Sunday, April 21, 2013

कहीं जीना मुहाल न कर दे ऑस्टियोपोरोसिस


यह बीमारी कभी 45 साल की उम्र के बाद परेशान करती थी, लेकिन अब युवाओं को भी अपनी चपेट में लेने लगी है। कैल्शियम और विटामिन डी की कमी से होने वाली इस बीमारी में हड्डियां कमजोर हो जाती हैं।
हड्डियों की कमजोरी आज एक आम समस्या बन गई है। यह सही है कि ऑस्टियोपोरोसिस की समस्या महिलाओं में पुरुषों के मुकाबले अधिक होती है और उम्र बढऩे के साथ इस बीमारी की चपेट में आने की आशंका बढ़ जाती है। लेकिन आधुनिक जीवनशैली ने हमारी दिनचर्या और खानपान की आदतों में ऐसा बदलाव किया है कि युवा भी तेजी से इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। शरीर में कैल्शियम और विटामिन डी की कमी से ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा बढ़ जाता है।
क्या है ऑस्टियोपोरोसिस
ऑस्टियोपोरोसिस हड्डियों की एक बीमारी है। इसमें हड्डियां कमजोर हो जाती हैं और आसानी से उनमें फ्रैक्चर आ जाता है। इसका सबसे प्रमुख कारण बोन मिनरल डेंसिटी कम हो जाना है। उम्र बढऩे के साथ हड्डियों से कैल्शियम का क्षरण होने लगता है, जिससे हड्डियां कमजोर होकर आसानी से टूटने लगती हैं। ऑस्टियोपोरोसिस दो प्रकार का होता है- टाइप 1 और टाइप 2। टाइप 1 महिलाओं में ज्यादा आम है, जो खासकर मेनोपॉज के बाद होता है। टाइप 2 ऑस्टियोपोरोसिस को सेनाइल ऑस्टियोपोरोसिस भी कहते हैं। यह आमतौर पर 75 साल की उम्र के बाद होता है और महिलाओं और पुरुषों को समान रूप से अपना शिकार बनाता है। इसका प्रभाव सबसे ज्यादा नितंब, रीढ़ की हड्डी और कलाइयों की हड्डियों पर होता है।
बोन डेंसिटी टेस्ट
बोन डेंसिटी टेस्ट में एक विशेष प्रकार के एक्स-रे, जिसे डीएक्सए कहते हैं, के द्वारा स्पाइन, कूल्हों और कलाइयों की स्क्रीनिंग की जाती है। इन भागों की हड्डियों का घनत्व माप कर इनकी शक्ति का पता लगाया जाता है।
इसके कारण
ऑस्टियोपोरोसिस का मुख्य कारण महिलाओं में एस्ट्रोजन और पुरुषों में एंड्रोजन हार्मोनों की कमी होता है।
शरीर में कैल्शियम और विटामिन डी की कमी।
थायराइड की समस्या।
बढ़ती उम्र और अत्यधिक भार।
दवाओं का अत्यधिक सेवन।
शारीरिक सक्रियता में कमी या अधिक दिनों तक बेड रेस्ट करना।
धूम्रपान और शराब का अधिक सेवन।
ऐसे पहचानें
यह बीमारी मुख्य रूप से रीढ़ की हड्डियों, पसलियों, कूल्हों और कलाइयों में होती है।
इसमें हड्डियों में सिकुडऩ और अस्थिमज्जा में कमी आ जाती है। बोन मास और बोन टिशु का भी क्षरण हो जाता है।
प्रारम्भ में तो इसके कोई लक्षण नजर नहीं आते, बाद में हड्डियों या मांसपेशियों में दर्द, विशेषकर कमर के निचले हिस्से या गर्दन में दर्द होता है।
हड्डियों का दर्द सर्दियों में अचानक बढ़ जाता है और कई बार लगातार बना रहता है।
शारीरिक सक्रियता में कमी आ जाती है।
शरीर के भार में कमी आ जाती है या कभी-कभी लंबाई भी कम हो जाती है।
कैल्शियम और विटामिन डी है जरूरी
जीवनशैली में बदलाव लाएं: पोषक भोजन खाएं, जो कैल्शियम और विटामिन डी से भरपूर हो। इनमें हरी पत्तेदार सब्जियां, डेयरी प्रोडक्ट आदि प्रमुख हैं।
कम से कम 1,500 मिलीग्राम कैल्शियम का प्रतिदिन सेवन करें।
शरीर का भार औसत रखें।
प्रतिदिन एक मील पैदल चलने की कोशिश करें। पैदल चलना हड्डियों की वृद्धि में सहायक होता है।
शारीरिक रूप से सक्रिय रहें। नियमित रूप से व्यायाम और योग करें।
सप्लीमेंट्स से न घबराएं
ऑस्टियोपोरोसिस से पीडि़त लोगों को कैल्शियम और विटामिन डी, विशेषकर विटामिन डी3 और बायोफॉस्फोनेट को सप्लीमेंट के रूप में लेने की सलाह दी जाती है। विटामिन के भी हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है, इसलिए कई लोगों को सप्लीमेंट भी दिया जाता है। पहले एस्ट्रोजन रिप्लेसमेंट थेरेपी ऑस्टियोपोरोसिस को रोकने के लिए एक प्रचलित उपचार था, पर आजकल इसका प्रयोग काफी कम हो गया है। इसके अलावा सीरम थेरेपी भी इसके उपचार के लिए इस्तेमाल की जाती है।





तनाव से रखे दूर दो पल की खुशी


सेहतमंद जीवन के लिए खुश रहना जरूरी है, लेकिन तनाव भरे शहरी जीवन में हम खुश रहना भी भूल जाते हैं। जब छोटी-छोटी बातें आपके तनाव को छूमंतर कर सकती हैं, तरोताजा कर सकती हैं तो क्यों न खुशी पाने के उपाय खोजें।
अपने अंदर के बच्चे को जगाएं
कहते हैं कि हम कितने भी बड़े हो जाएं, लेकिन हमारे अंदर हमारा बचपन हमेशा सुरक्षित रहता है। वह बचपन, जिसमें हमने ढेर सारी मस्ती की है, तरह-तरह की ऐसी शरारतें की हैं, जिन्हें याद करके हमें आज भी हंसी आती है। तो आज जब आप काम के दबाव में तनाव में आ जाते हैं, उन पलों को याद क्यों नहीं करते? ऐसे पलों में अपने अंदर के उस बच्चे को जगाइए और देखिए कि कैसे आपके चेहरे पर खुद ब खुद मुस्कान की लंबी-लंबी लकीरें उभरने लगती हैं। मुस्कान की ये लकीरें न केवल आपको वर्तमान के तनाव से मुक्त कर देंगी, बल्कि आपके मन को बहुत हल्का भी कर देंगी और आप तरोताजा महसूस करने लगेंगे।
दोस्त बनाएं
हम बचपन से सुनते आए हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। हमें कुछ ऐसे लोग चाहिए होते हैं, जिन पर हम विश्वास करें और उनके साथ अपनी हर तरह की बातें शेयर कर सकें। डिप्रेशन का कारण एकांत भी माना जाता है। तो आप भी क्यों नहीं ऐसे दोस्त बनाते, जिनके साथ आप अपने सुख-दुख बांट सकें। अगर आपको दोस्तों के साथ समय बिताना ज्यादा अच्छा नहीं लगता तो आप सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भी दोस्त बना सकते हैं।
व्यायाम करें
जब आप पर काम का बोझ ज्यादा हो तो थोड़ा-सा व्यायाम जरूर करें। डॉक्टर मानते हैं कि व्यायाम आपके दिमाग में एंडोर्फिन्स और अनन्डामाइड नामक कैमिकल्स भेजता है, जो आपके मूड को फ्रैश करने और आपको ताजा महसूस करने में मदद करते हैं। माना जाता है कि व्यायाम आपका आत्मविश्वास भी बढ़ाता है और आत्मसम्मान बढ़ाने में भी सहयोग करता है।
कॉमेडी फिल्म देखें
आज हमारे ऊपर काम का बोझ कुछ ज्यादा ही रहता है। यही वजह है कि हम छोटी-से-छोटी बात पर भी एकदम डिप्रेशन में चले जाते हैं। लेकिन एक शोध में कहा गया है कि हंसना हमारी केलोरीज को खत्म करने और दिल को स्वस्थ रखने में हमारी मदद करता है। हमें हंसने का मौका देने में हास्य फिल्मों के महत्व को हम बिल्कुल भी नकार नहीं सकते। अगली बार जब भी आप डिप्रेस्ड महसूस कर रहे हों, कॉमेडी फिल्म देखें।
अच्छा खाएं
एक पुरानी कहावत है कि अच्छा खाएं, स्वस्थ रहें। लेकिन आज के समय में तो हम जंक फूड्स पर निर्भर होते जा रहे हैं। इस कारण हम अक्सर बीमार भी होते रहते हैं। तो जरा सोचिए कि अगर स्वस्थ ही नहीं रहेंगे तो खुशी कहां से आएगी? इसलिए पौष्टिक खाना खाएं और जंक से परहेज करें। शोध में यह बात सामने आई है कि आपकी डाइट में ओमेगा-3 फैटी एसिड की मात्र कम हो जाए तो भी डिप्रेशन के शिकार हो सकते हैं और आपके अंदर नकारात्मक सोच बढऩे लगती है। दूसरी तरफ फिनलैंड के कुओपियो विश्वविद्यालय के एक शोध में यह पाया गया है कि विटामिन बी की कमी भी आपको डिप्रेशन का शिकार बनाती है, इसलिए हमेशा अच्छा खाना खाने की ही कोशिश करें।
परोपकार भावना रखें
आज हमारे काम पर हमारा स्वार्थ हावी होता जा रहा है। इस कारण हम जो काम करते हैं, उसके बदले में कुछ उम्मीद करते हैं। यह उम्मीद पूरी नहीं होती है तो हम डिप्रेशन की स्थिति में आ जाते हैं। हम उस कहावत को भी भूल जाते हैं कि नेकी कर, दरिया में डाल। तो आप क्यों न परोपकार की भावना से भी कुछ काम करते! खुशी चाहिए तो परोपकार की भावना से भी काम करें।
अच्छी नींद लें, आराम करें
काम के दबाव के चलते हम ठीक से आराम भी नहीं कर पाते। इससे हमें नींद न आने की शिकायत रहने लगी है। ऐसे में आप कुछ समय बाद चिड़चिड़े होने लगेंगे और तनाव बढऩे लगेगा। इससे बचने के लिए आप अपने काम का समय तय करें और सही समय पर पूरी नींद लें।
सुबह सैर है जरूरी
शोध कहते हैं कि विटामिन डी की कमी से मूड खराब हो सकता है और हम डिप्रेशन में आ सकते हैं। विटामिन डी खाने में तो पाया ही जाता है, सुबह की धूप में यह सबसे अधिक मिलता है। अपने शरीर में विटामिन डी की मात्र ठीक रखने के लिए सुबह की धूप में 10 से 15 मिनट टहलने का नियम बनाएं।
अपने शौक पूरे करें 
कहते हैं कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है। जब आप खाली बैठे होते हैं तो आपके दिमाग में तरह-तरह के ख्याल आते हैं। उनके बारे में सोच कर आपका मूड खराब हो जाता है और आप डिप्रेशन के शिकार होते हैं। इससे बचने का सबसे अच्छा तरीका है कि आप कोई हॉबी क्लास ज्वॉइन कर लें। ऐसा करने से आप गलत खयालों से भी बचे रहेंगे और आपकी दबी हुई प्रतिभा भी उभरेगी।
आगे की सोचें
अगर आप डिप्रेस्ड महसूस कर रहे हैं तो अपने किसी भी सपने को साकार करने के लिए आगे की योजना बना लें। ऐसा करने से आपका ध्यान अपने आप उस लक्ष्य को साकार करने की तरफ चला जाएगा और उस दिशा में कदम बढ़ाते हुए आप खुशी महसूस करेंगे। सहयोग करने वाले व्यक्ति के प्रति मन में शक रखना कि वह किसी स्वार्थ की वजह से आपकी सहायता कर रहा है, डिप्रेशन का कारण बन सकता है। अपनी सोच को हमेशा सकारात्मक रखें।





दर्दों की दवा फिजियोथेरेपी


कभी कमर में दर्द तो कभी पीठ में, कभी कंधे में तो कभी गर्दन में। राजधानी की मशीनी होती जिंदगी में ये तकलीफें आम हैं। कई बार इनकी वजह कोई अंदरूनी चोट भी होती है, लेकिन इनसे आराम और मुक्ति के लिए आजकल फिजियोथेरेपी काफी लोकप्रिय हो रही है। दवा खाने की टेंशन और साइड इफेक्ट से दूर यह थेरेपी लगभग हर बीमारी में कारगर साबित होती है।
आम तौर पर लोग यही सोचते हैं कि फिजियोथेरेपी सिर्फ खिलाडिय़ों के लिए होती है, लेकिन सच यह है कि बड़े काम की है यह थेरेपी और इस थेरेपी का लाभ कोई भी उठा सकता है। जोड़ों और हड्डियों के साथ-साथ दिल और दिमाग को भी स्वस्थ करती है फिजियोथेरेपी।
रोजाना चलने और थोड़ा बहुत शारीरिक काम करने से पूरी तरह शरीर की एक्सरसाइज नहीं हो पाती। ऐसे में मांसपेशियों का सही संतुलन नहीं बन पाता। आज हमारी जीवनशैली कम्प्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल जैसे लग्जरी और आरामप्रद गैजेट्स में सिमट कर रह गई है। इस कारण एक ही मुद्रा में कई घंटे तक बैठे रहना कई शारीरिक और मानसिक बीमारियों का रूप ले रहा है। पीठ दर्द, जोड़ों का दर्द, गर्दन का दर्द, बांहों और कंधों में दर्द आमतौर पर लगातार एक ही स्थिति में बैठे रहने के कारण पैदा होता है। लोगों में यह गलतफहमी है कि जिम जाकर व्यायाम करना हमेशा फायदेमंद होता है। आपके शरीर के लिए कौन-सा व्यायाम उपयुक्त है, यह भी आपके ही शरीर पर निर्भर करता है, इसलिए रोजाना किया जाने वाला हल्का-फुल्का व्यायाम ही आपके शरीर के लिए बेहतर साबित होता है। फिजियोथेरेपिस्ट की मानें तो अपने शरीर के लिए व्यायाम चुनने से पहले डॉक्टर से राय जरूर लेनी चाहिए। यदि आप किसी भी रोग या दर्द से पीडि़त हैं तो बिना फिजियोथेरेपिस्ट की सलाह के कोई भी व्यायाम करना आपके रोग को और बढ़ा सकता है। इसलिए शरीर के विभिन्न हिस्सों में होने वाले दर्द और मांसपेशियों का उचित संतुलन बनाए रखने के लिए फिजियोथेरेपी की मदद लें। इस पद्घति में सिकाई और व्यायाम के माध्यम से आप अपने दर्द से छुटकारा पा सकते हैं।
क्या है फिजियोथेरेपी
दर्द से छुटकारा पाने के लिए दवा लेना ही काफी नहीं होता। इसके अलावा भी कई ऐसी थेरेपी हैं, जो बिना दवा के ही आपको दर्द से मुक्ति दिला सकती हैं। फिजियोथेरेपी ऐसी ही एक थेरेपी है। फिजियोथेरेपी को फिजिक्स ट्रीटमेंट भी कहते हैं। यह मेडिकल साइंस की ही एक शाखा है। इसमें इलाज का एक अलग तरीका होता है, जिसमें एक्सरसाइज, हाथों की कसरत, पेन रिलीफ मूवमेंट द्वारा दर्द को दूर किया जाता है। इस थेरेपी का उद्देश्य रोग के कारणों को जान कर उस रोग से मरीज को मुक्त करना है। यह थेरेपी एक तरीके से शरीर को तरोताजा करने का काम करती है।
कई तरह की है यह थेरेपी
रॉकलैंड हॉस्पिटल के सीनियर फिजियोथेरेपिस्ट डॉ़ संजय बताते हैं कि फिजियोथेरेपी में कुछ खास मूवमेंट्स से इलाज किया जाता है। फिजियोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाले सभी व्यायाम आसान होते हैं और इनका चुनाव मरीज की स्थिति और उम्र को देखकर किया जाता है।
एक्टिव मूवमेंट
यह ट्रीटमेंट उन मरीजों के लिए होता है, जो एक्सरसाइज करने में सक्षम होते हैं। ऐसे मरीज के शरीर की अकडऩ को दूर करने और मसल्स की ताकत वापस लाने के लिए हल्के-फुल्के व्यायाम का इस्तेमाल किया जाता है। कुछ ब्रीदिंग एक्सरसाइज और डिवाइस के जरिए फेफड़ों की क्षमता को बढ़ा कर फेफड़ों से संबंधित बीमारियों में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा गायनी समस्याओं जैसे कंसीव समस्या, मां बनने के बाद और कई अन्य समस्याओं में भी यह उपयोगी साबित होती है।
पैसिव मूवमेंट
कुछ मरीजों को ऑपरेशन के बाद बेड से उठने में परेशानी होती है। ऐसी कई अन्य बीमारियां हैं, जिनमें मरीज बिस्तर पर पड़े रहना पसंद करते हैं। ऐसे मरीज का इलाज पैसिव मूवमेंट से किया जाता है। शरीर में आई स्टिफनेस को गर्मी देकर व्यायाम करवाया जाता है, जिससे शरीर की मसल्स की स्टिफनेस कम हो जाती है और शरीर में फिर से मूवमेंट शुरू हो जाती है।
कॉन्टिन्यूअस पैसिव मूवमेंट
इसमें कई तरह से हीट के जरिये मरीज का उपचार किया जाता है। इसमें कई बार हाथों के प्रयोग से व्यायाम करवाया जाता है तो कई बार आधुनिक तरीकों से मशीन का इस्तेमाल करके इलाज किया जाता है। इसके अलावा फिजियोथेरेपी में हॉट पैक, आइस पैक और हाइड्रो थेरेपी भी शामिल होती है। जैसी तकलीफ वैसा इलाज, लेकिन बिल्कुल अचूक।
कई बीमारियों में फायदेमंद 
किस बीमारी में किस तरह की थेरेपी देनी है, यह मरीज की स्थिति, उसकी तकलीफ, उसकी जीवनशैली आदि को ध्यान में रख कर तय किया जाता है। फिजियोथेरेपी का इस्तेमाल आमतौर पर हड्डियों और जोड़ों की समस्या, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, लकवा, सर्वाईकल, स्पॉन्डिलाइटिस, कमर दर्द, स्लिप डिस्क, कार्डियो समस्या, स्पोर्ट्स इंजरी, न्यूरो से संबंधित समस्या, वजन नियंत्रण और महिलाओं की समस्या में किया जाता है। फिजियोथेरेपी के तरीके अलग-अलग इस्तेमाल होते हैं, लेकिन इलाज अचूक है।
खुद उठाएं इसका लाभ
लगभग हर बीमारी में फिजियोथेरेपी का इस्तेमाल होने लगा है। आमतौर पर डॉक्टर ही मरीजों को फिजियोथेरेपी के लिए भेजते हैं। लेकिन अब बहुत से लोग जागरूक हैं और खुद ही इस थेरेपी का लाभ उठाने लगे हैं। फिजियोथेरपी का सबसे ज्यादा इस्तेमाल महिलाओं और बुजुर्गों द्वारा किया जाता है। दिल्ली में लगभग 70-80 प्रतिशत बुजुर्ग इस पद्घति का लाभ उठाते हैं। वयस्कों में इस थेरेपी का इस्तेमाल करने वाले लगभग 40-50 प्रतिशत लोग हैं, जिन्हें एक्सीडेंट आदि के बाद इसकी सलाह दी जाती है। बच्चों में जन्मजात समस्याएं जैसे पोलियो, दिमागी या शारीरिक विकास कम होने की स्थिति में इस थेरेपी का उपयोग किया जाता है और 10-20 प्रतिशत बच्चे फिजियोथेरेपी लेते हैं। महिलाओं में आमतौर पर 45 साल के बाद कई हारमोनल बदलाव आते हैं, जिनसे उनमें हारमोन असंतुलन, कैल्शियम की कमी, जोड़ों की समस्याएं आदि उत्पन्न होने लगती हैं। ऐसे में महिलाओं को दवाओं से ज्यादा फिजियोथेरपी की आवश्यकता होती है।





डांडिया लुक्स थोड़ा मॉड हो जाएं


डांडिया नाइट में हर साल चनिया-चोली पहनकर बोर हो गई हैं, तो इस बार इंडो-वेस्टर्न ट्राई करें। बेशक यह अंदाज आपको डिफरेंट लुक्स देने के साथ डांस में कंफर्ट भी देगा। डांडिया नाइट में अब डांडिया और गरबा ही नहीं, बल्कि अब बॉलिवुड डांस भी बहुत पॉप्युलर हो रहा है। अगर आप भी डांडिया नाइट में मस्ती करने जा रही हैं और उसके लिए चनिया चोली और ट्रडिशनल जूलरी सर्च कर रही हैं, तो प्लीज इस बार थोड़ा ब्रेक लें। आखिर हर बार आपको वही पुराना लुक कैरी करने की जरूरत नहीं है, बल्कि कुछ नया आजमाना चाहिए। तो इस बार कैरी करें इंडो-वेस्टर्न लुक।
ऐसा हो अंदाज
आपने चनिया-चोली तो कई बार पहनी होगी, लेकिन इस बार डांडिया नाइट पर डिफरेंट दिखने के लिए कुछ इंडो-वेस्टर्न ड्रेस डिजाइन पहनें। फैशन डिजाइनर लीना सिंह कहती हैं, अब चनिया चोली के स्टाइल में हैरम पैंट्स और साड़ी खूब आ रही हैं। अगर आप मस्ती के मूड में हैं और बिल्कुल फ्री स्टाइल चाहती हैं, तो बंधेज हैरम पैंट्स और साड़ी पहन सकती हैं। इसके अलावा, लॉन्ग फिटेड स्कर्ट, बंधेज और लहरिया रेडीमेड साड़ी व बंधेज काफ्तान्स भी कैरी कर सकती हैं।
मॉडर्न जूलरी
आप हैवी जूलरी पहनने का मन बना रही हैं, तो आपको बता दें कि डांडिया नाइट में हैवी मांग टीका व नेकलेस पहनकर डांस करना बेहद मुश्किल होता है। वहीं, इनके गिरने का भी डर रहता है। ऐसे में जरूरी है कि आप लाइट जूलरी पहनें। हां, इनमें स्टाइल ट्राई कर सकती हैं। बीड्स और थ्रेड से बने मांग टीका या फिर थ्रेड व मिरर से बनी वेस्ट चेन पहन सकती हैं। अगर आप साड़ी पहन रही हैं, तो उस पर मेटल की वेस्ट चेन कैरी करें। बाकी लुक लाइट ही रखें। वहीं हैवी एंकलेट्स की जगह आप एंकलेट्स ब्रेसलेट ट्राई कर सकती हैं। यह कलरफुल ब्रेसलेट हाथ और पैर, दोनों में पहन सकती हैं।
डांडिया टैटू
डांडिया नाइट में मेकअप करने का मूड नहीं है, तो आप टैटू जैसे ऑप्शंस पर जा सकती हैं। दरअसल, लड़कियां डांडिया नाइट पर कलर्ड टैटू बनवा रही हैं। मेकअप आर्टिस्ट मंजू रावत कहती हैं कि अगर बिंदास और मस्त होकर डांडिया नाइट इंजॉय करना चाहती हैं, तो जाहिर है कि आपका लुक भी वैसा ही होना चाहिए। आप बैक या फिर हाथ पर टैटू बनवा सकती हैं। डांडिया नाइट को देखते हुए आप डांडिया या अपना नाम या फिर कोई भी यूनीक पिक्चर बनवा सकती हैं। अगर मेकअप करना लाइट हैं, तो नाइट में शिमर मेकअप बहुत अच्छा लगता है। मेकअप आर्टिस्ट भारती तनेजा के मुताबिक, शिमर व ग्लॉसी मेकअप आप करवा सकती हैं। इसमें आंखों पर वाइट शैडो यूज करें। यह ना केवल आपको मॉड लुक देगा, बल्कि इससे आपकी आंखें डिफरेंट भी लगेंगी। लिप ग्लॉस या फिर शिमर लिपस्टिक लगा सकती हैं।
फुटवियर में सबकुछ
चूंकि डांडिया नाइट में आप खूब डांस करेंगी, तो ऐसे में आप कंफटेर्बल फुटवियर्स ही पहने। अगर आपको लगता है कि मोजरी पहनकर आप डांस करने में कंफटेर्बल डांस नहीं कर सकती हैं, तो आप कैनवस से लेकर स्नीकर्स तक पहन सकती हैं।




अब खून में नहीं बचेगा कोई इन्फेक्शन


दिल्ली सरकार जनवरी 2013 से राजधानी के सरकारी ब्लड बैंकों में ब्लड का सबसे आधुनिक टेस्ट न्यूक्लिक एसिड टेस्ट (एनएटी) शुरू करने जा रही है। माना जा रहा है कि दिल्ली देश का पहला ऐसा राज्य होगा जो सरकारी ब्लड बैंकों में यह टेस्ट शुरू करेगा। देश के कुछ जाने-माने अस्पतालों में ही इस टेस्ट की सुविधा है। अभी केवल ब्लड डोनर का ही टेस्ट किया जाता है। लिहाजा कई बार ब्लड में आए इन्फेक्शन का पता नहीं चल पाता।
लिहाजा डोनर के ब्लड देने के बाद ब्लड बैंक में जमा खून के सैंपल लेकर उनका नैट टेस्ट किया जाएगा। इस टेस्ट में एचआईवी, हेपेटाइटिस बी और सी तीन वायरसों का टेस्ट होगा। ये टेस्ट करने के बाद ही ब्लड बैंक में खून रखा जाएगा। इस टेस्ट में ब्लड के अंदर मौजूद किसी भी इन्फेक्शन का पता लगाया जा सकेगा।
दिल्ली के हेल्थ मिनिस्टर डॉ. अशोक कुमार वालिया के मुताबिक इस टेस्ट का काम फाइनल स्टेज में है। इस तरह की तैयारियां की जा रही हैं कि जनवरी, 2013 तक राजधानी के 10 सरकारी ब्लड बैंकों में इस टेस्ट को पूरी तरह से लागू कर दिया जाए। बाद में सभी ब्लड बैंकों में यह टेस्ट शुरू करने की प्लानिंग है। राजधानी में इस समय 53 ब्लड बैंक हैं। इनमें से 39 प्राइवेट व 14 सरकारी ब्लड बैंक हैं।
राजधानी में सालाना 4.5 लाख यूनिट ब्लड की जरूरत पड़ती है। इन सभी ब्लड बैंकों को एक आधुनिक लैब से आईटी के जरिए जोड़ा जाएगा। लैब लोक नायक जय प्रकाश अस्पताल में बनाई जाएगी। इस लैब में हर साल 1 लाख 25 हजार के करीब ब्लड बैंकों से आए सैंपलों की जांच की जाएगी। चूंकि लैब सीधे ब्लड बैंकों से वेब के जरिए जुड़ी होगी लिहाजा टेस्ट की रिपोर्ट तत्काल ब्लड बैंकों को ऑनलाइन दी जाएगी। दिल्ली स्टेट ब्लड ट्रांसफ्यूजन काउंसिल के डायरेक्टर डॉ. भरत सिंह के मुताबिक अभी राजधानी में एलिजा (ईएलआईएसए) टेस्ट होता है।
इसमें भी एचआईवी और हेपेटाइटिस बी और सी का टेस्ट किया जाता है। इस टेस्ट के जरिए ऐंटि बॉडी का पता लगाया जाता है। इनका पता लगाने में 20 से 30 दिन का समय लग जाता है, लेकिन नैट टेस्ट में 5 दिन के अंदर ही इन्फेक्शन का पता लगाया जा सकता है।
हेल्थ डिपार्टमेंट के मुताबिक लैब को ऑपरेट करने का काम एक प्राइवेट एजेंसी को दिया जाएगा। प्राइवेट एजेंसी का कांट्रेक्ट हर 5 साल में बदला जाएगा। इसी साल नवंबर के महीने से इसके लिए टेंडरिंग का काम शुरू हो जाएगा। दिसंबर तक सब कुछ फाइनल करके जनवरी, 2013 तक ब्लड की नैट टेस्टिंग शुरू हो जाएगी।