल्टी में गर्म तथा दूसरी बाल्टी में ठंडा पानी रखें। पहले ठंडे पानी की बाल्टी में 1 मिनट तक रोगी के पैर रखें और उसके बाद 3 मिनट तक गर्म पानी में पैर रखें। इस प्रक्रिया को चार बार दुहराएं। इससे एड़ी में होने वाली असहनीय पीड़ा भी समाप्त हो जाती है।
लाभ: एड़ी के दर्द में लाभ होता है। पैर की त्वचा कोमल रहती है और रक्तसंचार ठीक चलता है।
सावधानियां: पैर ठंडे पानी में रखने से प्रक्रिया को शुरू करें और अंत भी ठंडे पानी की बाल्टी में पैर रखकर ही करें। इस बात का भी ध्यान रखें कि पानी की गर्मी सहने योग्य हो।
राजधानी में प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र
इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ योगा एंड नेचुरोपैथी, ईस्ट ऑफ कैलाश
बालाजी निरोगधाम, महाराजा अग्रसेन नेचुरोपैथी एंड योग साधना रिसर्च ट्रस्ट, बख्तावरपुर
वेलनेस केयर योग प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र, बी-4/55, फेज-2, अशोक विहार
देव योग एवं नेचर क्योर सेंटर, नारायणा गांव, नजदीक नारायणा गांव क्लब
डॉ. जैन योगा एंड नेचुरोपैथी सेंटर, सेक्टर 14, गुडग़ांव
जलने-झुलसने पर
जल जाए या झुलस जाए तो तुरंत उसके जले झुलसे अंग को ठंडे पानी में एक घंटा डुबोकर रखें। इससे जलन दूर होगी, फफोला नहीं पड़ेगा। पूरा शरीर जल जाय तो व्यक्ति को तुरंत बड़े पानी के हौज में रख दें। सांस लेने के लिए नाक को पानी से बाहर रखें। याद रखें कि जला झुलसा-अंग पानी में एक से दो घंटे डूबा रहे। इससे ठंडे पानी का चमत्कार दिखायी देगा।
मोच आए चा चोट लगे
मोच आ जाए या चोट लग जाए तो तुरंत उस स्थान पर खूब ठंडे पानी की पट्टी लगा दें। पट्टी में बर्फ का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे न तो सूजन होगी, न दर्द बढ़ेगा। गर्म पानी की पट्टी न लगाएं या ऐसे पानी से सेंक न करें, क्योंकि इससे सूजन आ जाएगी और दर्द भी बढ़ जाएगा। यदि चोट लगने या कटने से खून आ जाय तो बर्फ या काफी ठंडे पानी की पट्टी चढ़ाने से तुरंत आराम होगा।
घुटने का दर्द
घुटनों के दर्द की शिकायत हो तो रोगी ठंडे पानी में भिगोई पट्टी लेकर अपने घुटने पर बांधें। इस बात का ध्यान रखें कि पट्टी में इस्तेमाल किया जाने वाला कपड़ा सूती हो। ठंडे पानी की पट्टी के ऊपर ऊनी या मलमल का कपड़ा लपेटना चाहिए।
बीमारियों में रामबाण जल चिकित्सा
पंचतत्वों से बने शरीर को जल की अत्यधिक आवश्यकता होती है। जल एक अमृत औषधि भी है। जल की औषधीय महत्ता इतनी अधिक है कि जल चिकित्सा से अनेक बीमारियां प्राकृतिक तरीके से ठीक हो जाती हैं।
शरीर का तीन चौथाई भाग पानी है। हम तरह-तरह से पानी को ग्रहण भी करते हैं। खाने-पीने के साथ-साथ स्नान तक में पानी का इस्तेमाल होता है, जिससे हमारी सेहत बनी रहती है। शरीर में पानी का संतुलन बिगड़े या खाने-पीने में स्वच्छ पानी की तनिक भी कमी आ जाए तो बीमारी हमें घेर लेती है। कई बार ऐसी बीमारियां हमें सताने लगती हैं, जिनका बेहतर उपचार पानी से ही होता है। इस प्रक्रिया को जल चिकित्सा कहते हैं।
किन-किन बीमारियों में है अचूक
पेट से संबंधित रोगों में जल की भूमिका अति आवश्यक होती है। त्वचा रोगों, कब्ज, अनिद्रा, थकान, जोड़ों में के दर्द, मिर्गी, डायबिटीज, शुगर व कई अन्य रोगों में जल चिकित्सा बेहद असरदार होती है। एक और खास बात यह कि इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता।
मिर्गी के दौरे
कारण: मिर्गी के दौरे मस्तिष्क के किसी एक भाग में अचानक विद्युत प्रवाह के कारण होते हैं। आमतौर पर मिर्गी का दौरा लगभग 4-5 मिनट में खत्म हो जाता है। यह दौरा काफी खतरनाक होते हैं और कभी-कभी रोगी का मल-मूत्र भी निकल जाता है।
लक्षण: रोगी के शरीर में किसी भी अंग में दर्द या शरीर का टेढ़ा होना, मुंह से झाग आना, कुछ देर बाद अचानक ठीक होना इसका लक्षण हो सकता है।
उपचार: रोगी को पूर्ण रूप से विश्वास में लेने का प्रयास करें। 4-5 मिनट तक सिर पर गीला तौलिया बांधें। पीठ पर धीरे-धीरे पानी की धार छोड़ें। टब या बाल्टी में 5-7 मिनट तक दोनों पैरों को पानी में डुबाकर रखें। शरीर में पानी की कमी न होने दें।
अनिद्रा
कारण: अनिद्रा या नींद न आने की स्थिति अधिकतर मानसिक कारणों से होती है। गलत खान-पान, चिंता, देर रात तक जागना, पेट में गैस हो, छाती में भारीपन, शरीर में दर्द हो, रात को अधिक चाय पीना, कॉफी का सेवन करना आदि।
लक्षण: रात को नींद नहीं आती और पूरी रात करवटें बदलते बीतती है। नींद खुल जाती है, दुबारा नींद नहीं आती। सुबह को उठने पर शरीर में सुस्ती, थकावट आदि होती है।
उपचार: रात में हल्का भोजन लें। रात को सोने के लिए हवादार कमरे तथा आरामदायक बिस्तर का प्रयोग करें। सोने से पहले स्नान करें। नहाते समय सिरे पर पानी की धार डालें।
सूजन
कारण: शरीर में छोटी-मोटी बीमारी से सूजन नहीं होती। यह शरीर से खून निकल जाने या अन्य किसी प्रकार की कमजोरी के कारण उत्पन्न हो जाती है। भोजन में अधिक नमकीन, खट्टे, तीखे पदार्थों का सेवन करने भी से भी यह रोग पैदा हो जाता है। कई बार अशुद्ध भोजन लेने के कारण भी शरीर में विष उत्पन्न हो जाता है, जिससे सूजन की समस्या आती है।
लक्षण: कभी सूजन हो जाती है तो कभी खुद ही ठीक हो जाती है। सूजन आने से नसें पतली पड़ जाती हैं, जिससे त्वचा पर नीचे रंग की शिराएं दिखाई देने लगती हैं। शरीर में रोएं खड़े हो जाते हैं। यह सूजन वात, पित्त तथा कफ का संतुलन बिगडऩे के कारण होती है।
उपचार: 10 से 20 मिनट तक कटि स्नान करें। उसके बाद तौलिये को गीला करके कमर पर रगड़ें। सूजन वाले स्थान पर पानी की धार धीरे-धीरे छोड़ें।
पेट में गैस बनती है
उपचार: जब पित्त की मात्रा शरीर में अधिक हो जाए और अपचय हो तो रोगी को चाहिए की वह अपने पेट को वमन (उल्टी) द्वारा ठीक करे। सबसे पहले पीने के लिए 5-6 गिलास पानी गर्म करें। उसमें एक चम्मच नमक मिलाएं। अब कागासन में बैठ कर पानी पिएं। अब 5 से 10 मिनट तक टहलें। उसके उपरांत आगे की तरफ झुककर वमन कर दें। इसे कुंजन क्रिया कहते हैं।
लाभ: इससे गैस संबंधित रोग खत्म होता है। शरीर के अन्दर की सफाई होती है। आप काफी हल्का महसूस करेंगे।
सावधानियां: उच्च रक्तचाप की समस्या वाले व्यक्ति डॉक्टर की सलाह से ही यह क्रिया करें।
मन हल्का करने को वाष्प स्नान
उपचार: घर पर वाष्प स्नान लेने के लिए एक कुर्सी पर रोगी को बैठा दें। उसको कम्बल से चारों तरफ से ढक दें। दूर गैस चूल्हे पर एक कुकर पानी भर कर रखें। सिटी को हटा कर एक लम्बी पाइप लगा दें। पाइप के एक सिरे को सावधानीपूर्वक रोगी की कुर्सी के नीचे रख दें। इससे पहले रोगी को एक गिलास पानी पिलाएं और सिर पर ठंडे पानी से भीगा तौलिया रखें।
लाभ: भाप स्नान से त्वचा का मैल फूलकर निकल जाता है। शरीर के रोम छिद्र खुल जाते हैं। शरीर में हल्कापन आता है। त्वचा निखरती है। कमर की सिकाई से दर्द दूर हो जाता है।
सावधानियां: उच्च रक्तचाप की तकलीफ है तो वाष्प स्नान न करें। अगर गरमी सहन न हो तो उपचार तुरंत रोक दें।
सर्दी-जुकाम से निजात दिलाए
उपचार: सर्दी-जुकाम से निजात पाने के लिए जल नेति क्रिया फायदेमंद होती है। एक लोटा लेकर उसमें हल्का गर्म पानी और 1/2 चम्मच नमक मिलाकर नाक में लगाएं और मुंह को खोलकर सांस लें तथा दूसरी नाक से पानी को निकाल दें।
लाभ: जल नेति से सर्दी-जुकाम की समस्या से मुक्ति मिलती है। नेत्र ज्योति बढ़ाती है। समय से पहले बाल सफेद नहीं होते। सिरदर्द ठीक होता है।
पाचन क्रिया बेहतर करने के लिए
विधि: कमर स्नान काफी फायदेमंद होता है। बड़े टब में पानी भरें। रोगी को टब में कपड़े उतारकर इस तरह बैठा दें कि उसकी नाभि तक पानी आ जाए। रोगी के पैर बाहर एक मेज पर रख दें। रोगी के सिर पर एक गिला तौलिया रख दें तथा रोगी को एक सूती कपडा़ देकर नाभि के चारों तरफ रगडऩे को कहें। यह चिकित्सा 20 से 30 मिनट तक दें।
लाभ: यह पाचन क्रिया को ठीक करता है। कब्ज, मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, स्त्रियों में मासिक धर्म की अनियमितता को ठीक करता है।
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