Thursday, April 25, 2013
दुनिया का सबसे ऊंचा रोप पार्क
रोप-वे में बैठकर ऊपर या नीचे सफर करते वक्त बड़ा मजा आता है। सफर के दौरान नीचे देखने में डर भी लगता है, पर दुख इस बात का होता है कि यह सफर चंद मिनटों में खत्म हो जाता है। यानी यह सफर लंबा नहीं होता है। अब लोगों की यह समस्या दूर हो सकती है। एडवेंचर प्रेमी ऐसे लोगों के लिए कजाकिस्तान में एक रोप पार्क हाल ही में बनाया गया है। यह पार्क कजाकिस्तान के अलमाती के पास थिआनशान पर्वत पर एक रिजॉर्ट में बनाया गया है। इसकी खासियत यह है कि यह दुनिया का सबसे ऊंचा और अनूठा रोप पार्क खुला है। इस पार्क की ऊंचाई समुद्र तल से 22250 मीटर है। यह खास इसलिए है, क्योंकि यह पूरा पार्क आर्टिफिशियल सपोर्ट से बनाया गया है। इसमें 80 मीटर ऊंचाई से बंजी जंपिंग की जा सकती है। इस पार्क का आनंद वे ही लोग ले सकते हैं, जो एडवेंचर के शौकीन हैं। इस पार्क में काफी संख्या में लोग बंजी जंप करने जाते हैं।
सबसे बड़ा कैप्सूल होटल
तरह-तरह के होटलों के बारे में हम सबने सुना है और कई बार इनमें ठहरना भी हुआ होगा। पर क्या तुम कैप्सूल होटल के बारे में जानते हैं? कैप्सूल होटल इंडिया में नहीं है, पर कई अन्य देशों में खासी संख्या में हैं। ये होटल तमाम देशों के उन शहरों में हैं, जहां पर वेतन कम है और महंगाई अधिक होती है। लोग सस्ते में रात गुजार सकते हैं। हाल ही में चीन में दुनिया का सबसे बड़ा कैप्सूल होटल बनाया गया है। चीन के शाडान्ग प्रांत के किंगडाओ शहर में बनाया गया यह होटल धीरे-धीरे काफी लोकप्रिय हो रहा है। कैप्सूल में वे सारी सुविधाएं होती हैं, जो होटलों में होती हैं। इसमें एलसीडी टीवी, वाईफाई कनेक्शन, एक कंप्यूटर, डेस्ट, ड्रेसर और बिस्तर होता है। हालांकि ये बेहद संकरे होते हैं, लेकिन रात गुजारने के लिए पर्याप्त होते हैं। इनकी लंबाई दो मीटर, चौड़ाई 1 मीटर और ऊंचाई भी एक मीटर से अधिक होती है। अब बात की जाए यहां के किराए की। यहां पर ऑफ सीजन में भारतीय मुद्रा के अनुसार 387 रुपए और पीक सीजन में 691 रुपए देने पड़ते हैं। इस होटल में 100 कैप्सूल कमरे हैं, जो अब तक का सबसे बड़ा कैप्सूल होटल है।
पत्थर काटकर बनाया घर
घरों में पत्थरों का इस्तेमाल तो लोग खूब करते हैं, पर मेक्सिको में एक सज्जन ने पत्थर को काटकर घर बना लिया। हालांकि इन सज्जन ने शौकिया तौर पर नहीं, बल्कि मजबूरी में घर बनाया है। सैन जो लास पियार्दस के पास एक परिवार 30 सालों से एक पत्थर के नीचे घर बनाकर रह रहा है। इस पत्थर का व्यास 131 फुट है। यह इलाका कोहुइला रेगिस्तान में है। परिवार के मुखिया के अनुसार, किसी छोटी सी बात पर उसके परिवार को सैन जो के लोगों ने इलाके से बाहर निकाल दिया था। इसके बाद व्यक्ति ने मजबूरी में कुछ ही दूरी पर एक पत्थर को काटना शुरू किया और उसी पत्थर के नीचे पूरा घर बना लिया है। इस घर को बनाने में उसे कई वर्ष का समय लग गया था।
पंछी बने उड़ते फिरें हैंग ग्लाइडिंग
हवाई जहाज में बैठकर आसमान में यात्रा की जा सकती है, पर क्या इसमें वो रोमांच होता होगा, जो पक्षियों को होता है? जवाब होगा नहीं। हां, पर हैंग ग्लाइडिंग के जरिए एडवेंचर के शौकीन लोग जरूर तेज हवा में तैरते हुए ऊंचे उड़ने की चाहत पूरी कर सकते हैं।
पक्षियों को ऊंचे उड़ते देखकर तुम्हारा मन भी करता होगा कि काश, हम भी उड़ पाते। हालांकि थोड़े बड़े होने के बाद जरूर तुम अपनी इस इच्छा को पूरा कर सकते हो। हैंग ग्लाइडिंग तेज हवा में आसमान से बातें करने की चाह रखने वाले एडवेंचर के शौकीनों के लिए बढिया विकल्प है। हैंग ग्लाइडिंग की शुरुआत 1984 में हुई थी। तब हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा घाटी में पहली बार हैंग ग्लाइडिंग प्रतियोगिता आयोजित की गई थी।
‘हैंग ग्लाइडिंग’ एक रोमांचक एयरोस्पोर्ट्स यानी हवा में खेले जाने वाला खेल है। यह खेल आज एडवेंचर टूरिज्म का हिस्सा बन चुका है। विशाल पक्षी के पंखों जैसे नजर आते ग्लाइडर को पकडम्कर हवा में उड़ते व्यक्ति को देखने से ही मन में एक रोमांच पैदा होने लगता है। स्वयं ग्लाइडिंग करना तो वास्तव में एक अद्वितीय अनुभव होगा। हैंग ग्लाइडिंग में प्रयोग होने वाला ग्लाइडर मेटल का बना एक बड़ा सा तिकोना फ्रेम होता है, जिस पर पाल लगी होती है। इस फ्रेम को पकड़कर हवा में उड़ना ही हैंग ग्लाइडिंग कहलाता है।
कैसे काम करता है हैंग ग्लाइडर
मजे की बात यह है कि हैंग ग्लाइडर में किसी तरह का इंजन आदि नहीं लगा होता। यह तो खिलाड़ी को पूरी तरह अपनी दक्षता के आधार पर उड़ना होता है। यही कारण है कि ऊंची पहाडियों में तेज हवा में तैरना किसी भी साहसी व्यक्ति के लिए एक चुनौती भरा आकर्षण होता है। हैंग ग्लाइडर की बनावट एवं मजबूती हवा में ग्लाइडर का संतुलन बनाये रखने में सहयोग देती है। एल्यूमीनियम से बना इसका फ्रेम करीब 18 फीट चौड़े तिकोने आकार का होता है। इस पर मजबूत सिंथेटिक फेब्रिक की पाल लगी होती है। फ्रेंम के मध्य एक रॉड होती है, जिसे कंट्रोल बार कहते हैं। उडमन आरम्भ करने के लिए पायलट यह रॉड पकडम्कर पहले पहाड़ी ढलान पर दौड़ता है। बस कुछ ही पल बाद ग्लाइडर हवा से बातें करने लगता है।
हैंग ग्लाइडिंग के दौरान पायलट पीठ में बांधे हारनेस द्वारा फ्रेम में लगी रस्सियों के सहारे लटका रहता है, जिससे उड़ने के दौरान थकान महसूस नहीं होती। इस बीच कंट्रोल बार द्वारा ग्लाइडर को नियंत्रित किया जाता है। पायलट अधलेटी अवस्था में लटके हुए अपने शरीर के झुकाव द्वारा ग्लाइडर की दिशा को परिवर्तित करता है। उडमन समाप्त करने के लिए उड़ते हुए पहले किसी उचित स्थान की पहचान की जाती है। फिर सावधानी से ग्लाइडर को उस दिशा में लाकर ढलान पर ही उतारा जाता है।
हालांकि मौसम कैसा है, यह बात भी मायने रखती है, पर अच्छी उड़ान की मुख्य जिम्मेदारी उड़ान भरने वाले व्यक्ति की दक्षता पर ही होती है।
दुनियाभर में लाखों हैं दीवाने
पूरे विश्व में तीन लाख से भी अधिक लोग हैंग ग्लाइडिंग से जुड़े हैं। आज यह एक अन्तर्राष्ट्रीय साहसी खेल का दर्जा पा चुका है। अनेक देशों में सैकड़ों हैंग ग्लाइडिंग क्लब बने हुए हैं। हमारे देश में हैंग ग्लाइडिंग की शुरुआत 1984 में हुई थी। तब हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा घाटी में पहली बार हैंग ग्लाइडिंग प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। उस समय से कांगड़ा घाटी का ‘बिलिंग’ नामक वह स्थान एयरोस्पोर्ट्स का प्रसिद्ध केन्द्र बन गया है। देश के कई राज्यों में उपयुक्त स्थान खोज कर वहां भी हैंग ग्लाइडिंग का आयोजन होने लगा। आज कांगड़ा के अतिरिक्त शिमला, धर्मशाला, सौली, पूना, सिंहगढ़, कामशेट, मऊ, इंदौर, मैसूर, ऊटी, शिलांग तथा सिकिकम में हैंग ग्लाइडिंग की सुविधाएं उपलब्ध हैं।
इसके लिए थोड़े से प्रशिक्षण की आवश्यकता है, बस फिर तो कोई भी साहसी व्यक्ति हैंग ग्लाइडिंग कर सकता है। यह प्रशिक्षण कोई खास तकनीकी ज्ञान आदि से जुड़ा भी नहीं होता। पर इस खेल का मजा लेने के लिए साहस के साथ इसके लिए मस्तिष्क की एकाग्रता आवश्यक है। एक अच्छे प्रशिक्षण द्वारा दो सप्ताह में हैंग ग्लाइडिंग सीखी जा सकती है। उसके बाद पर्याप्त अभ्यास करने के बाद ऊंची उड़ान भरी जा सकती है।
हालांकि हमारे देश में हैंग ग्लाइडिंग के प्रशिक्षण केन्द्रों की संख्या कम है। फिर भी बहुत से शहरों में हैंग ग्लाइडिंग क्लब मौजूद हैं। इनका सदस्य बन कर इस खेल से जुड़ा जा सकता है। आजकल इंजन से चलने वाले ग्लाइडर भी प्रयोग किए जाने लगे हैं। हैंग ग्लाइडिंग की इंजन रहित उडमन ‘फ्री फ्लाइंग’ कही जाती है, जबकि इंजन चालित ग्लाइडर की उडमन को ‘ट्राइक’ कहते हैं। इसमें एक छोटा सा इंजन फ्रेम के साथ जुड़ा होता है, जिसके पीछे एक पंखा लगा होता है। नीचे तीन पहिए भी लगे होते हैं। यह मैदानों से भी उड़ाया जा सकता है।
यहां सीख सकते हो
दिल्ली ग्लाइडिंग क्लब, सफदरजंग एयरपोर्ट, नई दिल्ली
ग्लाइडिंग एंड सोरिंग सेंटर, कानपुर
राजस्थान स्टेट फ्लाइंग स्कूल, जयपुर
पिंजौर एविएशन क्लब (ग्लाइडिंग विंग), पिंजौर
ग्लाइडिंग सेंटर, पूना
एयरोस्पोर्ट्स कॉम्पलैक्स, बीड़ा, कांगड़ा
एडवेंचर स्पोर्ट्स हॉस्टल, धर्मशाला
Wednesday, April 24, 2013
कैसे करते हैं जानवर खुद की सफाई
तुम जब छोटे थे तो तुम्हारे पैर के नाखून से लेकर सिर तक पूरे शरीर की सफाई मम्मी-पाप करते थे। कुछ कामों में तो वे आज भी तुम्हारी मदद करते हैं। जानवर भी अपने शरीर की सफाई करते हैं। जानते हो कैसे, बता रही हैं पूनम जैन
बिल्ली: कहते हैं कि बिल्ली को अपना गंदा होना पसंद नहीं, इसलिए वह दिन में कई बार खुद को अपनी जीभ से चाटकर साफ करती रहती है। यहां तक कि अपने पंजों के निचले हिस्से को भी वह चाटकर साफ करती है। शरीर को चाट- चाटकर वह अपनी त्वचा के तेल को पूरे शरीर पर मालिश करते हुए फैला लेती है। इतना ही नहीं, पॉटी करने के बाद भी वह उस हिस्से की सफाई जरूर करती है। रेत या मिट्टी को अपने पैर से खोदकर पहले वह एक गड्ढा बनाती है, उसमें पॉटी करने के बाद उसे मिट्टी से ढक देती है। कुछ देर जमीन के बल बैठकर आगे की ओर सरकती है।
कुत्ता: कुत्ते को बिल्ली जितना साफ रहने का शौक नहीं होता, पर वह भी खुद को साफ रखने की पूरी कोशिश करता है। वह बिल्ली की तुलना में कम लचीला होता है, इसलिए अपने पूरे शरीर को वह खुद से साफ नहीं कर पाता। वह भी खुद को साफ करने के लिए जीभ का सहारा लेता है, पर यह तरीका उसके लिए खुद को संक्रमण या खारिश से मुक्त रखने का भी होता है। शरीर के निचले भाग को वह बिल्ली की तरह जमीन पर बैठकर आगे की ओर सरकते हुए साफ करता है। जिन घरों में एक से अधिक डॉगी हैं, वे जानते हैं कि कुत्ते सफाई में एक-दूसरे की मदद करते हैं। मसलन, खाना खाते ही बड़ा डॉगी बेबी डॉगी के मुंह को चाटकर साफ कर देता है। इसी तरह वे एक-दूसरे के दांत भी साफ करते हैं।
पक्षी:आसमान में उड़ने वाले पक्षी अपने पंखों पर से धूल-मिट्टी और कीटाणु हटाने के लिए धूल में स्नान करते हैं। कुछ देर रेत में हिलने-डुलने के बाद वे अपने पंखों को हिलाते हुए धूल झाड़ते हैं। वे अपने पंखों को अपनी चोंच से भी साफ करते हैं।
खरगोश: खरगोश अपनी व एक दूसरे की सफाई अपनी जीभ से करते हैं। वे समय-समय पर अपने बालों को चाटते रहते हैं। वहीं ऐसी जगह जहां उनकी जीभ नहीं जाती, जैसे कि माथा, उसकी सफाई के लिए पहले वे अपने आगे के पैर के पंजों को चाटते हैं और फिर उस पंजे को कपड़े की तरह इस्तेमाल करते हुए अपना माथा साफ करते हैं। कई बार इसी तरह वे अपने कान भी साफ करते हैं, पर कई बार वे कानों को थोड़ा नीचे की ओर ले जाते हैं, जिससे जीभ से भी वे उनकी सफाई कर पाते हैं। पैरों के पंजों के नाखून से वे कानों के भीतर जमी हुई गंदगी को भी हटा लेते हैं। आपको यह जानकर भी हैरानी होगी कि वे कानों में से निकले ईयरवैक्स, जिसे हम मैल कह देते हैं, उसे खा लेते हैं। उनके लिए यह विटामिन डी का काम करता है।
हाथी: हाथी, गेड़ा व अन्य स्तनपायी जानवर मिट्टी और कीचड़ में लिपटकर स्नान करते हैं। उसके बाद उस मिट्टी को झाड़ने पर या जब वह सूखने के बाद झड़ने वाली मिट्टी के साथ उनके शरीर से बेजान त्वचा यानी डेड स्किन भी उतर जाती है। जो जानवर पानी में खड़े हो सकते हैं, वे साफ पानी से भी स्नान करते हैं। इस संबंध में सबसे अधिक फायदा हाथी को होता है। वह सूंड के जरिए अपने पूरे शरीर पर पानी छिड़क लेता है।
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