Saturday, September 5, 2015

एयरक्राफ्ट मेन्टेनेन्स इंजीनियरिंगः तकनीक की ऊंची उड़ान


एयरक्राफ्ट मेन्टेनेन्स इंजीनियरिंग एविएशन सेक्टर से संबंधित एक प्रमुख क्षेत्र है, जिसे मेन्टेनेन्स ब्रांच में शामिल किया गया है। यह एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें प्रोफेशनल्स को पद व पैसा दोनों मिल रहा है। इसमें कमर्शियल एवं मिलिट्री एयरक्राफ्ट, स्पेस क्राफ्ट, सेटेलाइट एवं मिसाइल आदि की डिजाइनिंग, कंस्ट्रक्शन, डेवलपमेंट, टेस्टिंग, ऑपरेशन एवं मेन्टेनेन्स आदि के बारे में विशेषज्ञता हासिल की जाती है। एयरक्राफ्ट मेन्टेनेन्स इंजीनियर का सीधा संबंध एविएशन डिवीजन से होता है। एयरक्राफ्ट के सफलतापूर्वक टेक ऑफ की जिम्मेदारी भी इन्हीं के जिम्मे होती है। ये इंजीनियर पूरी तरह से सुरक्षा पर फोकस करते हैं, ताकि एयरक्राफ्ट को बिना किसी अवरोध के उड़ाया जा सके।

क्या कहती है इंडस्ट्री रिपोर्ट
नागरिक उड्डयन मंत्रालय की एक घोषणा के अनुसार इस समय भारतीय एविएशन इंडस्ट्री विश्व की नौवीं सबसे बड़ी एविएशन इंडस्ट्री है तथा 2020 तक इसके तीसरे सबसे बड़े एविएशन मार्केट के रूप में बनने की उम्मीद है। इसी तरह से 2030 तक पहुंचते-पहुंचते इसके पहले स्थान पर काबिज होने का अनुमान है। फिक्की-केपीएमजी रिपोर्ट के अनुसार एविएशन इंडस्ट्री में वर्ष 2017 तक देश में रोजगार में दोगुनी वृद्धि होगी और यह बढ़ कर 1.17 लाख के करीब पहुंच जाएगा। आने वाले समय में इसमें एयरक्राफ्ट मेन्टेनेन्स इंजीनियर पदों के लिए भारी संख्या में प्रोफेशनल्स की आवश्यकता पड़ेगी।

बारहवीं के बाद रखें कदम
एयरक्राफ्ट मेन्टेनेन्स इंजीनियरिंग तीन वर्षीय ट्रेनिंग कोर्स है। इसमें प्रवेश के लिए छात्रों को 10+2 की परीक्षा फिजिक्स, केमिस्ट्री व मैथ्स के साथ उत्तीर्ण होना आवश्यक है। छात्र की आयु 23 वर्ष से अधिक न हो।

सैलरी 
इसमें ज्यादातर सैलरी पैकेज एकेडमी करियर एवं काम के बारे में जानकारी पर निर्भर करता है। शुरू शुरू में इसमें प्रोफेशनल्स को करीब तीन से चार लाख रुपए सालाना का पैकेज मिलता है। अनुभव बढ़ने के साथ सैलरी भी बढ़ती जाती है। प्राइवेट सेक्टर में सैलरी अधिक मिलती है। सुविधाओं के मामले में सरकारी क्षेत्र आगे है।

फीस
इसमें फीस की राशि संस्थान पर निर्भर करती है। अमूमन तीन साल के कोर्स में कुल छह सेमेस्टर होते हैं। इनकी फीस करीब दो से ढाई लाख रुपए होती है। इसके अलावा हॉस्टल, यूनिफार्म, खाने, टूल-किट व अन्य खर्चे भी शामिल हैं। छात्र किस्तों में भी  फीस दे सकते हैं।

एजुकेशन लोन
छात्रों को देश-विदेश में अध्ययन के लिए प्रमुख राष्ट्रीयकृत, प्राइवेट अथवा विदेशी बैंकों द्वारा एजुकेशन लोन प्रदान किया जाता है। यह राशि पांच लाख से लेकर अधिकतम 20 लाख रुपए तक हो सकती है। छात्र को जिस संस्थान में एडमिशन लेना है, वहां से जारी एडमिशन लेटर, हॉस्टल खर्च, ट्यूशन फीस एवं अन्य खर्चों का ब्योरा बैंक को देना होता है। अंतिम निर्णय बैंक को करना होता है। बैंक सभी कागजात जांचता है।

एनएसआईटी: सवा करोड़ तक मिलता है पैकेज


अमेरिका से ऑस्ट्रेलिया तक नामचीन कंपनियों में प्रमुख पदों पर छाए एनएसआईटी के छात्रों की संख्या बड़ी है। चाहे संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में अव्वल स्थान पाना हो या गूगल व फेसबुक तक पहुंचने की बात हो, यहां के छात्र अपनी शानदार जगह बना ही लेते हैं। यानी उच्च गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए विषय की पढ़ाई से लेकर सामाजिक व्यवहार तक, यहां के छात्र बेहतर साबित होते रहे हैं। तभी तो दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने यहां के छात्रों की तारीफ करते हुए उनसे दिल्ली को दुनिया का बेहतरीन शहर बनाने में सहयोग देने का आह्वान किया।

यह सफलता यहां के छात्रों की तो है ही, एनएसआईटी की भी बड़ी सफलता है, जिसने छात्रों को बेहतर माहौल देते हुए इस तरह तैयार किया। साल 1983 में यह दिल्ली विश्वविद्यालय की फैकल्टी ऑफ टेक्नोलॉजी था। 1987 में इसे नया नाम मिला दिल्ली इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी यानी डीआईटी। 1997 में इसे नया कैंपस भी मिला और नया नाम भी। इंस्टीट्यूट पश्चिमी दिल्ली के द्वारका स्थित 145 एकड़ में फैले अपने नए कैंपस में पहुंच गया और इसे नाम मिला नेताजी सुभाष इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी। आज यह एनएसआईटी के नाम से प्रसिद्ध है।

कोर्स और सीटें- यहां ग्रेजुएशन लेवल पर इलेक्ट्रॉनिक एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग, कंप्यूटर इंजीनियरिंग, इंफॉर्मेशन इंजीनियरिंग, इंस्ट्रुमेंटेशन एंड कंट्रोल इंजीनियरिंग, मेन्युफैक्चरिंग प्रोसेस एंड ऑटोमेशन इंजीनियरिंग व बायो टेक्नोलॉजी की पढ़ाई होती है। पीजी लेवल पर सिग्नल प्रोसेसिंग, इंफॉर्मेशन सिस्टम्स और प्रोसेस कंट्रोल इंजीनियरिंग में एमटेक की पढ़ाई की व्यवस्था है। इंस्टीट्यूट में पीएचडी के लगभग दर्जन भर प्रोग्राम चलाए जाते हैं, जिनमें इलेक्ट्रॉनिक एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग, कंप्यूटर इंजीनियरिंग, इंस्ट्रुमेंटेशन एंड कंट्रोल इंजीनियरिंग, बायो टेक्नोलॉजी, मैनेजमेंट, ह्यूमेनिटीज एंड सोशल साइंसेज, मैथेमेटिक्स, फिजिक्स,मेन्युफैक्चरिंग प्रोसेस एंड ऑटोमेशन इंजीनियरिंग, इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी व केमिस्ट्री शामिल हैं। यहां सीटों की कुल संख्या लगभग 800 और इंस्टीट्यूट में छात्रों की कुल संख्या लगभग 3000 है।

प्लेसमेंट - इंस्टीट्यूट के छात्रों का प्लेसमेंट शत प्रतिशत रहता है। यहां के छात्र 1.25 करोड़ तक का पैकेज पा चुके हैं। यहां के अधिकांश छात्र सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करते हैं और उसमें सफलत भी हासिल करते हैं।

पता- निदेशक, नेताजी सुभाष इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, आजाद हिंद फौज मार्ग, सेक्टर 3, द्वारका, नई दिल्ली-110078
फोन - 011-25099050
इमेल आईडी- nsitadmissions@gmail.com
वेबसाइट - www.nsit.ac.in

विदेश से पीजी की पढ़ाई में मिलेगी मदद


कई ऐसी विदेशी यूनिवर्सिटी हैं, जो स्कॉलरशिप के जरिए छात्रों के लिए पीजी की राह आसान बनाती हैं। इन्हीं में से एक न्यूजीलैंड स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ ऑकलैंड भी है। यह यूनिवर्सिटी मास्टर प्रोग्राम में अध्ययन के लिए इच्छुक विदेशी छात्रों को राहत पहुंचाने के उद्देश्य से एडीबी-जेएसपी (एशियन डेवलपमेंट बैंक-जापान स्कॉलरशिप प्रोग्राम) प्रदान करती है। इसकी स्कॉलरशिप की शुरुआत 1988 में जापान सरकार की मदद से हुई। इस स्कॉलरशिप के अंतर्गत विकासशील देशों के छात्र इकोनॉमिक्स, मैनेजमेंट, साइंस एंड टेक्नोलॉजी एवं विकास से संबंधित क्षेत्रों में अध्ययन कर सकते हैं। इसमें आवेदन प्रक्रिया ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों तरीकों से की जा सकती है।

प्रोग्राम दायरे में
इस स्कॉलरशिप के तहत निम्न प्रोग्राम शामिल किए जाते हैं-
- मास्टर ऑफ पब्लिक हेल्थ
- मास्टर ऑफ साइंस (एन्वायर्नमेंटल साइंस)
- मास्टर ऑफ आट्र्स (डेवलपमेंट स्टडीज)
- मास्टर ऑफ इंटरनेशनल बिजनेस
- मास्टर ऑफ कॉमर्स
- मास्टर प्रोग्राम इन इंजीनियरिंग

संबंधित योग्यता एवं उम्र-सीमा
इस स्कॉलरशिप के लिए वही छात्र योग्य हैं, जिन्होंने किसी मान्यताप्राप्त यूनिवर्सिटी से बैचलर डिग्री हासिल की हो तथा जिनका एकेडमिक रिकॉर्ड काफी अच्छा हो। उनके पास कोर्स की समाप्ति के पश्चात दो साल का फुलटाइम वर्क एक्सपीरियंस हो। साथ ही वे अंग्रेजी में पूरी दक्षता के साथ लिख और बोल लेते हों। इसके अलावा उनकी उम्र 35 वर्ष से अधिक न हो और वे पूरी तरह स्वस्थ हों।

अवधि एवं राशि
यह स्कॉलरशिप एक से दो वर्ष के लिए दी जाती है। इसके लिए करीब 10 देशों से 300 से ज्यादा उम्मीदवार चुने जाते हैं। इसमें  ट्यूशन फीस, किताब व स्टडी मैटीरियल का खर्च, मकान का किराया, मेडिकल इंश्योरेंस और ट्रैवल खर्च आदि शामिल है।



जरूरी कागजात 
स्कॉलरशिप के लिए आवेदन करते समय उम्मीदवार को कई जरूरी कागजात लगाने आवश्यक हैं। उन्हें एडीबी-जेएसपी इंफॉर्मेशन शीट, पासपोर्ट और बर्थ सर्टिफिकेट की प्रमाणित कॉपी, शैक्षिक योग्यता से संबंधित प्रमाणपत्र, आईईएलटीएस/टॉफेल रिजल्ट की कॉपी, पासपोर्ट साइज फोटो जमा करने होते हैं।

संपर्क पता
दि यूनिवर्सिटी ऑफ ऑकलैंड, प्राइवेट बैग नं.- 92019
ऑकलैंड, न्यूजीलैंड
वेबसाइट- www.adb.org, www.auckland.ac.nz

Thursday, August 27, 2015

पालतू जानवर से प्यार के साथ दूरी भी जरूरी


आजकल घर के आसपास के माहौल के असुरक्षित होते जाने के कारण पेट्स पालने का चलन बढ़ता जा रहा है। ये पेट्स वफादार साथी साबित होते हैं इसलिए बहुत से परिवारों में इनके साथ परिवार के सदस्य की तरह बर्ताव किया जाता है। विशेषकर छोटे बच्चे तो सारा-सारा दिन पेट्स से चिपके रहते हैं।
हमारे यही प्यारे पेट्स कभी-कभी हमारे लिए खतरनाक भी साबित हो सकते हैं। इनके काटने से हमें रैबीज हो सकता है जिसके कीटाणु पालतू जानवरों की लार द्वारा व्यक्ति के खून के सम्पर्क में आ सकते हैं। इससे व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है। इसके अलावा पेट्स से अन्य त्वचा रोग तथा एलर्जी भी हो सकती है इसलिए पेट्स को घर में बड़ी सावधानी से रखना चाहिए।
रैबीज पेट्स के काटने के एक साल बाद तक कभी भी हो सकता है। पेट्स के काटने का असर कितने समय में होगा यह जख्म के स्थान पर निर्भर करता है। जख्म यदि शरीर के ऊपरी हिस्से में है तो उसका असर केवल तीन-चार दिन में ही हो जाता है। दूसरी ओर यदि जख्म निचले हिस्से में है तो असर को मस्तिष्क में पहुंचने में ज्यादा दिनों का समय लग जाता है।
पेट्स के काटने के बाद दस दिन तक उस पर नजर रखनी चाहिए यदि रैबीज हो तो जानवर तीन-चार दिन में मर जाता है। इसलिए बेहतर यही होता है कि कुत्ता काटने के तुरंत बाद वैक्सीन लगवाना शुरू कर देना चाहिए क्योंकि एंटीबाडीज बनने में थोड़ा समय लग ही जाता है। कुल मिलाकर छ एन्टीरैबीज वैक्सीन लगवाने पड़ते हैं।
जानवर के काटते ही काटे हुए स्थान को पानी से खूब धोना चाहिए। साथ ही घाव को किसी ऐसे साबुन से धोना चाहिए जिसमें कास्टिक सोड़े की मात्रा ज्यादा हो जैसे कपड़े धोने का साबुन क्योंकि कास्टिक वायरस को खत्म कर देता है। जख्म पर पट्टी नहीं बांधनी चाहिए। लोगों में यह गलतफहमी भी है कि पेट्स के काटने पर प्रभावित स्थान पर लाल मिर्च लगाना चाहिए जिससे इसका प्रभाव खत्म हो जाता है। परन्तु ऐसा सही नहीं है, अपितु यह नुकसानदायक भी हो सकता है।
रैबीज होने के लिए पेट्स के द्वारा काटा जाना ही जरूरी नहीं है। यदि शरीर में कहीं चोट लगी है और यदि कुत्ता उस चोट को चाटता है तो उसकी लार हमारे रक्त के सम्पर्क में आ जाती है। इससे भी रैबीज हो सकता है। साथ ही चाटने से घाव से खून भी निकल सकता है जो और कष्टदायी हो सकता है।
इसके अलावा यदि पेट्स की लार किसी तरह पेट में चली जाए तो रैबीज नहीं होता क्योंकि रैबीज लार के खून के सम्पर्क में आने के बाद होता है। परन्तु यदि व्यक्ति को अल्सर है और उसके पेट में पेट्स की लार चली जाती है तो उसे रैबीज होने की पूरी-पूरी संभावना होती है।
कई बार पेट्स पंजा मार देता हैं इससे घबराना नहीं चाहिए क्योंकि पंजों से रैबीज नहीं फैलता परन्तु सुरक्षा की दृष्टि से टिटनेस का इंजैक्शन जरूर लगवा लेना चाहिए। पंजा लगने से विभिन्न त्वचीय रोग हो सकते हैं इसलिए किसी त्वचा रोग विशेषज्ञ से सम्पर्क करना चाहिए।
पालतू जानवरों को अपने शयन कक्ष में नहीं आने देना चाहिए क्योंकि इससे विभिन्न संक्रमण फैल सकते हैं। हालांकि पालतू जानवरों की कोई भी बीमारी इंसानों को नहीं होती परन्तु फिर भी कुछ सामान्य बीमारियां जैसे टीबी पेट्स के सम्पर्क में आने के बाद हो सकती है। दूसरी ओर यदि आपके पेट्स को त्वचा रोग स्केबिज है तो इसके सम्पर्क में आकर यह रोग आपको भी हो सकता है।
यदि आपका पालतू जानवर घर से बाहर जाता है तो उसका ध्यान रखना चाहिए क्योंकि आसपास के जानवरों के सम्पर्क में आने से उसे टिक्स हो सकती है। इन टिक्स से लाइम जैसी खतरनाक बीमारी भी हो सकती है। इसके लिए आवश्यक है कि समय-समय पर अपने पेट्स की जांच करते रहें कि उसे टिक्स तो नहीं है। एक बार यदि टिक्स पूरे घर में फैल जाएं तो उन्हें हटाना मुश्किल हो जाता है। टिक्स से निजात पाने के लिए पशु चिकित्सक की सलाह से किसी साबुन या शैम्पू का प्रयोग भी किया जा सकता है।
कभी-कभी पेट्स के रोएं झडऩे लगते हैं जो पूरे घर में फैल जाते हैं। ये भोजन के साथ हमारे पेट में भी जा सकते हैं। यह हमारे स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक होता है। इसलिए जरूरी है कि जानवर के रोएं झड़ते ही उसका उचित उपचार करवाया जाए।
पालतू जानवर से आप चाहे जितना प्यार करें परन्तु फिर भी उससे थोड़ी दूरी बनाकर रखना भी जरूरी होता है।

प्यारी निंदिया रानी!


नींद ना आना विकराल समस्या हो सकती है लेकिन यह लाइलाज 'बीमारीÓ नहीं है। बहुत से ऐसे उपाय हैं जिससे कोई भी व्यक्ति नींद को बुलावा दे सकता है। इनमें जो जरूरी चीजें हैं उनमें शामिल हैं डाइट जांचना, सोने का माहौल देखना, समय, व्यक्क्तिगत आदतें, जीवनशैली और तात्कालिक एकाग्रता। इन सब बातों में तालमेल बिठाकर बढिया नींद ली जा सकती है। इनके अलावा आप और क्या कर सकती हैं, बता रही हैं
पिछले साल हुए एक अध्ययन के मुताबिक भारत में करीब पांच प्रतिशत लोग अनिद्रा की समस्या से पीडित हैं। दरअसल इस समस्या का प्रमुख कारण तनाव और उससे उपजी अन्य समस्याएं हैं। अगर आपको भी इस तरह की समस्या है तो आप इन्हें आजमाएं-
1. सुबह उठकर सबसे पहले व्यायाम करें। अगर आप नियमित तौर पर व्यायाम करेंगी तो इससे आपको सही समय पर नींद आ जाएगी। सुबह व्यायाम करने से शरीर में हार्मोस की सक्रियता बढ़ती है और आप ज्यादा स्फूर्ति महसूस करती हैं। इससे आपके काम करने का उत्साह बढ़ता है जिससे दिन के अंत तक थकने से नींद अच्छी आती है। अमूमन दोपहर के बाद की एक्सरसाइज नींद के हिसाब से अच्छी मानी जाती है।
2. डॉक्टर नींद और नाश्ते में सीधा संबंध बताते हैं। वे कहते हैं कि अगर आप रात को ठीक तरह से सो नहीं पाई हैं तो सुबह अच्छे से नाश्ता नहीं कर पाएंगी और अगर सही तरीके से नाश्ता नहीं किया है तो रात को नींद नहीं आएगी। नाश्ता न करने या सही तरीके से ना करने से मेटाबॉलिज्म प्रभावित होता है जिससे दिमाग को आराम नहीं मिलता। अगर दिमाग परेशान हो तो अच्छी नींद नहीं आ सकती। इसलिए आप ऐसा नाश्ता करें जो फैट, फाइबर, अनाज और प्रोटीन से युक्त हो।
3. आप अपनी ऊर्जा के अनुसार ही काम निपटाएं। सबसे ज्यादा थकाने वाला काम या तनाव वाला काम पहले करें। उसके बाद दूसरे काम निपटाती जाएं। इसके दो फायदे होंगे। पहला तो यह कि आपके सभी काम समय से निपट जाएंगे और आपको तनाव नहीं होगा और दूसरा यह कि आप सुबह अधिक थकाने वाला काम करेंगी तो आपकी को ऊर्जा सही दिशा मिलेगी।
4. कैफीन और निकोटिन का सेवन कम करें। इनके सेवन के 10 मिनट के बाद ही ये दोनों शरीर में अपना असर दिखाने लगते हैं। शरीर को 4 घंटे से अधिक लगते हैं इन्हें शरीर से बाहर निकालने में। इस दौरान अगर आप सोने की कोशिश करती हैं तो उसमें बाधा आती है।
5. रात का भोजन जल्दी करें। अगर आप देर रात भोजन करती हैं तो शरीर को भोजन पचाने में दिक्कत आती हैं। जिससे नींद आने में समस्या आती है। चूंकि शरीर को रात को अधिक ऊर्जा की आवश्यकता नहीं होती है, इसलिए रात को कम भोजन ही करना बेहतर होता है।
6. सोने से पहले गुनगुने पानी में पैरों को कुछ देर डुबोकर रखना भी अच्छा माना जाता है। ऐसा करने से पैरों के साथ-साथ पूरे शरीर को आराम मिलता है और नींद जल्दी और अच्छी आती है।
7. बिस्तर आरामदायक होना चाहिए। बिस्तर कैसा हो, इसके कोई तय मानक नहीं हैं, लेकिन, तकिया बहुत ऊंचा न हो और गद्दा मुलायम होना चाहिए। कुछ ऐसा, जहां लेटते ही आपके थके-हारे शरीर को आराम मिले। शरीर को आराम मिलेगा तो नींद भी जल्दी आएगी।
8. कुछ लोगों को शोर-गुल, रोशनी या किसी भी तरह के अवरोध के कारण भी नींद नहीं आती है। अगर आपके साथ भी ऐसा ही है तो सोने के लिए जाने से पहले सोने लायक माहौल बनाएं। साथ ही खुश रहने और तनाव से दूर रहने की कोशिश करें। तनाव से दूर रहेंगी तो नींद भी जल्दी आएगी और परेशानियों से लडऩे की ऊर्जा भी आपको मिलेगी।
उम्रदराज लोगों के लिए 
अधिकतर बुजुर्गों की यह समस्या होती है कि उन्हें रात में ठीक से नींद नहीं आती है। सुबह आंख भी जल्दी खुल जाती है। ऐसे में थोड़ा वक्त निकालकर दोपहर में नींद अवश्य लें। यह आराम या नींद 10 से 20 मिनट की हो। कोशिश करें कि एकांत व अंधेरे में नींद लें। कोशिश करें कि रात का खाना सूर्यास्त के बाद करें। शाम के वक्त यानी भोजन से पहले खुद को कुछ छोटे-मोटे कामों में व्यस्त रखें। व्यस्त रहेंगे तो थकेंगे और थकावट के कारण नींद जल्दी आएगी।